हरे कृष्ण.
ब्लॉग के सभी पाठको और मित्रो को मेरा प्रणाम.
पिछले कई दिनों से ब्लॉग पर कुछ लिखने या पढने का समय नहीं मिला. मैं तो समय से ऑन लाइन भी नहीं हो पा रहा था. इसके लिए आप सब से क्षमा मांगता हूँ. कुछ कार्य स्थल कि व्यस्तता थी और कुछ निजी परेशानियाँ. मगर इसी बीच एक दार्शनिक कठिनाई ने आ घेरा. मैं हर जगर उसका हल धुन्धता फिर , मगर जब कहीं चैन न आया तब आप मित्रों कि याद आई.
कल नीलेश जैन का ब्लॉग पढ़ा, काफी दिनों बाद. नीलेश भाई आप काफी भावुक हो और अपने मुझे भी भावुक कर दिया. खैर इसकी चर्चा फिर कभी करेंगे. अभी तो मैं अपनी परेशानी आप सब से बांटना चाहता हूँ.
संस्कृत भाषा संसार की प्राचीनतम और श्रेष्ठतम भाषा है. इसमें तो कोई दो मत नहीं है. संस्कृत भाषा की सबसे बड़ी खूबी है उसके शब्द. संस्कृत शब्दावली अत्यंत वृहद् और सटीक है. संसार के लगभग प्रत्येक वस्तु, भाव और विचार के लिए संस्कृत में शब्द मिलते हैं. संस्कृत में समानार्थी शब्द भी हैं, मगर वे पुर्णतः समानार्थी नहीं कहे जा सकते. एक ही वस्तु या भाव के लिए दो शब्द मिलते हैं, मगर उनका अर्थ बिलकुल भिन्न होता है. दोनों शब्द, उस वस्तु या भाव के बिलकुल दो अलग अलग गुणों, विशेषताओ तथा पक्षों को सामने रखते हैं. उदाहरण के लिए- पावक और अग्नि दो समानार्थी शब्द हैं. मगर पावक वह है जो गर्मी देता है, गर्म होता है और जिसके प्रयोग से लोग अपना भोजन पका सकते हैं. दूसरी तरफ अग्नि वह है जो हर चीज को जला देती है. अर्थात दोनों शब्द इंगित तो एक ही वस्तु को करते हैं, मगर दो भिन्न दृष्टिकोणों से. ऐसा लगभग हर भाषा के साथ होता है. संस्कृत में तो यह गुण विशेषतः पाया जाता है. अब वीर-अर्जुन के दोनों नामो को देखिये;- पार्थ और सव्यसाची. पार्थ वह है जो पृथा (कुंती माता) का पुत्र है. और सव्यसाची वह है जो एक ही बार में दोनों हांथो का प्रयोग कर के दो अलग अलग कमानों से बाण चला सकता है. यहाँ भी दीखता है, की दो समानार्थी शब्द असल में भावार्थ में सामान भले ही हो; मगर शब्दार्थ में भिन्न भिन्न होते हैं.
अब मैं अपने समस्या पर आता हूँ.
ईश्वर के तीन स्वरुप माने गए हैं - ब्रह्म, परमात्मा और भगवान. कुछ लोगो ने दो ही स्वरुप माने हैं - सगुण तथा निर्गुण. असल में ब्रह्म, परमात्मा और भगवान एक ही भगवान् के तीन नाम हैं, मगर तीनो के शब्दार्थ बिलकुल अलग अलग है. ब्रह्म वह है जो इस संसार का मूल है और जिससे ये जगत उत्पन्न हुआ है. अर्थात दृश्य जगत का कारण.
परमात्मा वह है जो इस विराट पुरुष (जगत-पुरुष) के आत्मा के रूप में जगत- आत्मा बनकर सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है.
भगवान वह है जो भक्तो का प्रिय है, भजन के योग्य है, और प्रेम तथा सत्कार का लक्ष्य है.
विशेष संस्कृत में नहीं जाऊँगा. मन हो तो संस्कृत व्याकरण या शब्दकोष में आप लोग मेरी बात की जांच कर सकते हैं.
ऐसे ही भगवान के अनके नाम संस्कृत में तथा अन्य भाषाओँ में भी मिलते हैं. उन सभी नामो में मेरी श्रद्धा है, तथा सभी स्वरूपों पर विश्वास करता हूँ.
परन्तु मुझे भगवान के निराकार स्वरुप पर विश्वास नहीं है.
बात जरा अटपटी लग सकती है. मगर यही मेरी समस्या है.
पिछले दिनों मैं प्लेटो तथा अरस्तु के दर्शन का अध्ययन कर रहा था. उन दोनों ने लगभग एक ही प्रकार से इस संसार को दो वस्तुओं से निर्मित माना है- जड़ पदार्थ और आकृति. प्लेटो ने जिसे प्रत्यय ( आइडिया ) कहा है, उसे ही अरस्तु आकृति कहते हैं. और दोनों के लिए आकृत या प्रत्यय ही ईश्वर है. जड़ पदार्थ आकृति हीन है, यानी निराकार है, मगर वह ईश्वर नहीं है. बल्कि ईश्वर वह है जो असल में सभी आकृतियों का मूल तथा आदर्श है. विशेष अन्दर जाना उचित नहीं है, मगर उदहारण के लिए- एक लकड़ी का टेबल है. उसमे जड़ पदार्थ तो है लकड़ी मगर उसका चौकोर होना तथा चौपाया/तिपाया होना ही उसका आकार है. यद्यपि पदार्थ और आकार कभी अलग अलग नहीं दीख पड़ते , परन्तु अगर चौकोर होनो और चौपाया/तिपाया होना हटा लिया जाये तो जड़ पदार्थ (लकड़ी) निराकार ही बचेगी. अर्थात इन पश्चिमी दार्शनिको के मत से ईश्वर निराकार नहीं है. बल्कि यह जड़ जगत ही असल में निराकार है. ईश्वर ने ही इसे आकार दिया है. बैबल में भी- उसने हमें अपनी ही छवि दे के रचा, अतः हमारा भी आकार उसके ही जैसा हो गया.
अब संस्कृत और भारतीय दर्शन की बात करते हैं. जहाँ तक मेरी समझ है, ( अगर भूल रहा हूँ, तो याद जरूर दिलाईयेगा.) की मध्वाचार्य के समय तक संस्कृत के किसी भी कवि ने किसी भी पुस्तक में ईश्वर को निराकार कह के संबोधित नहीं किया है. अवश्य ही संस्कृत में ऐसे कुछ शब्द हैं, जिनका अनुवाद भूले और भोले हिंदी या अन्य भाषाओ के लेखक और कवि निराकार में कर देते हैं, मगर ऊपर चर्चा किये गए व्याकरण के गुण के अनुसार असल में कहीं भी उन संस्कृत शब्दों के अर्थ निराकार से नहीं है. यहाँ पर मैं कुछ प्रसिद्द संस्कृत शब्दों का उल्लेख करना चाहूँगा ; -
अव्यक्त - अव्यक्त के दो मतलब होते हैं. पहला वह जो व्यक्त न हो. यानी जिसे प्रत्यक्ष द्वारा प्रमाणित नहीं किया जा सके (न्याय दर्शन का अर्थ). जैसे - भावना, मन, आत्मा, इत्यादि. इसके ठीक विपरीत का शब्द होगा- व्यक्त, जो प्रत्यक्ष है.
दूसरा मतलब है वह जो व्यक्तीकृत न हो. अंग्रेजी में इसके लिए एक शब्द है- Impersonified. उदाहरण के लिए सभी जीव जंतु तो व्यक्तीकृत होते हैं परन्तु निर्जीव पदार्थ, जैसे पहाड़, नदी, ग्रह इत्यादि का व्यक्तिकरण नहीं हो सकता. इसका ठीक उल्टा होगा व्यक्तित्व अर्थात personality/personaified.
इन दोनों ही अर्थों का वस्तु के आकार से कुछ भी लेना देना नहीं है. परमाणु हमारे लिए व्यक्त नहीं है, मगर इसका यह मतलब नहीं की उसका कोई आकार नहीं है. भारत देश का हम व्यक्तिकरण नहीं कर सकते, मगर इस से भारत निराकार साबित नहीं हो जाता.
निर्गुण - इस सब्द के भी दो अर्थ हैं. सांख्य दर्शन के अनुसार जो सत्व, राजस और तामस; इन तीन गुणों(वस्तु की परिस्थिति) से परे है, वही निर्गुण है. जैसे- निर्वाण. इसके उलटे शब्द होता है त्रिगुणात्मक, जो तीनो गुणों से घिरा हुआ है.
दूसरा मतलब है वैशेषिक वालों का, की निर्गुण वह है, जिसमे कोई भी गुण(विशेषता) न हो.[यद्यपि मैंने यहाँ सबसे सटीक भाषा का प्रयोग नहीं किया है, मगर हिंदी आखिर तो संस्कृत की बेटी है, सो जरा छोटी है.] उदाहरण के लिए - आत्मा. इसके विपरीत शब्द होगा- गुणवान.
इन दोनों अर्थो का भी निराकार से कुछ लेना नहीं है. क्योंकि गुण का अर्थ कहीं भी आकार नहीं है. हाँ, बड़े या छोटे आकार का होना जरूर एक गुण है. और किसी आकार का न होना भी एक गुण ही है. यह तो आकाश का गुण है. अतः निराकार आकाश कहीं से भी निर्गुण नहीं नजर आता है.
निर्विशेष - यह शब्द शंकराचार्य का प्रिये है, और उन्होंने हर बार ईश्वर के निर्विशेष स्वरुप की महत्ता स्थापित की है. उस चर्चा में जाना यहाँ विषयांतर होगा.
निर्विशेष का सीधा सा वही अर्थ है जो वैशेषिक दर्शन वालों ने बताया था- वह जो विशेष तथा सामान्य से हीन है. यहाँ विशेष और सामान्य का अर्थ जान लेना जरूरी है. सामने वह है जो एक जाति की सभी वस्तुओं में पाई जाती है. जैसे सभी गायें चौपाई होती हैं, अतः चौपाया होना गायों का सामान्य गुण है. परन्तु किसी के गाय को दुसरे गाय से भिन्न किया जा सकता है, जैसे काली गाय और सफ़ेद गाय. अतः काला और सफ़ेद होना दो अलग अलग गायों का विशेष गुण है. इस से तो निर्विशेष का सीधा सीधा अर्थ है सभी सामान्यताओ और विशेषताओ से परे. इसका एकमात्र उदाहरण संसार में ईश्वर ही है. इसी कारण यह शब्द शंकराचार्य को प्रिये है. बाकी सभी शब्दों के अन्य उदाहरण भी मिल जाते हैं. मगर निर्विशेष सिर्फ ईश्वर ही है.
मगर इस शब्द से भी यह साबित नहीं होता की ईश्वर निराकार है.
अब मेरी यही समस्या है.
आप सब लोग मेरी समस्या को हल करने में मेरी मदद करें.
क्या ईश्वर का कोई निराकार स्वरुप है?
अगर है तो किसी भी प्राचीन या मध्य- युगीन दार्शनिक ने निराकार शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया?
अगर किया है, तो किस संस्कृत पुस्तक में इस शब्द का उल्लेख है?
[तुलसीदास के रामचरितमानस में उत्तरकाण्ड में भगवान शिव के लिए एक शब्द आता है- निराकर्मोंकार्मूलम तुरीयं. मगर यह पद तुलसीदास का नहीं है, बल्कि पूर्व कल्प में किसी घोर कलयुग के समय उज्जैनी के एक ब्रह्मन ने अपने शिष्य को शिव के शाप से बचाने के लिए यह पद रचा था. अतः इसका प्राचीन या मध्य युगीन भारतीय दर्शन और संस्कृत भाषा से कोई लेना देना नहीं है, ऐसा मेरा मानना है.]
अगर किसी के पास मेरे प्रश्न का कोई उत्तर हो, तो कृपया कमेन्ट करे. मेरा यह नया पोस्ट आपका इन्तेजार कर रहा है. और मैं तो कब से सत्य के प्रतीक्षा में हूँ.
जय श्री राम.
हरे कृष्ण.