शुक्रवार, 18 जून 2010

काम

[इस बार का ब्लॉग स्पेशल रूप से पुरुषोत्तम के लिए है| पुरुषोत्तम मेरे कॉलेज का दोस्त रहा है | आज भी (जब कि हम दोनों काफी दूर रहते हैं, एक दूसरे से) वो मेरे लिए सबसे स्पेशल दोस्त है | यजमान, ये तेरे लिए- ]


कार्य-कारण  

कई दिनों से सोच रहा था | फिर सोचा कि जो सोचा है, उसे अपने मित्रों से बाँटना भी चाहिए | पता नहीं कितने लोग मुझ से इत्तेफाक रखेंगे, मगर इतना तो भरोसा है ही सभी अपने मित्र हैं, अतः हमारी बात और सोच को समझेंगे जरूर | चाहे उनकी सोच हमारी सोच से मेल खाए, या नहीं |
अस्तु!
बहुत दिनों से सोच रहा था, कि- " दुनिया बनाने वाले! क्या तेरे मन में समाई ? तुने कहे को दुनिया बनाई?"

तुलसीदासजी से पूछा तो उन्होंने कहा- 'कर्म प्रधान विश्व करी राखा| जो जस करही, सो तस फल चाखा ||'
मगर मैंने कहा कि गोस्वामीजी, कर्म तो इस विश्व के अंदर ही है; वैकुण्ठ में तो कर्म और फल का कोई चक्कर ही नहीं है| वहाँ तो भगवान कि दिव्य सेवा और उस आनन्द का राज है | फिर इस विश्व का कारण कर्म कैसे हो सकता है?
गोस्वामीजी ने बड़े ही प्यार से उत्तर दिया- "होई सोई जो राम रची राखा | को करी तर्क बढ़ावहि शाखा ||"

मैं हैरान परेशान हो गया|
'गोस्वामीजी, ये तो किस्मत पर भरोसा करने जैसा हो गया | और भगवान के सच्चे भक्त तो किस्मत की बातें नहीं करते |'
गोस्वामीजी ने कहा-"हरि इच्छा भावी प्रबल-"
फिर कहा-'बेटा! मेरी बातें शायद तुम्हे समझ में न आए | जाओ, सीधे भगवान से ही पूछ लो | वो भी यही कहेंगे | हाँ! तुम्हारा यह कहना सही है कि कर्म या किस्मत इस संसार का कारण नहीं हो सकता, परंतु हरि की इच्छा इस जगत का कारण है| यह इच्छा कर्म या किस्मत की गलियों में नहीं भटकती, वरन इनसे अलग ले जाती है | जाओ- सीधे भगवान से ही पूछ लो-'

और मैं भगवद्गीता के पास आया-"गीता मैया! गोस्वामीजी ने जो कहा उसका मतलब मैं नहीं समझा| ठीक है कि संसार का उपादान कारण ( वह मैटेरिअल जिससे दुनिया बनी है-) प्रकृति है -"सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः"(३/५)|
जैसे अगर कोई कुम्हार घड़ा बनाता है तो उस घड़े का निमित्त कारण तो वह कुम्हार खुद होता है, उपादान कारण मिट्टी होती है | तो दुनिया का उपादान कारण तो त्रिगुणात्मक प्रकृति है | निमित्त कारण हैं स्वयं श्री भगवान | "सर्ववास्थं करणं ईशो अहं बीजप्रदः पिता" (१४/४)|

मगर एक सवाल और है गीता मैया!"
गीता मैया ने पूछा- "क्या सवाल है? पूछो| भगवान ने मुझे इसीलिए प्रकट किया है कि मैं किसी जीव को अनुत्तरित न रहने दूँ| पूछो! श्रीभगवान प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देंगे |"
मैंने कहा-"लोग सामान्यतया ये मानते हैं कि किसी भी कार्य के दो ही कारण होते हैं- 'उपादान' और 'निमित्त' | मगर दो और कारण भी तो होते हैं- ' स्वरुप' कारण और 'उद्देश्य' कारण |
मुझे इन्ही दो कारणों के बारे में जानना है | तभी कार्य-कारण का असल निर्णय हो पायेगा |
गीता मैया ने कहा- "बेटा! तो सुन-

पांच प्रकार के कारण-
तुमने जो कहा कि कारण चार हैं, यह बात अधूरी है! यह बात मात्र बुद्धिवाद की उपज है! बुद्धि की एक सीमा है- महत-तत्व तक! बुद्धि महत-तत्व के आगे नहीं जान सकती! मगर उसके आगे प्रकृति है, और उसके भी आगे हमारा असली स्वरुप, असली धाम और असली मित्र रहता है| अतः वही सुनो जो हमारे मित्र ने कहा था कि असल में किसी भी कार्य के पांच कारण होते हैं-
१. निमित्त कारण- वह जो कार्य करता है | कर्ता वही कहलाता है | कार्य या अन्य तीनों कारण कर्ता नहीं कहे जा सकते| कर्ता तो मात्र निमित्त कारण ही होता है |जैसे मूर्तिकार, जो मूर्ति बनाता है| या फिर कुम्हार, जो घड़ा बनाता है | भगवान ने भी इसे कर्ता ही कहा है |(१८/१४)
२. उपादान कारण- वह कच्चा माल और औजार, जिसके द्वारा कार्य संपन्न किया और बनाया जाता है | यही कार्य की वस्तु और तंत्र है| जैसे सोना या धातु, जिससे मूर्तिकार मूर्ति बनाता है, और उसके छेनी-हथौड़ी आदि औजार| या फिर मिट्टी और चाक, जो घड़े के तंत्र और वस्तु हैं| भगवान ने इसे ही करण की संज्ञा दी है|(१८/१४)
३. स्वरुप कारण- जब भी कोई मूर्तिकार कोई मूर्ति बनाता है, तब उसके मन में पहले से ही उस मूर्ति की एक छवि वर्तमान रहती है| वह उसी छवि के नक़ल में अपनी सोने आदि धातु की मूर्ति बनाता है| इसी तरह जब कुम्हार घड़ा बनाता है, तब उसके भी मन में एक पूर्व-कल्पित घड़ा रहता है; गोल, अंडाकार, या सुराही!!! वह इसी कल्पना के आधार पर घड़ा बनाता है| इसीलिए, मूर्ति और घड़े का आकार उनके निमित्त कारण मूर्तिकार और कुम्हार के मन के संकल्पना, या फिर कहें कि उनकी इच्छा पर निर्भर कर्ता है | यही इच्छा या प्रत्ययात्मक संकल्पना ही इन दोनों का स्वरुप कारण है | श्री हरि ने इसे ही दैव कहा है |(१८/१४)
४.  उद्देश्य कारण- मूर्तिकार मूर्ति क्यों बनाता है? या फिर कुम्हार घड़ा क्यों बनाता है? दूसरे शब्दों में, क्या कारण है कि मूर्ति और घड़े का निर्माण हुआ? मूर्ति सजावट, सुंदरता, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य या पूजन के लिए बनाई जा सकती है| कुम्हार के बर्तनों और घडो का निर्माण पानी रखने, अन्न सहेजने या भोजन पकाने आदि के लिए हो सकता है| कार्यों का यह लक्ष्य है उनका उद्देश्य कारण है | भगवान इसे ही चेष्टा कहते हैं |(१८/१४)
५. आधार कारण- मूर्तिकार और कुम्हार आदि कर्ता भूमि आदि आधार पर ही अपने कार्य संपन्न करते हैं| वे निर्वात में तो कुछ भी नहीं कर सकते! फिर उनके कार्य को सहयोग देने के लिए देश-काल और परिस्थितियां भी होनी चाहिए| ये सब मिलकर कार्य का मूल-आधार तैयार करती हैं| यही कार्य का आधार कारण है| प्रभु इसे ही अधिष्ठान का नाम देते हैं|(१८/१४)

संसार के कारण-
 संसार भी तो महा विरत- कार्य ही है| फिर इसका कारण क्या है?
जाहिर सी बात है, इसके भी पांच कारण हैं; क्योंकि हर कार्य के पांच कारण होते हैं, और कार्य-कारण ही एकमात्र ऐसा नियम है, जिसका कोई अपवाद नहीं होता |
१. संसार का निमित्त कारण- भगवान (नास्तिकों के लिए विज्ञानं (consciousness))
२. संसार का उपादान कारण- प्रकृति (नास्तिकों के लिए पदार्थ (matter))
[अब यहाँ से नास्तिकों की परेशानी शुरू होगी- क्योंकि ये तीनों कारण उनके लिए नए हैं| किसी ने क्या खूब कहा है -'जरूरी नहीं है कि हर ज्ञान आपको दे ही दिया जाये!?! कुछ छुपा के भी रखा जाता है; क्योंकि अगर आप सब जान जाएँगे, तो फिर छुपाने वाला क्या करेगा?!?']
३. संसार का स्वरुप कारण- इसके लिए मैं तुम्हे एक सीधा सा सूत्र देती हूँ, जो सूत्र श्री भगवान ने अर्जुन को दिया था|
"यथेच्छसि तथा कुरु" (१८/६३)"


मैं फेर में पड़ा| गीता मैया यह तो श्रीकृष्ण ने कहा कि अर्जुन मैंने तुझे सब कुछ बतला दिया, अब जो तेरी इच्छा हो, सो कर |
इसके उत्तर में जो मिला वो मैं आगे लिखूंगा; अभी संसार के चौथे कारण के बारे में गीता जी से सुनते हैं-

४. संसार का उद्देश्य कारण - गीताजी ने आगे कहा- "और इस संसार का एक उद्देश्य भी है! संसार अकारण ही नहीं है! आस्तिक इसे मोक्ष के उद्देश्य से मानते हैं, नास्तिक भोग के उद्देश्य से| मगर यह संसार सोद्देश्य है, निरुद्देश्य नहीं| कुछ पागल होते हैं, जो इसे यंत्रवत तथा उद्देश्यहीन मानते हैं, मगर उनकी मैं बात नहीं करती| मैं तो वही कहूँगी, जो भगवान ने अर्जुन से कहा था- "शरणं-"(कई अध्यायों के, कई श्लोकों में)|

मैं थोडा समझा थोडा भूला | गीता मैया, ये कैसे? संसार का उद्देश्य तो मोक्ष नजर आता है! शरण-???
गीता जी ने जो समझाया वह आगे लिखूंगा| अभी-

५. संसार का आधार कारण- गीता मैया ने कहा- "तद्धाम परमं मम|"(८/२१)

[अब यहाँ से मैं अपनी टूटी फूटी भाषा में संसार के स्वरुप कारण, उद्देश्य कारण और आधार कारण कि चर्चा करूँगा | यद्यपि समय की कमी है, तथापि और इसी कारण आज सिर्फ स्वरुप कारण कि चर्चा कर पाउँगा |]
{पुरुषोत्तम - " साले पंडित! मरवाएगा क्या? क्या बकवास कर रहा है? वो  मुख्य बात कहा है जिसके लिए मैं तेरा इतना लंबा भाषण पढ़ रहा हूँ?"
रंजन-" यहाँ से शुरू होता है यार| Here comes the Sun. And I say-'it's alright.'" }

स्वरुप कारण /दैव 
तो, संसार का स्वरुप कारण है इच्छा|
क्या आपलोगों ने वेदों से ये नहीं सुना- "स इच्छत " |
ये दुनिया भगवान की इच्छा से बनी है| अलग अलग लोग, अलग अलग तरह से इस इच्छा की व्याख्या करते हैं| कुछ कहते हैं कि उसने इच्छा की कि एक से अनेक हो जाए | कुछ कहते हैं कि उसने इच्छा की कि प्रकाश हो जाए | कुछ कहते हैं कि उसने इच्छा कि उसको जानने वाले हों |
असल में इच्छा बड़ी ही शक्तिशाली वस्तु है| लोग अपने अपने स्थिति के लिए कर्म और भाग्य को दोष देते फिरते हैं, मगर असल दोष तो उनकी इच्छा का है| उनकी चाहत ही यही थी, इसलिए वे ऐसे हैं, जैसे हैं |
" जबसे मैंने तुम्हे पाने की चाहत की है, तबसे पूरी कायनात ने हमें मिलाने की साजिश की है |"
 सुनाने में बड़ा अजीब सा लगता है, मगर है सच |
हमारा चित्त तीन परतों का बना है, और ये तीन परतें हमारे असली स्वरुप को घेरे रहती हैं| १. मन, २. बुद्धि और ३. अहंकार | (some people try to describe this as- conscious, sub-conscious and un-conscious parts)
चित्त के बाहरी परत, मन में तरह तरह के विचार उठते-गिरते रहते हैं| मन का काम ही यही है| इन विचारों को संकल्प और विकल्प कहते हैं | संकल्प माने नया विचार और विकल्प माने उस विचार का प्रत्युत्तर | ये बार बार आते-जाते रहते हैं| जीवन का कोई ऐसा क्षण नहीं जाता, जब मन में संकल्प-विकल्प न उठे| (सिवाय समाधिस्थ योगी के) ये कुछ ऐसा ही है, जैसे हम किसी दीवार पर कोई कील रखें और फिर हटा ले| फिर रखें, फिर हटा ले| फिर रखें, और फिर हटा ले| ये जो विचारों का आना और जाना और फिर आना और फिर जाना है; यही मन का असल स्वरुप है| 
 मगर इन्ही संकल्पों में से कुछ संकल्प बार बार हमारे मन में आते हैं | क्योंकि विकल्पों से उनका समाधान नहीं हो पता | तब मन अपने higher authority,  बुद्धि को वह संकल्प refer कर डालती है | यहाँ से वह संकल्प बुद्धि की समस्या होती है कि कैसे उसका समाधान किया जाए? यह कुछ कुछ दीवार में हथौड़े से कील ठोंकने के समान है | और यहाँ से संकल्प का नाम बदल के हो जाता है- संस्कार | सम+कार (बार-बार किया जाने वाला संकल्प)|
बुद्धि अगर शुद्ध और शक्तिशाली हो तो वह जीव के मित्र की तरह काम करती है| वह उस संस्कार का शुद्धिकरण करती है, ताकि जीव उससे विचलित न होने पाए और अपने उद्देश्य से न भटके| इस क्रम में वह शुद्ध हुए संस्कार को , जिसे वैदिक भाषा में निर्णय कहते हैं, फिर से मन को transfer कर देती है, और मन उसे ही प्रथमतः प्राप्त संकल्प का विकल्प मानकर delete कर देती है | (ही ही ही! काफ़ि official और technical शब्दों का प्रयोग कर लिया)
पर कभी कभी संकल्प इतना गाढ़ा और इतना शक्तिशाली होता है, कि बुद्धि भी उस संस्कार का समाधान नहीं कर पाती | ऐसी स्थिति में बुद्धि से भी आगे वह संस्कार हमारे अहंकार में धस जाता है | कील दीवार में ठुक जाती है | जब वह चीज हमारे अहंकार से जुड जाती है, तब अहंकार के पास उसका एकमात्र समाधान होता है- जो संकल्प किया है उसे पूरा करो| 
इसे ही इच्छा या कामना (संस्कृत में काम) कहते हैं | और इसी कामना के चक्कर में हमारी बुद्धि, हमारा मन, हमारी इन्द्रियां और हमारा शरीर लगा रहता है| उसी के लिए कर्म करता है | उसी के लिए नए नए उत्पादन (अविष्कार, कार्य, निर्माण आदि) करता है| फिर उस कर्म से उस कामना का समाधान ढूँढता है, जिसे वह फल, किस्मत, भाग्य, पुरस्कार, भोग आदि का नाम देता है | अगर कामना सरल हो तो फल जल्दी मिल जाता है, अधिक कर्म नहीं करना पड़ता; जैसे ऑक्सीजन पाने की इच्छा हो, तो साँस लेने के कर्म मात्र से ही किस्मत खुल जाएगी, इच्छा पूर्ण हो जाएगी| मगर कामना क्लिष्ट हो, तो कर्म लंबा और भाग्य प्रतीक्षारत होता है | जैसे, यदि भारत का राष्ट्रपति बनाने की इच्छा हो, तो ---"
(इसी कारण पूर्व-मीमांसकों ने कर्म के तीन प्रकार बताएं हैं- १. क्रियमाण, जो तुरंत फल देता है| २. अर्जित, जो इसलिए अर्जन किया जाता है, कि कामना पूर्ण होने में अभी कुछ कर्म बाकि है | ३. संचित, जो बाकि बच के हमारे कर्म के पिटारे में जमा हो जाते हैं, अगर हम इस जन्म के पूरा होते तक अपने कामना को न पा सके; और अगले जन्म में हमें बाकी के बचे हुए कर्म ही करने रह जाते है| फिर से शून्य-० से शुरू नहीं होते| खैर इसकी चर्चा बाद में)
इस प्रकार हमने देखा कि कामना दो प्रकार की होती है- १. सरल और  २. क्लिष्ट|
मगर कामना को हम प्रबलता के आधार पर भी बाँट सकते हैं- १. सबल और २. दुर्बल | कामना जितनी सबल होती है, उसके पूर्ण होने में उतना ही कम कर्म और कम भाग्य की आवश्यकता है| मगर दुर्बल इच्छा को अधिक कर्म और अधिक भाग्य कि जरूरत है| अर्थात, सबल कर्म सरल और दुर्बल कर्म अधिक क्लिष्ट दिखाई पड़ते हैं|
 हम जितना अधिक कर्म करते जाते हैं, कामना उतनी ही अधिक प्रबल और भाग्य उतना ही अधिक बेमानी होता जाता है| इसका उल्टा भी ठीक है- अगर हम इच्छा को ही अत्यंत प्रबल कर ले , तो अधिक कर्म कि जरूरत ही नहीं रह जाएगी| मगर इस अवस्था को इच्छा की पूर्णता कहते हैं| यह अवस्था, जीव के लिए संभव नहीं है| भगवान की ही इच्छा पूर्ण होती है| इसीकारण, वे जैसे ही इच्छा करते हैं, वैसे ही उसका समाधान हो जाता है|
उसने कहा कि प्रकाश हो जाए, और प्रकाश हो गया| उसने इच्छा की वो अनेक हो जाए और सारे जीव प्रकट हो गए|
अतः काम ही इस संसार का स्वरुप कारण है| भगवान ने जिस उद्देश्य से यह दुनिया बनाई, उस उद्देश्य के मूल में जो इच्छा है (जिसे वेद 'स इच्छत' आदि से इंगित करता है), वही संसार का दैवीय कारण है| इसी कारण अगर गोस्वामीजी कहते हैं कि "हरि इच्छा भावी प्रबल-", तो कुछ गलत नहीं कहते हैं|

आज इतना ही| इससे तो मात्र काम ही परिभाषित हुआ है| अभी धर्म, अर्थ और मोक्ष बाकी है |
अगली बार, उद्देश्य और आधार की  चर्चा करेंगे|
शेष फिर-
तब तक के लिए- हरे कृष्ण|
गोविन्दं आदि पुरुषं, तं अहं भजामि ||