शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

एक लेख, भगवद्गीता को समर्पित.


श्री श्री गुरु गौरंगो जयते॥
सभी भग्वद्रसानुरगियो को जय श्री कृष्ण।
श्रील गुरुदेव श्री श्रीमद् भक्तिवेदांत नारायण गोस्वामी महाराज के चरण कमलों में शत कोटि नमन करके मैं इस लेख की शुरुआत करता हूँ। श्रीमद् भगवद्गीता जी भगवन श्री कृष्ण के मुख कमल से निःसृत वह मधुर धारा है, जिसने सहस्रों वर्षों से अनेकानेक जीवों का कल्याण करते हुए उन्हें भग्वद्प्रेम और कृपा के रस से सराबोर कर दिया है।
भगवन व्यास तथा उनके अनुगामी विद्वत समाज ने श्री गीता जी को प्रस्थानत्रयी में महान उच्च स्थान प्रदान किया है। इतना ही नही, मुझे लगता है कि गीता जी सभी विषयों पर निर्णय देने तथा ज्ञानार्थी जिज्ञासुओं कि पिपासा पुर्णतः शांत करने में अकेली ही सक्षम हैं। किसी जीव के अज्ञान का बोझ इतना बड़ा नही हो सकता जितनी शक्तिशाली ज्वाला गीता जी के एक श्लोक, एक अर्धाली, अथवा मात्र एक पद में है, जो संसार भर कि अज्ञान-राशि को क्षण भर में जला कर भस्म कर सकती है। आगे हम कुछ ऐसे पदों कि चर्चा करेंगे, जो स्वयं ही "गागर में सागर" के भावः को चरितार्थ करती हैं।
श्री गीता जी के विषय में विचार करने से पूर्व दो चार बातों पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है। ये बातें गीता जी के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य नियमावली के सामान हैं, जिनका पालन करने पर ही वे गीता जी के असली कृपा का रसास्वादन कर सकेंगे।
पहली बात है श्री कृष्ण में विश्वास करना। श्रीकृष्ण ही गीता जी के प्रथम वक्ता तथा अर्जुन प्रथम अनुमोदक हैं। इस बात को अस्वीकार करना बहुत बड़ी मुर्खता होगी। कुछ लोग यह सोच लेते हैं कि श्रीकृष्ण ने गीता नही कही। बल्कि यह किसी विद्वान या विद्वान्-मंडली के बुद्धि का कमाल है। एक ही व्यक्ति कुछ ही मिनटों में संसार के सर्वश्रेष्ठ धर्म कि बात इतनी आसानी से कैसे कर सकता है?! मगर यही तो श्री गीता जी कि महिमा और उनका चमत्कार है।
दूसरी बात है श्रीकृष्ण कि भगवत्ता। कुछ महानुभाव ये स्वीकार ही नही करते कि श्रीकृष्ण भगवान् हैं। परन्तु गीता जी में ही अनेक स्थानों पर श्रीकृष्ण ने स्वयं को भगवान् घोषित किया है। इन प्रसंगों के विषय में ऐसे लोग यह कहते हैं कि श्रीकृष्ण नही बोल रहे हैं। उनके भीतर बैठा परमात्मा या उनका आत्म-तत्त्व बोल रहा है। लेकिन गीता जी कि ठीक से सेवा करने पर यह बात पता चलती है कि जब जब किसी परमात्मा या आत्म-तत्व कि चर्चा हुई है; वह अलग से हुई है। श्रीकृष्ण जब भी अपनी बात करते हैं तब 'अहम्' शब्द का प्रयोग करते हैं। तथा जब भी आत्मा या परमात्मा की बात करते हैं, तब उसका नाम लेते हैं अथवा 'तत्' शब्द का प्रयोग करते हैं। इस बात कि विशेष चर्चा हम तब करेंगे; जब अठारहवें अध्याय पर विमर्श होगा।
टीसती बात है परमादेश का पालन। श्रीकृष्ण ने गीता जी में तीन स्थानों पर शरणागति का आदेश दिया है। शरणागति जीवन के हर क्षेत्र में अवश्यक है। यहाँ तक कि गीता जी को समझने और उनका मुख्य उद्देश्य प्राप्त करने के लिए भी (देखिये अध्याय-२, श्लोक-४९)।
चौथी बात है गीता जी कि सत्यता तथा अधिकारिता पर विशवास। गीता जी का प्रत्येक श्लोक, प्रत्येक पद, प्रत्येक शब्द, प्रत्येक अक्षर; सत्य तथा चेतन है। ऐतिहासिक रूप से, व्यावहारिक रूप से, बौद्धिक रूप से तथा अन्य किसी भी रूप से। गीता जी में क्षेपक तथा काल्पनिकता की करना सबसे बड़ी मुर्खता है।
--शेष फ़िर।

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