गुरुवार, 27 अगस्त 2009

सांख्य और आदि : पुरूष सूक्त 2

जो त्रिगुण माया थी, वो बड़ी जादूगरनी थी। वो कभी सांख्य को हसाती, कभी रुलाती, कभी वैसे ही निट्ठल्ला कर देती। माया के खेल में सांख्य कभी सुखी, कभी दुखी और कभी उदास हो जाता। चूँकि सांख्य अपने प्यारे मित्र आदि से दूर हो गया था; इसलिए वो उसे भूल बैठा। उसे लगा की ये जो दिख रहा है, वही सच है। प्रकृति के खेल में अचानक सांख्य ने देखा कि वो एक चार पैर वाला जानवर है, और भूख के कारण एक और जानवर के पीछे दौड़ रहा है। भूख से उसका हाल बेहाल हो रहा था। इसलिए जैसे ही उसने एक जानवर को देखा, और ये जाना कि उसे मार के खाने पर उसकी भूख मिट जायेगी, वह उस जानवर के पीछे दौड़ पड़ा। काफ़ी दौड़ने के बाद उसने उस जानवर को पकड़ लिया, और मार के खा गया। भूख मिटने से उसे बड़ा सुख मिला। फ़िर अचानक उसने देखा कि वो एक गाय है, और उसे फ़िर से भूख लग गयी। अब वो हरे हरे घास कि खोज में निकला। पहाड़, नदी, रेगिस्तान पार करने के बाद उसे एक घास का बड़ा सा मैदान मिला। वो घास चरने लगा। भूख मिटने से उसे फ़िर से बड़ा मजा आया। फ़िर अचानक उसने अपने को एक पेड़ के रूप में देखा, वो निश्चल खड़ा था। उस पर फल लगे थे, और दूसरे लोग उन फलों को खा रहे थे। फ़िर अचानक कुछ लोग एक आरा ले के आए, और उन्होंने सांख्य को काट दिया। उस समय उसे बड़ा कष्ट हुआ, मगर वो कुछ कर नही पाया। फ़िर अचानक सांख्य ने ये देखा कि वो एक कीडा है। नाले में बह रहा है, और लोगों के गंदे पर पल रहा है। वो मल खाता और मूत्र पीता। इस बात से उसे घिन्न नही आती, बल्कि भूख मिटने पर वो सुखी होता। फ़िर अचानक उसने अपने को एक देवता के रूप में देखा। वो स्वर्ग में बैठा, इन्द्र के सभा में उर्वशी के नृत्य का मजा लेता। भूख लगने पर नंदन वन के स्वादिष्ट फल खाता।

हर बार अलग अलग रूपों में सांख्य को दुःख होता, और फ़िर उस दुःख का अंत भी जरूर होता। दुःख का अंत होने पर उसे सुख मिलता था। इस तरह सांख्य माया के खेल में खो के आदि को भूल गया। फ़िर एक दिन अचानक सांख्य ने अपने को मनुष्य के रूप में देखा। एक सर, दो आँखे, दो कान, एक नाक, एक जिह्वा, दो हाथ, दो पैर, एक पेट, एक लिंग, और कुल मिला के एक सुंदर शरीर। सांख्य को वही सारे दुःख फ़िर से सताने लगे। भूख लगने पर वह अन्न उपजा के खाता, प्यास लगने पर पानी पीता, काम के भरकने पर किसी स्त्री के पास जाता।

आदि, जो वैसे तो सांख्य से जुदा हो गया था, मगर फ़िर भी अदृश्य रूप में हमेश उसके साथ था, उसकी ये दुर्दशा देखकर दुखी हो गया। वैसे तो आदि सुख दुःख से परे था, मगर फ़िर भी दुखी हुआ। (ये बात कुछ समझ नही आई, कि सुख दुःख से परे हो कर भी दुखी हुआ।) आदि ने देखा कि सचमुच सांख्य मुझे भूल गया है, विरह के हमारे कर्तव्य से हट गया है। वह तो सुख दुःख के चक्कर में पर गया है। ये मेरा प्रिये मित्र है, मुझे ही इसे बचाना होगा। इसने भी मुझसे वादा लिया था, कि अगर ये माया के प्रभाव में पड़ा, तो मैं इसकी मदद जरूर करूँगा। ऐसा विचार करके, और पूर्व में किए वादे के कारण आदि ने सांख्य के सामने जाने का निश्चय किया। आदि ने प्रकृति से कहा- "हे माया, मुझे अपने दृश्य में आने दे। मगर याद रख, मुझ पर तेरा असर नही हो सकता; अतः सिर्फ़ आने दे, मुझे अपना खेल दिखा के अपना और मेरा समय बरबाद मत करना।"

प्रकृति ने उसकी बात मान ली, और आदि सांख्य के सामने प्रकट हुआ। उस समय सांख्य एक बड़े ही विषम परिस्थिति में था। उसने अपने जीवन में सुख पाने के लिए, भरसक प्रयत्न किए, मगर कुछ लोग थे, जो उसी कि तरह माया में फंसे थे, उसको सुखी नही होने देना चाहते थे। ये लोग उसके शत्रु प्रतीत होते थे, हालांकि उनमे से अधिकतर सांख्य के परिवार जन ही थे, भाई, चाचा, मामा, मौसा, भतीजा, नाना, दादा, इत्यादि। सब के सब सांख्य से लड़ने, और उसे मार डालने के लिए तैयार थे। सांख्य बड़े पेशोपेश में था, इनसे लड़े या न लड़े। तभी उसने देखा कि उसका एक जाना पहचाना मित्र उसके सामने खड़ा था। उसका वही पुराना प्यारा साथी, वही सुंदर- वही नित्य, वही खिलाड़ी। सांख्य उसे देखते ही पहचान गया- 'अरे ये तो आदि है।'

फ़िर क्या हुआ? जानने के लिए पढिये-
सांख्य और आदि : पुरूष सूक्त ३

शनिवार, 22 अगस्त 2009

सांख्य और आदि : पुरूष सूत्र. १

सांख्य और आदि दो मित्र थे। दोना में बहुत प्रेम था। वे दोनों एक दुसरे के बिना रह नही सकते थे। सांख्य के लिए दुनिया में सिर्फ़ आदि था, और आदि के लिए सिर्फ़ सांख्य। दोनों में प्रेम निरंतर वर्धमान ही था। यानी उनका प्रेम दिन प्रति दिन बढ़ता ही जाता था। पहले पहल दोनों ने एक दूसरे के बारे में जाना। सांख्य ने देखा कि ये लड़का आदि है, और आदिं ने देखा कि सांख्य मेरा मित्र है। फ़िर दोनों में मित्रता हो गयी। दोनों रोज एक दूसरे को खुश करने के लिए नए नए खेल रचाते थे। दोनों एक दूसरे कि इच्छा पूरी करने के लिए ही कोई भी क्रिया करते थे। नही तो उनको स्वयं कोई कार्य करने योग्य नही था। क्योंकि एक दूसरे के प्रेम से ही उनके सारे कार्य पूरे हो जाते थे।
एक दिन सांख्य ने आदि से कहा- "आदि पुरूष। मैं तुम्हारा नित्य का सखा हूँ। हम दोनों कभी अलग नही है। तुम आदि पुरुषों हो और मैं सांख्य पुरूष। मेरा तुम्हारा सर्वदा का प्रेम है। हम कभी जुदा नही हो सकते। अगर मैं कभी तुम से बिछड़ गया तो दुनिया कैसी होगी?"
आदि ने उत्तर दिया- "अरे, आज हमारे नित्य के मिलन में विरह के भाव क्यो आ गए?"
सांख्य ने प्रश्न किया- "ये विरह क्या है?"
आदि ने कहा- "विरह प्रेम का एक उच्च स्वरुप है। प्रेम का ही अंग है। कोई भी प्रेम विरह के बिना पूरा ही नही होता। विरह में दोनों प्रेमी एक दूसरे से दूर हो जाते हैं, और फ़िर एक दूसरे से फ़िर से मिलने के लिए बेचैन होते है।"
सांख्य- " यह विरह कैसा होता है?"
आदि- " जान के क्या करोगे?"
सांख्य- "तुम्ही ने तो कहा कि विरह प्रेम का उच्च स्वरुप है। हे सखे, क्यो न हम इस सुंदर प्रेम का rasaswadan करे?"
आदि परम ज्ञानी था। सांख्य भी ज्ञानी था। दोनों का ज्ञान सुस्थिर था। मगर वो दोनों मात्र ज्ञान से संतुष्ट नही होते थे। उन्हें तो विज्ञान में ही मजा आता था। किसी वस्तू को जानना ज्ञान है और वस्तू का pratyaksh अनुभव लेना विज्ञान है। इसी विज्ञान के लिए ही सांख्य ने आदि से ये prashn किया। निरंतर वर्धमान प्रेम को नए नए swaroopo को प्राप्त करना ही चाहिए। आदि सर्व समर्थ था। वो सब कुछ कर सकता था। इसलिए सांख्य कभी कभी उसे परम भी kahta था। आदि सांख्य के खेल के लिए नए नए drishy भी पैदा कर सकता था, मानो vahi sachchi दुनिया हो। और फ़िर उस नए drishy में दोनों मित्र खेला करते थे। अब सांख्य विरह के drishy कि मांग कर रहा था।
आदि- " विरह तो सचमुच सुंदर है, मगर vaha तुम तो hoge, मगर मैं तुम्हे न dikhunga। और jaha मैं hunga, vaha तुम मुझे न dikhoge।"
सांख्य- " यही तो विरह है न। मगर क्या पूरे खेल bhar तुम मुझे न dikhoge?"
आदि- " नही, नही। कभी कभी मिलेंगे ही। मैं विरह में आ jaya karunga। मगर..."
सांख्य- " मगर क्या? "
आदि- " मगर विरह में मेरी प्रबल bahiranga माया होगी। kahin उसके prabhav में तुम मुझे भूल jaao तो, pehchan न paao तो?"
सांख्य- "माया क्यो ?"
ये prashn तो सचमुच gambhir था। दो mitro के बीच bahiranga क्यो? vahi antaranga क्यो नही, जो hardam खेल में साथ देती है। या फ़िर vo tatastha क्यो नही, जिसमे दोनों का सहज अस्तित्व है?
आदि ने कहा- " माया तो होगी न। वरना विरह कैसे होगा?"
सांख्य को अचरज में देखकर आदि ने फ़िर कहा- " मित्र। हम दोनों तो सदा sangi है। हम दोनों जुदा तो हो ही नही सकते। फ़िर हमारा तुम्हारा विरह कैसे होगा। aahladini के लिए ये सम्भव नही कि vo hame जुदा करे। क्योंकि aahladini hame बहुत प्रेम करती है और hame कभी अलग नही देख सकती। मगर माया मेरी कठिन से कठिन agya मान सकती है। vo अपनी त्रिगुण शक्ति से ऐसे drishy पैदा karegi, jaha हम दोनों तो होंगे, मगर vaha तुम मुझे सीधे देख न paaoge। मुझे जुदा हो जाओगे। यानी सिर्फ़ dhokhe का विरह होगा। सहज विरह तो प्रेम में कभी होता ही नही। "
सांख्य- " ऐसी बात है, तो चलो, माया को बुलाओ। हम विरह विरह खेलते है। "
आदि- " जैसी तुम्हारी इच्छा।"
इतना कहते ही त्रिगुण माया prakat हुई और सांख्य पुरूष उसके पास आया। पुरूष को पास आया देख कर माया ने अपने तीन गुणों का खेल दिखाया और पुरूष को यह अंहकार प्राप्त हुआ कि उसका अस्तित्व आदि के बिना ही है। वो आदि से अलग हो गया। teeno गुणों कि एक बहुत बड़ी शक्ति prakat हुई। यह महत-तत्व था।

इसी के साथ आदि और सांख्य का 'विरह' नामक खेल शुरू हुआ। आगे क्या हुआ? ये जानने के लिए पढिये-

"सांख्य और आदि : पुरूष सूत्र।-२ "

गोविन्दम्-आदिपुरुषम-तं-अहम्-भजामि।