जो त्रिगुण माया थी, वो बड़ी जादूगरनी थी। वो कभी सांख्य को हसाती, कभी रुलाती, कभी वैसे ही निट्ठल्ला कर देती। माया के खेल में सांख्य कभी सुखी, कभी दुखी और कभी उदास हो जाता। चूँकि सांख्य अपने प्यारे मित्र आदि से दूर हो गया था; इसलिए वो उसे भूल बैठा। उसे लगा की ये जो दिख रहा है, वही सच है। प्रकृति के खेल में अचानक सांख्य ने देखा कि वो एक चार पैर वाला जानवर है, और भूख के कारण एक और जानवर के पीछे दौड़ रहा है। भूख से उसका हाल बेहाल हो रहा था। इसलिए जैसे ही उसने एक जानवर को देखा, और ये जाना कि उसे मार के खाने पर उसकी भूख मिट जायेगी, वह उस जानवर के पीछे दौड़ पड़ा। काफ़ी दौड़ने के बाद उसने उस जानवर को पकड़ लिया, और मार के खा गया। भूख मिटने से उसे बड़ा सुख मिला। फ़िर अचानक उसने देखा कि वो एक गाय है, और उसे फ़िर से भूख लग गयी। अब वो हरे हरे घास कि खोज में निकला। पहाड़, नदी, रेगिस्तान पार करने के बाद उसे एक घास का बड़ा सा मैदान मिला। वो घास चरने लगा। भूख मिटने से उसे फ़िर से बड़ा मजा आया। फ़िर अचानक उसने अपने को एक पेड़ के रूप में देखा, वो निश्चल खड़ा था। उस पर फल लगे थे, और दूसरे लोग उन फलों को खा रहे थे। फ़िर अचानक कुछ लोग एक आरा ले के आए, और उन्होंने सांख्य को काट दिया। उस समय उसे बड़ा कष्ट हुआ, मगर वो कुछ कर नही पाया। फ़िर अचानक सांख्य ने ये देखा कि वो एक कीडा है। नाले में बह रहा है, और लोगों के गंदे पर पल रहा है। वो मल खाता और मूत्र पीता। इस बात से उसे घिन्न नही आती, बल्कि भूख मिटने पर वो सुखी होता। फ़िर अचानक उसने अपने को एक देवता के रूप में देखा। वो स्वर्ग में बैठा, इन्द्र के सभा में उर्वशी के नृत्य का मजा लेता। भूख लगने पर नंदन वन के स्वादिष्ट फल खाता।
हर बार अलग अलग रूपों में सांख्य को दुःख होता, और फ़िर उस दुःख का अंत भी जरूर होता। दुःख का अंत होने पर उसे सुख मिलता था। इस तरह सांख्य माया के खेल में खो के आदि को भूल गया। फ़िर एक दिन अचानक सांख्य ने अपने को मनुष्य के रूप में देखा। एक सर, दो आँखे, दो कान, एक नाक, एक जिह्वा, दो हाथ, दो पैर, एक पेट, एक लिंग, और कुल मिला के एक सुंदर शरीर। सांख्य को वही सारे दुःख फ़िर से सताने लगे। भूख लगने पर वह अन्न उपजा के खाता, प्यास लगने पर पानी पीता, काम के भरकने पर किसी स्त्री के पास जाता।
आदि, जो वैसे तो सांख्य से जुदा हो गया था, मगर फ़िर भी अदृश्य रूप में हमेश उसके साथ था, उसकी ये दुर्दशा देखकर दुखी हो गया। वैसे तो आदि सुख दुःख से परे था, मगर फ़िर भी दुखी हुआ। (ये बात कुछ समझ नही आई, कि सुख दुःख से परे हो कर भी दुखी हुआ।) आदि ने देखा कि सचमुच सांख्य मुझे भूल गया है, विरह के हमारे कर्तव्य से हट गया है। वह तो सुख दुःख के चक्कर में पर गया है। ये मेरा प्रिये मित्र है, मुझे ही इसे बचाना होगा। इसने भी मुझसे वादा लिया था, कि अगर ये माया के प्रभाव में पड़ा, तो मैं इसकी मदद जरूर करूँगा। ऐसा विचार करके, और पूर्व में किए वादे के कारण आदि ने सांख्य के सामने जाने का निश्चय किया। आदि ने प्रकृति से कहा- "हे माया, मुझे अपने दृश्य में आने दे। मगर याद रख, मुझ पर तेरा असर नही हो सकता; अतः सिर्फ़ आने दे, मुझे अपना खेल दिखा के अपना और मेरा समय बरबाद मत करना।"
प्रकृति ने उसकी बात मान ली, और आदि सांख्य के सामने प्रकट हुआ। उस समय सांख्य एक बड़े ही विषम परिस्थिति में था। उसने अपने जीवन में सुख पाने के लिए, भरसक प्रयत्न किए, मगर कुछ लोग थे, जो उसी कि तरह माया में फंसे थे, उसको सुखी नही होने देना चाहते थे। ये लोग उसके शत्रु प्रतीत होते थे, हालांकि उनमे से अधिकतर सांख्य के परिवार जन ही थे, भाई, चाचा, मामा, मौसा, भतीजा, नाना, दादा, इत्यादि। सब के सब सांख्य से लड़ने, और उसे मार डालने के लिए तैयार थे। सांख्य बड़े पेशोपेश में था, इनसे लड़े या न लड़े। तभी उसने देखा कि उसका एक जाना पहचाना मित्र उसके सामने खड़ा था। उसका वही पुराना प्यारा साथी, वही सुंदर- वही नित्य, वही खिलाड़ी। सांख्य उसे देखते ही पहचान गया- 'अरे ये तो आदि है।'
फ़िर क्या हुआ? जानने के लिए पढिये-
सांख्य और आदि : पुरूष सूक्त ३
1 टिप्पणी:
अतिसुंदर, सत्य रहस्य
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