गुरुवार, 17 सितंबर 2009

सांख्य : योग - १


हरे कृष्ण, दंडवत प्रणाम.
पिछली बार भगवान् कपिल के सांख्य दर्शन कि कृपा से श्री गीता जी को समझने की कोशिश की थी.
आज चलिए भगवन कपिल के सिद्धांतो को व्यवहारिक स्वरुप प्रदान कर के सजाने और सवारने वाले भगवन पतंजलि के योग दर्शन की शरण में चलते हैं.
श्री गीता जी में प्रथम और द्वितीय अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण ने सांख्य और योग दर्शन का प्रयोग किया है. यद्यपि द्वितीय अध्याय में वे अन्य सिद्धांतो कि भी झांकी देते हैं.
आत्म तत्व-
जब आदि पुरुष ने सांख्य को दुखी देखा तो उसे जोश दिलाते हुए कहा कि मित्र दुखी मत हो. जीवन-मरण से क्यों घबराते हो? यह तो इस मायिक संसार में सदा लगा ही हुआ है. जो पैदा होता है, वो तो मरता ही है. फिर शोक क्यों करना?
तुम अपने भाई बंधुओं के हिंसक स्वाभाव से डरते हो. सोचते हो कि इनसे लड़ने में मृत्यु ही मृत्यु है, नाश ही नाश है. ठीक सोचते हो, मगर यह तो होगा ही न. युद्ध न भी हो, तब भी मृत्यु तो होनी है-
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः .
अनाशिनो-अप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत .. (गीता- २/१८)
अविनाशी, अपरिमित और नित्य जीव के भौतिक शरीर का अंत होना ही है. अतः शोक त्यागो, युद्ध करो.
संसार रण क्षेत्र है. कौन बच के जाएगा? वही जो सत्य को जानेगा और असत्य को त्याग देगा. कि आत्मा ही सत्य है, और ये शरीर और इसके भोग आदि असत्य हैं. आत्मा का कभी नाश नहीं होता, और शरीर कभी अविनाशी नहीं हो सकता. सत्य और असत्य में जो भेद है, वही ज्ञानी पुरुष कि मुक्ति का कारण है. सत्य कभी ख़त्म नहीं हो सकता है और असत्य कभी सत्य नहीं हो सकता है-
नासतो विद्यते भावो न-अभावो विद्यते सतह.
उभयोरपि दृष्टो-अन्तस्त्वनयोस-तत्त्वदर्शिभिः.. ( गीता- २/१६ )
हे मेरे प्यारे सांख्य पुरुष, ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं कि मैं न रहा होऊं, तुम न रहे हो, या फिर ये सब लोग न रहे हों. और न ही आगे कभी ऐसा होगा. क्योंकि आत्मा तो अमर है. मृत्यु कोई दुखद प्रसंग नहीं है. बल्कि जैसे फटे पुराने कपडे बदल के लोग नया वस्त्र धारण करते हैं, उसी तरह ये नित्य आत्मा शरीर बदल लेती है. इस आत्मा को नष्ट करना तो दूर, कोई शक्ति इसे छु भी नहीं सकती.
सामान्यतः ही जन्म लेता है, उसकी मृत्यु भी होती है. इसी कारण शरीर का मारा जाना जाना जाता है. मगर आत्मा तो न ही कभी जनमती है, न ही उसकी मृत्यु होती है.
तुम्हारा और इन सभी लोगों का सच्चा स्वरुप तो आत्मा है, फिर जनमते-मरते शरीरों के लिए शोक क्यों? इस शोक को त्यागो और पहले सामने आये इस कर्तव्य का पालन करो- युद्ध करो.
देखो त्रिगुण मयी माया के विरूप परिवर्तन से जब तीनो गुण आपस में परिवर्तन करते हैं, तब सम्पूर्ण संसार और इसके जीव अव्यक्त स्वरुप से प्रकट होते हैं और जब प्रकृति का प्रलय हो जाता है तब सभी जीव-तत्व पुनः अव्यक्त हो जाते हैं. परन्तु तुम्हारा सत्-स्वरुप आत्मा तो विलक्षण है, तीनो गुणों से परे है.
इस भौतिक संसार में जब आत्मा स्वयं को शरीर से बंधा मान लेती है, तब वह इस शरीर के धर्मों से जुड़ जाता है. अतः उसका कर्तव्य है कि शरीर के धर्मो का निर्वहन करे और संसार में अच्छे अवस्था को प्राप्त करे.  तुम अभी क्षत्रिय बने हो, अतः तुमरे लिए उचित है कि युद्ध करो और स्वर्ग को प्राप्त करो. अगर अपने धर्म का पालन करोगे तो पुन्यवान होगे, अन्यथा पापी बनोगे और अपना यश को दोगे. यश का खोना तो धर्मी के लिए मृत्यु से भी बुरा है. 
अगर  पाप और अपयश से बचना है तो सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय का विचार त्याग कर अपने धर्म का पालन करो.

इस प्रकार आदि पुरुष गोविन्द ने सांख्य पुरुष अर्जुन के सामने आत्मा के स्वरुप, धर्म तथा कर्तव्य का वर्णन किया.
शेष फिर-
गोविन्दम् आदि पुरुषं तं-अहम् नमामि.