रविवार, 21 जुलाई 2013

धर्म {भाग -२}


२.
हमने पहले के ब्लॉगों में यह तो पढ़ा ही है कि चित्त की मूल वृत्ति "संकल्प, संस्कार और कामना" है | अर्थात, मन संकल्प करता है, बुद्धि संस्कार बनाती है और अहंकार कामना या इच्छा करता है | और फिर जब कोई एक इच्छा कर ली जाती है, तो फिर जीव उसी इच्छा की ही तरफ दौड़ने लग जाता है | यह जो चित्त की वृत्ति है, वही जीव की भी प्रवृत्ति होती है और फिर उसे उसी के अनुसार अगली धार्मिक परिस्थिति प्राप्त होती है | वह उसी अपने ख़ास प्रवृत्ति के अनुसार ही कर्म करता है और उसी प्रकार उसकी आगे गति होती है | बस यही धर्म के गति का मूल रहस्य है |
कुछ लोगों ने धर्म का एक बारह अरों वाले चक्र के रूप में वर्णन किया है (भगवान बुद्ध ने भी ऐसा ही कहा है), जो अज्ञान/अविद्या से आरम्भ होता है और जन्म-मरण के अनवरत चक्र तक पहुँचता है | आइये, इसे विस्तार से समझने का प्रयत्न करते हैं |
जब प्रारंभ में इस संसार की सृष्टि हुई, तो पुरुष ने प्रकृति में क्षोभ किया | इसके फलस्वरूप सर्वप्रथम पुरुष अपने स्वाभाविक सत्य स्वरुप को भूल गया | यह जो अपने सत्य स्वरुप से विलगाव और प्रकृति से लगाव हुआ, उसे ही अज्ञान कहा जाता है | प्रकृति का सबसे मौलिक और आरंभिक स्वरुप यही है, और इसी कारण प्रकृति को अविद्या कहा गया है | असल में यह प्राकृत अज्ञान कोई सचमुच का अज्ञान नहीं है, बल्कि सिर्फ अपने सहज ज्ञान और अपने सत्य स्वरुप का 'भूल जाना' मात्र है | यानि पुरुष प्रकृति के सामने आया और अपने ज्ञान को भूल गया | यह अविद्या/अज्ञान हुआ और यह धर्म-चक्र का सबसे पहला चरण है |
इसके बाद पुरुष अपने स्वाभाविक 'आत्मा' ऐसे स्वरुप को भूल कर 'जीव' ऐसे स्वरुप को जानता है | यानि 'मैं निर्मल, नित्यमुक्त, सच्चिदानन्दमय आत्मा हूँ' इस बात को भूक कर अपने को प्रकृति में घिरा पाता है | इस स्वरुप में वह अपने को अपने मौलिक मित्र श्री भगवान से बिछड़ा हुआ पाता है, और इसकारण अपने स्वयं के अस्तित्व को ही सत्य मान बैठता है | यह अवस्था ही अहंकार इस नाम से जानी जाती है | अर्थात पुरुष अपने स्वाभाविक स्थिति को भूल कर प्राकृत स्थिति, जिसे "महत्तत्व" कहा जाता है, को अपनी असली स्थिति मान बैठता है | यह अहंकार ही धर्म का दूसरा चरण है |
इसके बाद जीव संस्कार और संकल्प रुपी जाल में फंसता है | प्रकृति में जो अनगिनत विषय जीव के चारों और मंडरा रहे होते हैं, उनसे सम्बंधित संकल्प-विकल्प उसे प्राप्त होता है, और कई जन्मों के इकट्ठे हुए संकल्पों के कारण उसका संस्कार बनता जाता है | यह संकल्प-संस्कार ही धर्म का तीसरा चरण है, और इसी के साथ जीव के चित्त का पूर्ण निर्माण हो जाता है, जिसके तीन भाग हैं - (१) अहंकार, (२) महत्तत्व/बुद्धि और (३) मन/संकल्प |
इसके आगे जीव को एक शरीर प्राप्त होता है | वह जिस जिस प्रकार के संकल्प,संस्कार इत्यादि से जैसी जैसी अपनी वृत्ति बनाता रहता है, उसे वैसा वैसा शरीर प्राप्त होता रहता है | उस शरीर में उस उस प्रकार के इन्द्रिय लगे रहते हैं, जो तत्संबंधी विषयों को भोग सकें और उस उस प्रकार का लोक, देश,काल, नाम, रूप उसे प्राप्त होता रहता है | यह शरीर ही धर्म का चौथा चरण है, और उसके इन्द्रिय ही पांचवें चरण हैं | इन्द्रिय ही जीव को शरीर द्वारा संसार के विषयों से जोड़ते हैं |
असल में इन्द्रिय अपने अपने प्रकार के विषयों के प्रति आकर्षित होते हैं, और उन उन विषयों से उनका संपर्क होता है | इस बात की भी हम पहले चर्चा कर चुके हैं | जैसे आँख अपने विषय 'रूप' से ही संपर्क करता है , वह जिह्वा के विषय 'रस' से संपर्क नहीं करता ; भले ही 'रस' नामक विषय भी आँख के सामने आए, परन्तु वह विषय के 'रस' पर नहीं, बल्कि 'रूप' पर ही आकृष्ट होगा और उसी से जुड़ेगा | यह संपर्क ही धर्म का छठा चरण है |
इसके बाद, इन्द्रियों के अपने अपने विषयों से जुड़ने के कारण जीव को तत्संबंधी संवेदनाएं मिलती हैं | अर्थात अनुकूल विषय मिलने पर सुख और प्रतिकूल विषय मिलने पर दुःख मिलता है | और कभी कभी मिश्रित संवेदना भी मिलती है | अर्थात इन्द्रियों के माध्यम से जीव को भौतिक विषयों का ज्ञान प्राप्त होता है | इस भौतिक ज्ञान को, जिसका नाम संवेदना है, धर्म का सातवाँ चरण कहा गया है |
अब यह संवेदना रुपी ज्ञान ही है, जो हमारे चित्त को किसी ख़ास संकल्प को संस्कारित करने और फिर उस संस्कार को इच्छा में बदलने को प्रेरित करता है | यानी हमें जिस विषय में अत्यधिक सुख मिला होता है, हम उसके प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं, और जिस विषय में अत्यधिक दुःख मिला होता है, उसके प्रति ज्यादा विकर्षित होते हैं | नतीजा यह होता है कि जिस जिस विषय में ज्यादा सुख/दुःख मिला होता है, उसी का ज्यादा चिंतन करते है कि यह कहीं से मिल जाए या फिर कहीं यह हमें ना मिल जाए | फलस्वरूप उसी विषय का ज्यादा संकल्प-विकल्प होता है और उस से सम्बंधित संस्कार बलवान होते जाते हैं और अंततः वही हमारी कामना बन जाती है और फिर हम उस कामना को पाने के लिए उद्यत हो जाते हैं | यही 'कामना' का मूल रहस्य है और यह कामना ही धर्म का आठवाँ चरण है |
नतीजा यह होता है कि हम बार बार विषय भोग प्राप्त करते रहते हैं, और हम बार बार उनकी कामना करते रहते हैं | जितना विषय मिलता है, उतना ही कामना बलवती होती है | वेदों में यह प्रवृत्ति आसक्ति अथवा अनुराग के नाम से वर्णित है और विषयों के प्रति इसी अनुराग को धर्म का नौवां चरण कहा गया है |
इन नौ चरणों के कारण जीव की जो परिस्थिति होती है, वही जीव की सम्पूर्ण प्रवृत्ति अथवा भाव के नाम से प्रसिद्द है | हम जीवन भर जिस प्रवृत्ति या भाव को धारण करते हैं, मृत्यु के समय भी उसी में से कोई एक भाव जागृत होता है और नतीजतन हम अपने अगले जन्म को अपने इसी जन्मे में तय कर लेते हैं | यह भाव ही धर्म का दसवां चरण है और श्री गीता जी में इसी भाव/प्रवृत्ति की महत्ता का वर्णन करते हुए श्री भगवान् कहते हैं -
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरं |
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः || [अध्याय ८, श्लोक ६]
- हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! शरीर त्यागते समय जीव जिस जिस भाव का स्मरण करता है, वह उस उस भाव को निश्चित रूप में प्राप्त होता है |
यानी जीव जिस भी भाव में अपने इस जीवन का अंत करता है, उसे के अनुसार उसे अपना अगला जन्म प्राप्त होता है | असल में मृत्यु के समय जीव केवल स्थूल देह का ही परित्याग करता है | मन-बुद्धि-अहंकार रुपी चित्त सदा उसके साथ चलता है | नतीजतन वह अपनी बलवान इच्छाओं, संचित संस्कारों और मृत्यु के समय उत्पन्न संकल्पों को साथ लेकर अपने अगले जीवन में प्रवेश करता है | फलस्वरूप अगले जन्म में उसे वैसी ही परिस्थितियाँ और वैसा ही देह-इन्द्रिय-समूह प्राप्त होता है जो उसके भाव/प्रवृत्ति के अनुकूल हों | यही हमारे पुनर्जन्मों का रहस्य है और यह बार बार जन्म लेने की आदत, जिसे जाति कहा जाता है, यह आदत ही धर्म का ग्यारहवाँ चरण है |
अंततः जीव अपने इच्छा, अपने भाव, अपने चित्त और अपने जन्म-इन्द्रिय-शरीर इत्यादि के ही द्वारा बार बार अनुराग और भोगों में पड़ता रहता है | यही जन्म-मृत्यु के अनंत चक्र का रहस्य है और यही संसार के सुख-दुःख का कारण है | यह जन्म-मृत्यु-सुख-दुःख रुपी भवसागर ही धर्म का बारहवां और अंतिम चरण है |  इसप्रकार ही धर्म आगे आगे गति करता रहता है और साथ ही साथ जीव भी गति करता रहता है और भवसागर में भटकता रहता है |
इन बारह चरणों में से तीन, संस्कार, कामना और भाव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं | क्योंकि यही हमारे चित्त की मूल वृत्ति है, और यही हमारे पूरे जीवन और आगे भावी जीवन को भी प्रभावित करते हैं | हमारी जैसी चित्त-वृत्ति होती है वैसा ही हमारा धर्म होता है, वैसे ही हम कर्म करते हैं, वैसे ही भोग प्राप्त करते हैं और उसी से भवसागर में भटकते रहते हैं | अगर हम संकल्प-संस्कार-इच्छा रुपी इस चित्त-वृत्ति का समाधान कर लें, तो हमें भवसागर से ही छुटकारा मिल जाए, सुख-दुःख रुपी सभी संवेदनाएं मिट जाएं और जन्म-मरण का चक्कर ही नष्ट हो जाए | अतः इस चित्त-वृत्ति को ही धर्म की गाँठ कहा गया है और इस चित्त-वृत्ति के निरोध को ही 'योग' की संज्ञा दी गयी है |
[यहाँ जो मैंने धर्म-चक्र का वर्णन किया है, वह कई पूर्व विद्वानों के वर्णन से थोड़ा सा अलग जान पड़ता है; परन्तु मुझे इस प्रकार का वर्णन ही ज्यादा सटीक और सिस्टेमेटिक/चरणबद्ध जान पड़ा है | इस कारण बौद्धवादी, मायावादी और शून्यवादी विद्वान् कृपया त्योरियाँ ना चढ़ाएं | खैर -]
धर्म इस ब्रह्माण्ड की महायात्रा में हमारे "राह-खर्ची" जैसा है | जैसा हमारा धर्म होता है, उसी अनुसार हम भवसागर की यात्रा करते हैं | जिधर का टिकट लिया है, उधर के ट्रेन में ही बैठोगे भाई, और जितना खर्च कर के जिस तरह का टिकट लिया है, उतने ही ऐश-आराम से यात्रा करोगे |
अब हम धर्म के एक अन्य लक्षण की आगे चर्चा करेंगे, तब तक के लिए जय श्री कृष्ण |

शनिवार, 13 जुलाई 2013

धर्म {भाग-1}

श्रीमन्नारायणाय नमः .
मित्रों! बहुत अरसे बाद कुछ लिखने का समय मिला है, और गुरुदेव की कृपा से लिखने लायक विषय भी प्राप्त हुए हैं | एक बड़ा अध्याय लिख रहा हूँ, विषय है 'धर्म' | यद्यपि मैं हमेशा की तरह अपने क्षमता और योग्यता से अधिक बड़ी बातों पर लिख रहा हूँ, किन्तु फिर भी प्रयास करूँगा कि मन जो बातें आती हैं, और ईश्वर के आशीर्वाद से और गुरुजनों की कृपा से जो कुछ भी सोच-समझ पाया हूँ, उसको आप सब के साथ ईमानदारी से पूरा पूरा बांटने का प्रयास करूँ | अगर कोई बात अच्छी लगे तो कुछ नहीं, बस इतना चाहूँगा कि आप भी उस बात पर ध्यान दें | अगर कोई बात बुरी लगे, या पसंद ना आए तो कृपया मुझे बताइये, ताकि मैं इस चीज को और अच्छी तरह समझ सकूँ | क्योंकि मैं कोई ग्रन्थ नहीं लिख रहा, बस अपनी समझ बाँट रहा हूँ....
अथ -
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इस अध्याय में हमलोग पहले 'धर्म' शब्द के अर्थ पर ध्यान देंगे | उसके बाद आगे 'धर्म' के विस्तृत स्वरुप और उसके महत्त्व की चर्चा करने का प्रयास किया जाएगा |
सामान्य जन धर्म से सांप्रदायिक समूह और पूजन-पद्धति से सम्बंधित सामाजिक नियमों का अर्थ लेते हैं | इसमें कुछ खास गलत भी नहीं है | लोग अपने अपने देश-काल से प्रभावित होते हैं | आजकल संसार में जिस प्रकार की भाषाओँ का बोलबाला है, उनमे संस्कृत भाषा के 'धर्म' शब्द का सार्थक पर्यायवाची मिलना मुश्किल है | प्रचलित लोकप्रिय स्वरुप में भरतखंड में 'धर्म' शब्द हिंदी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मराठी इत्यादि भाषाओँ में प्रयुक्त होता है; परन्तु इन भाषाओँ में भी आम जनता 'धर्म' शब्द का वही अर्थ लेती है जो ऊपर लिखा गया | भरतखंड से बाहर जो भाषाएँ ज्यादा प्रचलित हैं, जैसे अंग्रेजी, फ्रेंच, मंदारिन, अरबी, फारसी इत्यादि में भी 'धर्म' शब्द का सटीक पर्यायवाची मिलना कठिन है |
इसीकारण इन भाषाओँ का प्रयोग कर के 'धर्म' शब्द का सही अर्थ लगाना व्यर्थ है | वैसे भी जो शब्द जिस भाषा का हो, उसे उसी भाषा द्वारा परिभाषित करना चाहिए, अन्यथा अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है | 'धर्म' मूलतः संस्कृत भाषा का शब्द है इसलिए हमें संस्कृत भाषा के 'धर्म' शब्द का ही अर्थ लेना चाहिए |
संस्कृत भाषा में 'धर्म' शब्द 'धृ' धातु से बना है; और इसी से बने अन्य शब्दों जैसे धृति, धरित्री, धारणा इत्यादि से सम्बन्ध रखता है | इस तरह संस्कृत में 'धर्म' शब्द का अर्थ धारण करने वाला और गति प्रदान करने वाला लिया गया है | इसका किसी आध्यात्मिक संप्रदाय, पूजन पद्धति या सामजिक नियम और समूह से कोई लेना देना नहीं है | संस्कृत में संप्रदाय को संप्रदाय ही कहा जाता है, पूजन पद्धतियों को आगम, जन-समूह को वर्ण-आश्रम, सामाजिक नियमों को नीति और प्राकृतिक नियमों को ऋत कहा जाता है | और संस्कृत भाषा की एक मौलिक विशेषता है कि उसमे एकदम एक तरह के अर्थ में दो शब्द प्रयुक्त नहीं होते | उदहारण के लिए जो आग जलाने के काम आती है उसे 'दहन' कहते हैं और जो भोजन पकाने के काम आती है उसे 'पावक' कहते हैं | दहन के अर्थ में पावक और पावक के अर्थ में दहन का प्रयोग नहीं हो सकता है | देवताओं को भोजन प्रदान करने वाले को 'अग्नि' और ज्ञान/प्रकाश प्रदान करने वाले को 'जातवेदस' कहा जाता है | अग्नि के अर्थ में जातवेदस और जातवेदस के अर्थ में अग्नि का प्रयोग नहीं हो सकता है | इस उदहारण से स्पष्ट है कि 'धर्म' शब्द का अर्थ हम संप्रदाय, आगम, वर्ण, आश्रम, नीति या ऋत; किसी से नहीं ले सकते | यद्यपि धर्म इन सभी वस्तुओं को प्रभावित करता है, फिर भी इन सब का अर्थ-मात्र धर्म नहीं है | धर्म इन सब से बृहत् और विस्तृत है |
धर्म के दो लक्षण हैं - 'धारण' करना और 'गति' प्रदान करना | इसके आलावा धर्म का एक और लक्षण है जिसकी चर्चा बाद में होगी | पहले इन दोनों वस्तुओं पर गौर करते हैं | धारण करने का अर्थ है स्थिरता, अच्युतता और आधार प्रदान करना | 'सांख्य' के अनुसार धारण करने के लिए 'तमस' गुण की आवश्यकता होती है | क्योंकि तमस में स्वभावतः एक जड़ता और स्थिरता होती है | इस संसार में जो कुछ भी स्थिर, स्थित और जड़ है वो सब तमस के कारण है | अगर तमस न हो, तो सृष्टि में स्थिरता नहीं हो सकती |
धर्म जीव/वस्तु को स्थिरता प्रदान करता है | धर्म ही पत्थर को भारी, रूई को हल्का और आकाश को तटस्थ बनाता है | धर्म ही मनुष्य को मनुष्य, देवता को देवता, जन्तु को जन्तु, पक्षी को पक्षी और पादप को पादप बनाता है | धर्म ही सूक्ष्म को सूक्ष्म, स्थूल को स्थूल, जड़ को जड़ और चेतन को चेतन बनाता है | यही नहीं, अगर आप इस बात का विश्वास करें तो धर्म ही जीव को जीव, जगत को जगत, ब्रह्म को ब्रह्म, प्रकृति को प्रकृति और ईश्वर को ईश्वर बनाता है (या फिर यूँ कहिये कि बनाए रखता है) |
[ईश्वर धर्म के दायरे में आता है या नहीं, इसपर बाद में बहस करेंगे, पहले जरा यह देखें कि धर्म धारण किस प्रकार करता है]
असल में हर वस्तु की एक विशेष धार्मिक परिस्थिति होती है | उसी के कारण वह एक खास देश-काल और परिस्थति में स्थापित होता है | जिसकी जैसी धार्मिक स्थिति होती है, वह उसी प्रकार के संप्रदाय, समाज, देश, परिवार, वर्ण, आश्रम इत्यादि में होता है | मनुष्य की भी यही स्थिति है, क्योंकि जीव मात्र की यही स्थिति है | हर मनुष्य अपनी अपनी धार्मिक परिस्थिति के ही कारण हिन्दू, मुस्लिम, इसाई, बौद्ध, वैष्णव, शैव, स्मार्त, ब्राह्मण, क्षत्रिय, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, आस्तिक, नास्तिक इत्यादि होता है | इन इन प्रकार के संप्रदाय, समुदाय, समाज इत्यादि के द्वारा धारण किये जाने के लिए मनुष्य का अपना अपना धर्म ही जिम्मेदार है |
धर्म हमें धारण करने के लिए हमारे ही कर्मों का इस्तेमाल करता है | हमारे कर्म जिस प्रकार के होते हैं, धर्म हमें आगे उसी प्रकार की परिस्थितियाँ देता रहता है | पापमय कर्मों के कारण हम पापमय परिस्थिति को ही प्राप्त करते हैं और पुण्यमय कर्मों से हमें पुण्यमय स्थिति मिलती है | [यद्यपि कर्मों का पापमय अथवा पुण्यमय होना भी एक प्रकार का क्लिष्ट विषय है, समझने के लिए; मगर एक सरल वाक्य में कहें तो परपीडन ही पाप है और परोपकार ही पुण्य है] अपने अपने कर्म-समुच्चय के कारण ही हम लोग अपना अपना धर्म और अपनी अपनी स्थिति पाते हैं | इस बात से कृपया यह मत समझिये कि धर्म का अर्थ कर्म से है | कर्म धर्म का एक भाग है, परन्तु सम्पूर्ण धर्म इससे बृहत् और विस्तृत है |
इस बात को और भी अधिक स्पष्ट करने के लिए हम धर्म के दुसरे लक्षण पर ध्यान देते हैं | दुसरे लक्षण को समझने से पहला लक्षण और सरलता से समझा जा सकता है |
धर्म का दूसरा लक्षण है 'गति' | गति का सीधा सपाटा मतलब वही है - एक स्थान से दुसरे स्थान को विस्थापित होना, खासकर एक विशेष नियम के तहत विस्थापित होना | धर्म की गति सचमुच एक विशेष नियम (ऋत) से कार्य करती है | धर्म ही हमें एक परिस्थिति से दूसरी परिस्थिति में लेकर जाता है | जैसे ही हमारे कर्म में बदलाव आता है, वैसे हमारा धर्म आगे बढ़ता है और फिर वह हमारी परिस्थिति बदल देता है | फिर उस परिस्थिति से प्रभावित होकर हम उस परिस्थिति के अनुकूल या प्रतिकूल नए कर्म करते हैं, और फिर से धर्म आगे गति करता है और फिर हमारी परिस्थिति बदल जाती है | इसे समझने के लिए एक उदहारण लेते हैं | जैसे एक जीव है, जो पापमय व्यवहार करता है | फलस्वरूप उसे नारकीय जीवन की प्राप्ति होती है | परन्तु यदि वह आगे चलकर पापमय कर्म छोड़कर पुण्यमय कर्म शुरू कर देता है, तो उसकी परिस्थिति बदलने लगती है; और फिर वह स्वार्गिक अथवा अन्य प्रकार के बेहतर जीवन को पा सकता है |
सांख्य दर्शन के अनुसार गति के लिए 'राजस' गुण की आवश्यकता होती है | 'राजस' गुण के कारण ही प्रत्येक वस्तु में गति होती है | इसकारण धर्म भी राजस गुण के प्रयोग से हमें हमारे कर्मों के फलस्वरूप नए नए स्थितियों में ले जाता है, और फिर जब तक हम नए फलदायी कर्म न कर लें, तबतक तामस गुण के द्वारा हमें उस स्थिति में धारण किये रहता है |
अब हमें यह जानना चाहिए कि आखिर धर्म गति किस प्रकार करता है | धर्म के गति का एक नियम होता है | वेदों में इसे 'ऋत' का नाम दिया गया है, और भगवान बुद्ध ने इसे ही 'धर्म-चक्र' कहा है | वेदों का ऋत शब्द धर्म के अलावा भी अन्य किसी भी शाश्वत प्राकृतिक और आध्यात्मिक नियम के लिए प्रयुक्त होता है | परन्तु बुद्ध का 'धर्म-चक्र' शब्द विशेषतः धर्म के गति के विषय में ही है; इसलिए हम भी इसे 'चक्र' का ही नाम देंगे | वैसे भी आगे आप देखेंगे कि धर्म सचमुच एक गोल-चक्कर की तरह गति करता है | इसलिए इसकी गति को 'धर्म-चक्र' कहना विशेष गलत नहीं है | परन्तु जब हम धर्म के तीसरे लक्षण की चर्चा करेंगे तो इसकी चक्रीय गति शिथिल होती नजर आएगी |
[मेरा मकसद धर्म की बौद्ध परिभाषा को स्थापित करना नहीं है | वैसे भी बौद्ध दर्शन चूँकि भरतखंड में ही उत्त्पन्न हुआ है, इसलिए उसका विशेष वैदिक सिद्धांतों से प्रभावित होना कुछ बुरा नहीं है | मेरा मुख्य उद्देश्य धर्म की उस मौलिक भारतीय विवेचना को समझना है, जो काल और भाषा के प्रभाव से मारी गयी है, और जिस कारण सामान्य जन धर्म का गलत अर्थ लगा कर फंसे रहते हैं |]
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अभी आगे और भी लिखने वाला हूँ, क्योंकि बहुत कुछ बाकी है जो बुद्धि में चल रहा है, बस शब्द और वाक्य का रूप नहीं धर पा रहा है | जैसे जैसे श्री हरी चाहेंगे, वैसे वैसे प्रकट करता रहूँगा | आज के लिए -
हरी ॐ तत्सत् .