गुरुवार, 17 सितंबर 2009
सांख्य : योग - १
हरे कृष्ण, दंडवत प्रणाम.
पिछली बार भगवान् कपिल के सांख्य दर्शन कि कृपा से श्री गीता जी को समझने की कोशिश की थी.
आज चलिए भगवन कपिल के सिद्धांतो को व्यवहारिक स्वरुप प्रदान कर के सजाने और सवारने वाले भगवन पतंजलि के योग दर्शन की शरण में चलते हैं.
श्री गीता जी में प्रथम और द्वितीय अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण ने सांख्य और योग दर्शन का प्रयोग किया है. यद्यपि द्वितीय अध्याय में वे अन्य सिद्धांतो कि भी झांकी देते हैं.
आत्म तत्व-
जब आदि पुरुष ने सांख्य को दुखी देखा तो उसे जोश दिलाते हुए कहा कि मित्र दुखी मत हो. जीवन-मरण से क्यों घबराते हो? यह तो इस मायिक संसार में सदा लगा ही हुआ है. जो पैदा होता है, वो तो मरता ही है. फिर शोक क्यों करना?
तुम अपने भाई बंधुओं के हिंसक स्वाभाव से डरते हो. सोचते हो कि इनसे लड़ने में मृत्यु ही मृत्यु है, नाश ही नाश है. ठीक सोचते हो, मगर यह तो होगा ही न. युद्ध न भी हो, तब भी मृत्यु तो होनी है-
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः .
अनाशिनो-अप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत .. (गीता- २/१८)
अविनाशी, अपरिमित और नित्य जीव के भौतिक शरीर का अंत होना ही है. अतः शोक त्यागो, युद्ध करो.
संसार रण क्षेत्र है. कौन बच के जाएगा? वही जो सत्य को जानेगा और असत्य को त्याग देगा. कि आत्मा ही सत्य है, और ये शरीर और इसके भोग आदि असत्य हैं. आत्मा का कभी नाश नहीं होता, और शरीर कभी अविनाशी नहीं हो सकता. सत्य और असत्य में जो भेद है, वही ज्ञानी पुरुष कि मुक्ति का कारण है. सत्य कभी ख़त्म नहीं हो सकता है और असत्य कभी सत्य नहीं हो सकता है-
नासतो विद्यते भावो न-अभावो विद्यते सतह.
उभयोरपि दृष्टो-अन्तस्त्वनयोस-तत्त्वदर्शिभिः.. ( गीता- २/१६ )
हे मेरे प्यारे सांख्य पुरुष, ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं कि मैं न रहा होऊं, तुम न रहे हो, या फिर ये सब लोग न रहे हों. और न ही आगे कभी ऐसा होगा. क्योंकि आत्मा तो अमर है. मृत्यु कोई दुखद प्रसंग नहीं है. बल्कि जैसे फटे पुराने कपडे बदल के लोग नया वस्त्र धारण करते हैं, उसी तरह ये नित्य आत्मा शरीर बदल लेती है. इस आत्मा को नष्ट करना तो दूर, कोई शक्ति इसे छु भी नहीं सकती.
सामान्यतः ही जन्म लेता है, उसकी मृत्यु भी होती है. इसी कारण शरीर का मारा जाना जाना जाता है. मगर आत्मा तो न ही कभी जनमती है, न ही उसकी मृत्यु होती है.
तुम्हारा और इन सभी लोगों का सच्चा स्वरुप तो आत्मा है, फिर जनमते-मरते शरीरों के लिए शोक क्यों? इस शोक को त्यागो और पहले सामने आये इस कर्तव्य का पालन करो- युद्ध करो.
देखो त्रिगुण मयी माया के विरूप परिवर्तन से जब तीनो गुण आपस में परिवर्तन करते हैं, तब सम्पूर्ण संसार और इसके जीव अव्यक्त स्वरुप से प्रकट होते हैं और जब प्रकृति का प्रलय हो जाता है तब सभी जीव-तत्व पुनः अव्यक्त हो जाते हैं. परन्तु तुम्हारा सत्-स्वरुप आत्मा तो विलक्षण है, तीनो गुणों से परे है.
इस भौतिक संसार में जब आत्मा स्वयं को शरीर से बंधा मान लेती है, तब वह इस शरीर के धर्मों से जुड़ जाता है. अतः उसका कर्तव्य है कि शरीर के धर्मो का निर्वहन करे और संसार में अच्छे अवस्था को प्राप्त करे. तुम अभी क्षत्रिय बने हो, अतः तुमरे लिए उचित है कि युद्ध करो और स्वर्ग को प्राप्त करो. अगर अपने धर्म का पालन करोगे तो पुन्यवान होगे, अन्यथा पापी बनोगे और अपना यश को दोगे. यश का खोना तो धर्मी के लिए मृत्यु से भी बुरा है.
अगर पाप और अपयश से बचना है तो सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय का विचार त्याग कर अपने धर्म का पालन करो.
इस प्रकार आदि पुरुष गोविन्द ने सांख्य पुरुष अर्जुन के सामने आत्मा के स्वरुप, धर्म तथा कर्तव्य का वर्णन किया.
शेष फिर-
गोविन्दम् आदि पुरुषं तं-अहम् नमामि.
शुक्रवार, 11 सितंबर 2009
sankhy aur aadi : purush sukt -3
हरे कृष्ण.
नमस्कार मित्रों. इतने दिनों तक ब्लॉग से दूर रहने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ.
हाँ तो अब तक जो दो भाग लिखे, उनसे इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि हम सभी जीव उसी आदि-पुरुष गोविन्द के नित्य प्रेमी सखा हैं. जैसा कि भगवान् कपिल ने हमें नाम दिया था- सांख्य पुरुष. पर हम इस भौतिक प्रकृति में आ कर अपनी सच्ची अवस्था को भूल गए और गोविन्द से दूर हो गए. मगर गोविन्द ने अपने पुराने वादे को याद रखा और हमें फिर से चेत करा के अपने पुराने स्वरुप को याद दिलाने के लिए ही उसने भगवद्गीता को हमारे सामने प्रकाशित किया.
ये कथा मैंने प्रथम अध्याय के लिए लिखी है.
गीता के प्रथम अध्याय को जब भी मैं पढता हूँ, मेरे सामने सांख्य पुरुष का वो दुखी चेहरा सामने आता है, जब वो प्रकृति के गुणों में फंसा हुआ, दुखी, शोकाकुल और अपने-पराये के भेद- अभेद में भ्रमित बैठा है. और अचानक सांख्य को अपने नित्य सखा आदि कि याद आती है.
अचानक ही सांख्य को पता चलता है कि गोविन्द से दूर रहने के कारण वह कितने भयानक और विकत परिस्थितियों में फंस गया है-
"न च शक्नोम्यवस्थातुम भ्रमतीव च में मनः.
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव." (गीता- १-३० )
हे केशी रूपी सरपट दौड़ने वाले इन्द्रियों का दमन करने वाले दामोदर- कृष्ण, यहाँ तो सब कुछ अमंगल ही दीख रहा है. ओह. मैं तो स्वयं को ही भूल बैठा हूँ और मेरा सर चक्र रहा है. मैं अब यहाँ और अधिक खडा नहीं रह सकता.
इस जगत में जब श्री गोविन्द ने हमें अपने सत्-स्वरुप का ज्ञान प्रकट कर के बताया, तब उन्होंने अपने परम भक्त अर्जुन को निमित्त बनाया. असल में हम सभी अलग अलग पुरुष-तत्व हैं. सांख्य दर्शन जिस तत्व को सांख्य पुरुष और आदि पुरुष कहता है, उसे ही न्याय दर्शन आत्मा और परमात्मा तथा वेदांत ब्रह्म और परब्रह्म क्रमशः पुकारते है.
तो, हम सभी आत्माएं उस परमात्मा के प्रेमी जन है. अर्जुन उनका अत्यंत शुद्ध भक्त तथा प्रेमी है. अतः श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता के ज्ञान का निमित्त बनाया है.
भगवद्गीता का पहला अध्याय एक प्रकार से इस ज्ञान के लिए पृष्ठभूमि तथा भूमिका के सामान है- जहाँ अर्जुन को अचानक याद आता है कि वो इस दुनिया के झमेलों में फंस गया है. हलाँकि उसे इन झमेलों से निकलने का मार्ग सुझाई नहीं देता; फिर भी वो अपनी ये दुर्दशा अपने परम प्रेमी कृष्ण को बताता है- इस आशा में कि आदि पुरुष अपने मित्र सांख्य पुरुष को इस दुःख से छूटने का उपाय जरूर बताएगा.
अर्जुन देखता है कि इस त्रिगुण मयी माया के वश में लोग किस प्रकार भगवान् के प्रेम को भूल के आपस में ही लड़ने मरने के लिए तैयार हो जाते है. भाई भाई को, पिता पुत्र को, और पुत्र पिता को मार डालने के लिए प्रेरित हो जाता है, और ये भी नहीं सोच पाता कि क्या कर रहा है? क्यों कर रहा है?
यह सब देख के अर्जुन तो अत्यंत व्याकुल तथा दुखी हो गया ; यहाँ तक कि-
"वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते.
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते.." (गीता- १-२९ )
मेरा शरीर कांप रहा है, रोंगटे खड़े हो रहे है, गांडीव हाथ से सरका जा रहा है और मेरी त्वचा जल रही है.
अब अचानक उसे समझ में आता है कि ये सभी भौतिक सुख उसके किसी काम के नहीं हैं. इन सुखो को पा के क्या फायदा? जब कि ये सभी सुख किसी न किसी अन्य जीव के दुःख पर आधारित होते है.
"न च श्रेयो-अनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे.
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च.."
हे मेरे मन को आकर्षक लगने वाले प्यारे मित्र! इस झगडे में अपने ही प्यारे मित्रों को मार के मुझे कोई भलाई नजर नहीं आती. मैं तो अब किसी भी विजय, सुख, राज्य आदि कि इच्छा भी नहीं रखता.
इस प्रकार, भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का सार यही है कि हम सभी इस संसार में अपनी विकट परिस्थिति को समझे और अपने उस प्यारे मित्र आदि गोविन्द को याद करे कि वो इस परिस्थिति को समझने तथा इस से पार पाने में हमारी मदद करे.
अब इस कथा- "सांख्य और आदि : पुरुष सूक्त " को 'इति' के साथ विराम देते हैं.
गोविन्दम् आदि पुरुषं, तं अहम् नमामि.
शेष फिर.
नमस्कार मित्रों. इतने दिनों तक ब्लॉग से दूर रहने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ.
हाँ तो अब तक जो दो भाग लिखे, उनसे इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि हम सभी जीव उसी आदि-पुरुष गोविन्द के नित्य प्रेमी सखा हैं. जैसा कि भगवान् कपिल ने हमें नाम दिया था- सांख्य पुरुष. पर हम इस भौतिक प्रकृति में आ कर अपनी सच्ची अवस्था को भूल गए और गोविन्द से दूर हो गए. मगर गोविन्द ने अपने पुराने वादे को याद रखा और हमें फिर से चेत करा के अपने पुराने स्वरुप को याद दिलाने के लिए ही उसने भगवद्गीता को हमारे सामने प्रकाशित किया.
ये कथा मैंने प्रथम अध्याय के लिए लिखी है.
गीता के प्रथम अध्याय को जब भी मैं पढता हूँ, मेरे सामने सांख्य पुरुष का वो दुखी चेहरा सामने आता है, जब वो प्रकृति के गुणों में फंसा हुआ, दुखी, शोकाकुल और अपने-पराये के भेद- अभेद में भ्रमित बैठा है. और अचानक सांख्य को अपने नित्य सखा आदि कि याद आती है.
अचानक ही सांख्य को पता चलता है कि गोविन्द से दूर रहने के कारण वह कितने भयानक और विकत परिस्थितियों में फंस गया है-
"न च शक्नोम्यवस्थातुम भ्रमतीव च में मनः.
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव." (गीता- १-३० )
हे केशी रूपी सरपट दौड़ने वाले इन्द्रियों का दमन करने वाले दामोदर- कृष्ण, यहाँ तो सब कुछ अमंगल ही दीख रहा है. ओह. मैं तो स्वयं को ही भूल बैठा हूँ और मेरा सर चक्र रहा है. मैं अब यहाँ और अधिक खडा नहीं रह सकता.
इस जगत में जब श्री गोविन्द ने हमें अपने सत्-स्वरुप का ज्ञान प्रकट कर के बताया, तब उन्होंने अपने परम भक्त अर्जुन को निमित्त बनाया. असल में हम सभी अलग अलग पुरुष-तत्व हैं. सांख्य दर्शन जिस तत्व को सांख्य पुरुष और आदि पुरुष कहता है, उसे ही न्याय दर्शन आत्मा और परमात्मा तथा वेदांत ब्रह्म और परब्रह्म क्रमशः पुकारते है.
तो, हम सभी आत्माएं उस परमात्मा के प्रेमी जन है. अर्जुन उनका अत्यंत शुद्ध भक्त तथा प्रेमी है. अतः श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता के ज्ञान का निमित्त बनाया है.
भगवद्गीता का पहला अध्याय एक प्रकार से इस ज्ञान के लिए पृष्ठभूमि तथा भूमिका के सामान है- जहाँ अर्जुन को अचानक याद आता है कि वो इस दुनिया के झमेलों में फंस गया है. हलाँकि उसे इन झमेलों से निकलने का मार्ग सुझाई नहीं देता; फिर भी वो अपनी ये दुर्दशा अपने परम प्रेमी कृष्ण को बताता है- इस आशा में कि आदि पुरुष अपने मित्र सांख्य पुरुष को इस दुःख से छूटने का उपाय जरूर बताएगा.
अर्जुन देखता है कि इस त्रिगुण मयी माया के वश में लोग किस प्रकार भगवान् के प्रेम को भूल के आपस में ही लड़ने मरने के लिए तैयार हो जाते है. भाई भाई को, पिता पुत्र को, और पुत्र पिता को मार डालने के लिए प्रेरित हो जाता है, और ये भी नहीं सोच पाता कि क्या कर रहा है? क्यों कर रहा है?
यह सब देख के अर्जुन तो अत्यंत व्याकुल तथा दुखी हो गया ; यहाँ तक कि-
"वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते.
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते.." (गीता- १-२९ )
मेरा शरीर कांप रहा है, रोंगटे खड़े हो रहे है, गांडीव हाथ से सरका जा रहा है और मेरी त्वचा जल रही है.
अब अचानक उसे समझ में आता है कि ये सभी भौतिक सुख उसके किसी काम के नहीं हैं. इन सुखो को पा के क्या फायदा? जब कि ये सभी सुख किसी न किसी अन्य जीव के दुःख पर आधारित होते है.
"न च श्रेयो-अनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे.
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च.."
हे मेरे मन को आकर्षक लगने वाले प्यारे मित्र! इस झगडे में अपने ही प्यारे मित्रों को मार के मुझे कोई भलाई नजर नहीं आती. मैं तो अब किसी भी विजय, सुख, राज्य आदि कि इच्छा भी नहीं रखता.
इस प्रकार, भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का सार यही है कि हम सभी इस संसार में अपनी विकट परिस्थिति को समझे और अपने उस प्यारे मित्र आदि गोविन्द को याद करे कि वो इस परिस्थिति को समझने तथा इस से पार पाने में हमारी मदद करे.
अब इस कथा- "सांख्य और आदि : पुरुष सूक्त " को 'इति' के साथ विराम देते हैं.
गोविन्दम् आदि पुरुषं, तं अहम् नमामि.
शेष फिर.
गुरुवार, 27 अगस्त 2009
सांख्य और आदि : पुरूष सूक्त 2
जो त्रिगुण माया थी, वो बड़ी जादूगरनी थी। वो कभी सांख्य को हसाती, कभी रुलाती, कभी वैसे ही निट्ठल्ला कर देती। माया के खेल में सांख्य कभी सुखी, कभी दुखी और कभी उदास हो जाता। चूँकि सांख्य अपने प्यारे मित्र आदि से दूर हो गया था; इसलिए वो उसे भूल बैठा। उसे लगा की ये जो दिख रहा है, वही सच है। प्रकृति के खेल में अचानक सांख्य ने देखा कि वो एक चार पैर वाला जानवर है, और भूख के कारण एक और जानवर के पीछे दौड़ रहा है। भूख से उसका हाल बेहाल हो रहा था। इसलिए जैसे ही उसने एक जानवर को देखा, और ये जाना कि उसे मार के खाने पर उसकी भूख मिट जायेगी, वह उस जानवर के पीछे दौड़ पड़ा। काफ़ी दौड़ने के बाद उसने उस जानवर को पकड़ लिया, और मार के खा गया। भूख मिटने से उसे बड़ा सुख मिला। फ़िर अचानक उसने देखा कि वो एक गाय है, और उसे फ़िर से भूख लग गयी। अब वो हरे हरे घास कि खोज में निकला। पहाड़, नदी, रेगिस्तान पार करने के बाद उसे एक घास का बड़ा सा मैदान मिला। वो घास चरने लगा। भूख मिटने से उसे फ़िर से बड़ा मजा आया। फ़िर अचानक उसने अपने को एक पेड़ के रूप में देखा, वो निश्चल खड़ा था। उस पर फल लगे थे, और दूसरे लोग उन फलों को खा रहे थे। फ़िर अचानक कुछ लोग एक आरा ले के आए, और उन्होंने सांख्य को काट दिया। उस समय उसे बड़ा कष्ट हुआ, मगर वो कुछ कर नही पाया। फ़िर अचानक सांख्य ने ये देखा कि वो एक कीडा है। नाले में बह रहा है, और लोगों के गंदे पर पल रहा है। वो मल खाता और मूत्र पीता। इस बात से उसे घिन्न नही आती, बल्कि भूख मिटने पर वो सुखी होता। फ़िर अचानक उसने अपने को एक देवता के रूप में देखा। वो स्वर्ग में बैठा, इन्द्र के सभा में उर्वशी के नृत्य का मजा लेता। भूख लगने पर नंदन वन के स्वादिष्ट फल खाता।
हर बार अलग अलग रूपों में सांख्य को दुःख होता, और फ़िर उस दुःख का अंत भी जरूर होता। दुःख का अंत होने पर उसे सुख मिलता था। इस तरह सांख्य माया के खेल में खो के आदि को भूल गया। फ़िर एक दिन अचानक सांख्य ने अपने को मनुष्य के रूप में देखा। एक सर, दो आँखे, दो कान, एक नाक, एक जिह्वा, दो हाथ, दो पैर, एक पेट, एक लिंग, और कुल मिला के एक सुंदर शरीर। सांख्य को वही सारे दुःख फ़िर से सताने लगे। भूख लगने पर वह अन्न उपजा के खाता, प्यास लगने पर पानी पीता, काम के भरकने पर किसी स्त्री के पास जाता।
आदि, जो वैसे तो सांख्य से जुदा हो गया था, मगर फ़िर भी अदृश्य रूप में हमेश उसके साथ था, उसकी ये दुर्दशा देखकर दुखी हो गया। वैसे तो आदि सुख दुःख से परे था, मगर फ़िर भी दुखी हुआ। (ये बात कुछ समझ नही आई, कि सुख दुःख से परे हो कर भी दुखी हुआ।) आदि ने देखा कि सचमुच सांख्य मुझे भूल गया है, विरह के हमारे कर्तव्य से हट गया है। वह तो सुख दुःख के चक्कर में पर गया है। ये मेरा प्रिये मित्र है, मुझे ही इसे बचाना होगा। इसने भी मुझसे वादा लिया था, कि अगर ये माया के प्रभाव में पड़ा, तो मैं इसकी मदद जरूर करूँगा। ऐसा विचार करके, और पूर्व में किए वादे के कारण आदि ने सांख्य के सामने जाने का निश्चय किया। आदि ने प्रकृति से कहा- "हे माया, मुझे अपने दृश्य में आने दे। मगर याद रख, मुझ पर तेरा असर नही हो सकता; अतः सिर्फ़ आने दे, मुझे अपना खेल दिखा के अपना और मेरा समय बरबाद मत करना।"
प्रकृति ने उसकी बात मान ली, और आदि सांख्य के सामने प्रकट हुआ। उस समय सांख्य एक बड़े ही विषम परिस्थिति में था। उसने अपने जीवन में सुख पाने के लिए, भरसक प्रयत्न किए, मगर कुछ लोग थे, जो उसी कि तरह माया में फंसे थे, उसको सुखी नही होने देना चाहते थे। ये लोग उसके शत्रु प्रतीत होते थे, हालांकि उनमे से अधिकतर सांख्य के परिवार जन ही थे, भाई, चाचा, मामा, मौसा, भतीजा, नाना, दादा, इत्यादि। सब के सब सांख्य से लड़ने, और उसे मार डालने के लिए तैयार थे। सांख्य बड़े पेशोपेश में था, इनसे लड़े या न लड़े। तभी उसने देखा कि उसका एक जाना पहचाना मित्र उसके सामने खड़ा था। उसका वही पुराना प्यारा साथी, वही सुंदर- वही नित्य, वही खिलाड़ी। सांख्य उसे देखते ही पहचान गया- 'अरे ये तो आदि है।'
फ़िर क्या हुआ? जानने के लिए पढिये-
सांख्य और आदि : पुरूष सूक्त ३
हर बार अलग अलग रूपों में सांख्य को दुःख होता, और फ़िर उस दुःख का अंत भी जरूर होता। दुःख का अंत होने पर उसे सुख मिलता था। इस तरह सांख्य माया के खेल में खो के आदि को भूल गया। फ़िर एक दिन अचानक सांख्य ने अपने को मनुष्य के रूप में देखा। एक सर, दो आँखे, दो कान, एक नाक, एक जिह्वा, दो हाथ, दो पैर, एक पेट, एक लिंग, और कुल मिला के एक सुंदर शरीर। सांख्य को वही सारे दुःख फ़िर से सताने लगे। भूख लगने पर वह अन्न उपजा के खाता, प्यास लगने पर पानी पीता, काम के भरकने पर किसी स्त्री के पास जाता।
आदि, जो वैसे तो सांख्य से जुदा हो गया था, मगर फ़िर भी अदृश्य रूप में हमेश उसके साथ था, उसकी ये दुर्दशा देखकर दुखी हो गया। वैसे तो आदि सुख दुःख से परे था, मगर फ़िर भी दुखी हुआ। (ये बात कुछ समझ नही आई, कि सुख दुःख से परे हो कर भी दुखी हुआ।) आदि ने देखा कि सचमुच सांख्य मुझे भूल गया है, विरह के हमारे कर्तव्य से हट गया है। वह तो सुख दुःख के चक्कर में पर गया है। ये मेरा प्रिये मित्र है, मुझे ही इसे बचाना होगा। इसने भी मुझसे वादा लिया था, कि अगर ये माया के प्रभाव में पड़ा, तो मैं इसकी मदद जरूर करूँगा। ऐसा विचार करके, और पूर्व में किए वादे के कारण आदि ने सांख्य के सामने जाने का निश्चय किया। आदि ने प्रकृति से कहा- "हे माया, मुझे अपने दृश्य में आने दे। मगर याद रख, मुझ पर तेरा असर नही हो सकता; अतः सिर्फ़ आने दे, मुझे अपना खेल दिखा के अपना और मेरा समय बरबाद मत करना।"
प्रकृति ने उसकी बात मान ली, और आदि सांख्य के सामने प्रकट हुआ। उस समय सांख्य एक बड़े ही विषम परिस्थिति में था। उसने अपने जीवन में सुख पाने के लिए, भरसक प्रयत्न किए, मगर कुछ लोग थे, जो उसी कि तरह माया में फंसे थे, उसको सुखी नही होने देना चाहते थे। ये लोग उसके शत्रु प्रतीत होते थे, हालांकि उनमे से अधिकतर सांख्य के परिवार जन ही थे, भाई, चाचा, मामा, मौसा, भतीजा, नाना, दादा, इत्यादि। सब के सब सांख्य से लड़ने, और उसे मार डालने के लिए तैयार थे। सांख्य बड़े पेशोपेश में था, इनसे लड़े या न लड़े। तभी उसने देखा कि उसका एक जाना पहचाना मित्र उसके सामने खड़ा था। उसका वही पुराना प्यारा साथी, वही सुंदर- वही नित्य, वही खिलाड़ी। सांख्य उसे देखते ही पहचान गया- 'अरे ये तो आदि है।'
फ़िर क्या हुआ? जानने के लिए पढिये-
सांख्य और आदि : पुरूष सूक्त ३
शनिवार, 22 अगस्त 2009
सांख्य और आदि : पुरूष सूत्र. १
सांख्य और आदि दो मित्र थे। दोना में बहुत प्रेम था। वे दोनों एक दुसरे के बिना रह नही सकते थे। सांख्य के लिए दुनिया में सिर्फ़ आदि था, और आदि के लिए सिर्फ़ सांख्य। दोनों में प्रेम निरंतर वर्धमान ही था। यानी उनका प्रेम दिन प्रति दिन बढ़ता ही जाता था। पहले पहल दोनों ने एक दूसरे के बारे में जाना। सांख्य ने देखा कि ये लड़का आदि है, और आदिं ने देखा कि सांख्य मेरा मित्र है। फ़िर दोनों में मित्रता हो गयी। दोनों रोज एक दूसरे को खुश करने के लिए नए नए खेल रचाते थे। दोनों एक दूसरे कि इच्छा पूरी करने के लिए ही कोई भी क्रिया करते थे। नही तो उनको स्वयं कोई कार्य करने योग्य नही था। क्योंकि एक दूसरे के प्रेम से ही उनके सारे कार्य पूरे हो जाते थे।
एक दिन सांख्य ने आदि से कहा- "आदि पुरूष। मैं तुम्हारा नित्य का सखा हूँ। हम दोनों कभी अलग नही है। तुम आदि पुरुषों हो और मैं सांख्य पुरूष। मेरा तुम्हारा सर्वदा का प्रेम है। हम कभी जुदा नही हो सकते। अगर मैं कभी तुम से बिछड़ गया तो दुनिया कैसी होगी?"
आदि ने उत्तर दिया- "अरे, आज हमारे नित्य के मिलन में विरह के भाव क्यो आ गए?"
सांख्य ने प्रश्न किया- "ये विरह क्या है?"
आदि ने कहा- "विरह प्रेम का एक उच्च स्वरुप है। प्रेम का ही अंग है। कोई भी प्रेम विरह के बिना पूरा ही नही होता। विरह में दोनों प्रेमी एक दूसरे से दूर हो जाते हैं, और फ़िर एक दूसरे से फ़िर से मिलने के लिए बेचैन होते है।"
सांख्य- " यह विरह कैसा होता है?"
आदि- " जान के क्या करोगे?"
सांख्य- "तुम्ही ने तो कहा कि विरह प्रेम का उच्च स्वरुप है। हे सखे, क्यो न हम इस सुंदर प्रेम का rasaswadan करे?"
आदि परम ज्ञानी था। सांख्य भी ज्ञानी था। दोनों का ज्ञान सुस्थिर था। मगर वो दोनों मात्र ज्ञान से संतुष्ट नही होते थे। उन्हें तो विज्ञान में ही मजा आता था। किसी वस्तू को जानना ज्ञान है और वस्तू का pratyaksh अनुभव लेना विज्ञान है। इसी विज्ञान के लिए ही सांख्य ने आदि से ये prashn किया। निरंतर वर्धमान प्रेम को नए नए swaroopo को प्राप्त करना ही चाहिए। आदि सर्व समर्थ था। वो सब कुछ कर सकता था। इसलिए सांख्य कभी कभी उसे परम भी kahta था। आदि सांख्य के खेल के लिए नए नए drishy भी पैदा कर सकता था, मानो vahi sachchi दुनिया हो। और फ़िर उस नए drishy में दोनों मित्र खेला करते थे। अब सांख्य विरह के drishy कि मांग कर रहा था।
आदि- " विरह तो सचमुच सुंदर है, मगर vaha तुम तो hoge, मगर मैं तुम्हे न dikhunga। और jaha मैं hunga, vaha तुम मुझे न dikhoge।"
सांख्य- " यही तो विरह है न। मगर क्या पूरे खेल bhar तुम मुझे न dikhoge?"
आदि- " नही, नही। कभी कभी मिलेंगे ही। मैं विरह में आ jaya karunga। मगर..."
सांख्य- " मगर क्या? "
आदि- " मगर विरह में मेरी प्रबल bahiranga माया होगी। kahin उसके prabhav में तुम मुझे भूल jaao तो, pehchan न paao तो?"
सांख्य- "माया क्यो ?"
ये prashn तो सचमुच gambhir था। दो mitro के बीच bahiranga क्यो? vahi antaranga क्यो नही, जो hardam खेल में साथ देती है। या फ़िर vo tatastha क्यो नही, जिसमे दोनों का सहज अस्तित्व है?
आदि ने कहा- " माया तो होगी न। वरना विरह कैसे होगा?"
सांख्य को अचरज में देखकर आदि ने फ़िर कहा- " मित्र। हम दोनों तो सदा sangi है। हम दोनों जुदा तो हो ही नही सकते। फ़िर हमारा तुम्हारा विरह कैसे होगा। aahladini के लिए ये सम्भव नही कि vo hame जुदा करे। क्योंकि aahladini hame बहुत प्रेम करती है और hame कभी अलग नही देख सकती। मगर माया मेरी कठिन से कठिन agya मान सकती है। vo अपनी त्रिगुण शक्ति से ऐसे drishy पैदा karegi, jaha हम दोनों तो होंगे, मगर vaha तुम मुझे सीधे देख न paaoge। मुझे जुदा हो जाओगे। यानी सिर्फ़ dhokhe का विरह होगा। सहज विरह तो प्रेम में कभी होता ही नही। "
सांख्य- " ऐसी बात है, तो चलो, माया को बुलाओ। हम विरह विरह खेलते है। "
आदि- " जैसी तुम्हारी इच्छा।"
इतना कहते ही त्रिगुण माया prakat हुई और सांख्य पुरूष उसके पास आया। पुरूष को पास आया देख कर माया ने अपने तीन गुणों का खेल दिखाया और पुरूष को यह अंहकार प्राप्त हुआ कि उसका अस्तित्व आदि के बिना ही है। वो आदि से अलग हो गया। teeno गुणों कि एक बहुत बड़ी शक्ति prakat हुई। यह महत-तत्व था।
एक दिन सांख्य ने आदि से कहा- "आदि पुरूष। मैं तुम्हारा नित्य का सखा हूँ। हम दोनों कभी अलग नही है। तुम आदि पुरुषों हो और मैं सांख्य पुरूष। मेरा तुम्हारा सर्वदा का प्रेम है। हम कभी जुदा नही हो सकते। अगर मैं कभी तुम से बिछड़ गया तो दुनिया कैसी होगी?"
आदि ने उत्तर दिया- "अरे, आज हमारे नित्य के मिलन में विरह के भाव क्यो आ गए?"
सांख्य ने प्रश्न किया- "ये विरह क्या है?"
आदि ने कहा- "विरह प्रेम का एक उच्च स्वरुप है। प्रेम का ही अंग है। कोई भी प्रेम विरह के बिना पूरा ही नही होता। विरह में दोनों प्रेमी एक दूसरे से दूर हो जाते हैं, और फ़िर एक दूसरे से फ़िर से मिलने के लिए बेचैन होते है।"
सांख्य- " यह विरह कैसा होता है?"
आदि- " जान के क्या करोगे?"
सांख्य- "तुम्ही ने तो कहा कि विरह प्रेम का उच्च स्वरुप है। हे सखे, क्यो न हम इस सुंदर प्रेम का rasaswadan करे?"
आदि परम ज्ञानी था। सांख्य भी ज्ञानी था। दोनों का ज्ञान सुस्थिर था। मगर वो दोनों मात्र ज्ञान से संतुष्ट नही होते थे। उन्हें तो विज्ञान में ही मजा आता था। किसी वस्तू को जानना ज्ञान है और वस्तू का pratyaksh अनुभव लेना विज्ञान है। इसी विज्ञान के लिए ही सांख्य ने आदि से ये prashn किया। निरंतर वर्धमान प्रेम को नए नए swaroopo को प्राप्त करना ही चाहिए। आदि सर्व समर्थ था। वो सब कुछ कर सकता था। इसलिए सांख्य कभी कभी उसे परम भी kahta था। आदि सांख्य के खेल के लिए नए नए drishy भी पैदा कर सकता था, मानो vahi sachchi दुनिया हो। और फ़िर उस नए drishy में दोनों मित्र खेला करते थे। अब सांख्य विरह के drishy कि मांग कर रहा था।
आदि- " विरह तो सचमुच सुंदर है, मगर vaha तुम तो hoge, मगर मैं तुम्हे न dikhunga। और jaha मैं hunga, vaha तुम मुझे न dikhoge।"
सांख्य- " यही तो विरह है न। मगर क्या पूरे खेल bhar तुम मुझे न dikhoge?"
आदि- " नही, नही। कभी कभी मिलेंगे ही। मैं विरह में आ jaya karunga। मगर..."
सांख्य- " मगर क्या? "
आदि- " मगर विरह में मेरी प्रबल bahiranga माया होगी। kahin उसके prabhav में तुम मुझे भूल jaao तो, pehchan न paao तो?"
सांख्य- "माया क्यो ?"
ये prashn तो सचमुच gambhir था। दो mitro के बीच bahiranga क्यो? vahi antaranga क्यो नही, जो hardam खेल में साथ देती है। या फ़िर vo tatastha क्यो नही, जिसमे दोनों का सहज अस्तित्व है?
आदि ने कहा- " माया तो होगी न। वरना विरह कैसे होगा?"
सांख्य को अचरज में देखकर आदि ने फ़िर कहा- " मित्र। हम दोनों तो सदा sangi है। हम दोनों जुदा तो हो ही नही सकते। फ़िर हमारा तुम्हारा विरह कैसे होगा। aahladini के लिए ये सम्भव नही कि vo hame जुदा करे। क्योंकि aahladini hame बहुत प्रेम करती है और hame कभी अलग नही देख सकती। मगर माया मेरी कठिन से कठिन agya मान सकती है। vo अपनी त्रिगुण शक्ति से ऐसे drishy पैदा karegi, jaha हम दोनों तो होंगे, मगर vaha तुम मुझे सीधे देख न paaoge। मुझे जुदा हो जाओगे। यानी सिर्फ़ dhokhe का विरह होगा। सहज विरह तो प्रेम में कभी होता ही नही। "
सांख्य- " ऐसी बात है, तो चलो, माया को बुलाओ। हम विरह विरह खेलते है। "
आदि- " जैसी तुम्हारी इच्छा।"
इतना कहते ही त्रिगुण माया prakat हुई और सांख्य पुरूष उसके पास आया। पुरूष को पास आया देख कर माया ने अपने तीन गुणों का खेल दिखाया और पुरूष को यह अंहकार प्राप्त हुआ कि उसका अस्तित्व आदि के बिना ही है। वो आदि से अलग हो गया। teeno गुणों कि एक बहुत बड़ी शक्ति prakat हुई। यह महत-तत्व था।
इसी के साथ आदि और सांख्य का 'विरह' नामक खेल शुरू हुआ। आगे क्या हुआ? ये जानने के लिए पढिये-
"सांख्य और आदि : पुरूष सूत्र।-२ "
गोविन्दम्-आदिपुरुषम-तं-अहम्-भजामि।
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
एक लेख, भगवद्गीता को समर्पित.
ॐ
श्री श्री गुरु गौरंगो जयते॥
श्री श्री गुरु गौरंगो जयते॥
सभी भग्वद्रसानुरगियो को जय श्री कृष्ण।
श्रील गुरुदेव श्री श्रीमद् भक्तिवेदांत नारायण गोस्वामी महाराज के चरण कमलों में शत कोटि नमन करके मैं इस लेख की शुरुआत करता हूँ। श्रीमद् भगवद्गीता जी भगवन श्री कृष्ण के मुख कमल से निःसृत वह मधुर धारा है, जिसने सहस्रों वर्षों से अनेकानेक जीवों का कल्याण करते हुए उन्हें भग्वद्प्रेम और कृपा के रस से सराबोर कर दिया है।
भगवन व्यास तथा उनके अनुगामी विद्वत समाज ने श्री गीता जी को प्रस्थानत्रयी में महान उच्च स्थान प्रदान किया है। इतना ही नही, मुझे लगता है कि गीता जी सभी विषयों पर निर्णय देने तथा ज्ञानार्थी जिज्ञासुओं कि पिपासा पुर्णतः शांत करने में अकेली ही सक्षम हैं। किसी जीव के अज्ञान का बोझ इतना बड़ा नही हो सकता जितनी शक्तिशाली ज्वाला गीता जी के एक श्लोक, एक अर्धाली, अथवा मात्र एक पद में है, जो संसार भर कि अज्ञान-राशि को क्षण भर में जला कर भस्म कर सकती है। आगे हम कुछ ऐसे पदों कि चर्चा करेंगे, जो स्वयं ही "गागर में सागर" के भावः को चरितार्थ करती हैं।
श्री गीता जी के विषय में विचार करने से पूर्व दो चार बातों पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है। ये बातें गीता जी के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य नियमावली के सामान हैं, जिनका पालन करने पर ही वे गीता जी के असली कृपा का रसास्वादन कर सकेंगे।
पहली बात है श्री कृष्ण में विश्वास करना। श्रीकृष्ण ही गीता जी के प्रथम वक्ता तथा अर्जुन प्रथम अनुमोदक हैं। इस बात को अस्वीकार करना बहुत बड़ी मुर्खता होगी। कुछ लोग यह सोच लेते हैं कि श्रीकृष्ण ने गीता नही कही। बल्कि यह किसी विद्वान या विद्वान्-मंडली के बुद्धि का कमाल है। एक ही व्यक्ति कुछ ही मिनटों में संसार के सर्वश्रेष्ठ धर्म कि बात इतनी आसानी से कैसे कर सकता है?! मगर यही तो श्री गीता जी कि महिमा और उनका चमत्कार है।
दूसरी बात है श्रीकृष्ण कि भगवत्ता। कुछ महानुभाव ये स्वीकार ही नही करते कि श्रीकृष्ण भगवान् हैं। परन्तु गीता जी में ही अनेक स्थानों पर श्रीकृष्ण ने स्वयं को भगवान् घोषित किया है। इन प्रसंगों के विषय में ऐसे लोग यह कहते हैं कि श्रीकृष्ण नही बोल रहे हैं। उनके भीतर बैठा परमात्मा या उनका आत्म-तत्त्व बोल रहा है। लेकिन गीता जी कि ठीक से सेवा करने पर यह बात पता चलती है कि जब जब किसी परमात्मा या आत्म-तत्व कि चर्चा हुई है; वह अलग से हुई है। श्रीकृष्ण जब भी अपनी बात करते हैं तब 'अहम्' शब्द का प्रयोग करते हैं। तथा जब भी आत्मा या परमात्मा की बात करते हैं, तब उसका नाम लेते हैं अथवा 'तत्' शब्द का प्रयोग करते हैं। इस बात कि विशेष चर्चा हम तब करेंगे; जब अठारहवें अध्याय पर विमर्श होगा।
टीसती बात है परमादेश का पालन। श्रीकृष्ण ने गीता जी में तीन स्थानों पर शरणागति का आदेश दिया है। शरणागति जीवन के हर क्षेत्र में अवश्यक है। यहाँ तक कि गीता जी को समझने और उनका मुख्य उद्देश्य प्राप्त करने के लिए भी (देखिये अध्याय-२, श्लोक-४९)।
चौथी बात है गीता जी कि सत्यता तथा अधिकारिता पर विशवास। गीता जी का प्रत्येक श्लोक, प्रत्येक पद, प्रत्येक शब्द, प्रत्येक अक्षर; सत्य तथा चेतन है। ऐतिहासिक रूप से, व्यावहारिक रूप से, बौद्धिक रूप से तथा अन्य किसी भी रूप से। गीता जी में क्षेपक तथा काल्पनिकता की करना सबसे बड़ी मुर्खता है।
--शेष फ़िर।
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