शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

sankhy aur aadi : purush sukt -3

हरे कृष्ण. 
नमस्कार मित्रों. इतने दिनों तक ब्लॉग से दूर रहने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ.
हाँ तो अब तक जो दो भाग लिखे, उनसे इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि हम सभी जीव उसी आदि-पुरुष गोविन्द के नित्य प्रेमी सखा हैं. जैसा कि भगवान् कपिल ने हमें नाम दिया था- सांख्य पुरुष. पर हम इस भौतिक प्रकृति में आ कर अपनी सच्ची अवस्था को भूल गए और गोविन्द से दूर हो गए. मगर गोविन्द ने अपने पुराने वादे को याद रखा और हमें फिर से चेत करा के अपने पुराने स्वरुप को याद दिलाने के लिए ही उसने भगवद्गीता को हमारे सामने प्रकाशित किया.
ये कथा मैंने प्रथम अध्याय के लिए लिखी है.
गीता के प्रथम अध्याय को जब भी मैं पढता हूँ, मेरे सामने सांख्य पुरुष का वो दुखी चेहरा सामने आता है, जब वो प्रकृति के गुणों में फंसा हुआ, दुखी, शोकाकुल और अपने-पराये के भेद- अभेद में भ्रमित बैठा है. और अचानक सांख्य को अपने नित्य सखा आदि कि याद आती है.
अचानक ही सांख्य को पता चलता है कि गोविन्द से दूर रहने के कारण वह कितने भयानक और विकत परिस्थितियों में फंस गया है-
"न च शक्नोम्यवस्थातुम भ्रमतीव च में मनः.
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव." (गीता- १-३० )
हे केशी रूपी सरपट दौड़ने वाले इन्द्रियों का दमन करने वाले दामोदर- कृष्ण, यहाँ तो सब कुछ अमंगल ही दीख रहा है. ओह. मैं तो स्वयं को ही भूल बैठा हूँ और मेरा सर चक्र रहा है. मैं अब यहाँ और अधिक खडा नहीं रह सकता.
इस जगत में जब श्री गोविन्द ने हमें अपने सत्-स्वरुप का ज्ञान प्रकट कर के बताया, तब उन्होंने अपने परम भक्त अर्जुन को निमित्त बनाया. असल में हम सभी अलग अलग पुरुष-तत्व हैं. सांख्य दर्शन जिस तत्व को सांख्य पुरुष और आदि पुरुष कहता है, उसे ही न्याय दर्शन आत्मा और परमात्मा तथा वेदांत ब्रह्म और परब्रह्म क्रमशः पुकारते है.
तो, हम सभी आत्माएं उस परमात्मा के प्रेमी जन है. अर्जुन उनका अत्यंत शुद्ध भक्त तथा प्रेमी है. अतः श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता के ज्ञान का निमित्त बनाया है. 
भगवद्गीता का पहला अध्याय एक प्रकार से इस ज्ञान के लिए पृष्ठभूमि तथा भूमिका के सामान है- जहाँ अर्जुन को अचानक याद आता है कि वो इस दुनिया के झमेलों में फंस गया है. हलाँकि उसे इन झमेलों से निकलने का मार्ग सुझाई नहीं देता; फिर भी वो अपनी ये दुर्दशा अपने परम प्रेमी कृष्ण को बताता है- इस आशा में कि आदि पुरुष अपने मित्र सांख्य पुरुष को इस दुःख से छूटने का उपाय जरूर बताएगा.
अर्जुन देखता है कि इस त्रिगुण मयी माया के वश में लोग किस प्रकार भगवान् के प्रेम को भूल के आपस में ही लड़ने मरने के लिए तैयार हो जाते है. भाई भाई को, पिता पुत्र को, और पुत्र पिता को मार डालने के लिए प्रेरित हो जाता है, और ये भी नहीं सोच पाता कि क्या कर रहा है? क्यों कर रहा है?
यह सब देख के अर्जुन तो अत्यंत व्याकुल तथा दुखी हो गया ; यहाँ तक कि-
"वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते.
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते.." (गीता- १-२९ )
मेरा शरीर कांप रहा है, रोंगटे खड़े हो रहे है, गांडीव हाथ से सरका जा रहा है और मेरी त्वचा जल रही है.
अब अचानक उसे समझ में आता है कि ये सभी भौतिक सुख उसके किसी काम के नहीं हैं. इन सुखो को पा के क्या फायदा? जब कि ये सभी सुख किसी न किसी अन्य जीव के दुःख पर आधारित होते है.
"न च श्रेयो-अनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे.
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च.."
हे मेरे मन को आकर्षक लगने वाले प्यारे मित्र! इस झगडे में अपने ही प्यारे मित्रों को मार के मुझे कोई भलाई नजर नहीं आती. मैं तो अब किसी भी विजय, सुख, राज्य आदि कि इच्छा भी नहीं रखता.
इस प्रकार, भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का सार यही है कि हम सभी इस संसार में अपनी विकट परिस्थिति को समझे और अपने उस प्यारे मित्र आदि गोविन्द को याद करे कि वो इस परिस्थिति को समझने तथा इस से पार पाने में हमारी मदद करे.
अब इस कथा- "सांख्य और आदि : पुरुष सूक्त " को 'इति' के साथ विराम देते हैं.
गोविन्दम् आदि पुरुषं, तं अहम् नमामि. 
शेष फिर. 

2 टिप्‍पणियां:

Yogesh Verma Swapn ने कहा…

parmanand, agle lekh ki prateeksha men.

Arini's ने कहा…

मैं अपनी पोस्ट पढ़ने, प्यार ... बहुत दार्शनिक, जीवन के अर्थ के बारे में,,,
परिचित बधाई और हम से दोस्ती ...