एक दिन सांख्य ने आदि से कहा- "आदि पुरूष। मैं तुम्हारा नित्य का सखा हूँ। हम दोनों कभी अलग नही है। तुम आदि पुरुषों हो और मैं सांख्य पुरूष। मेरा तुम्हारा सर्वदा का प्रेम है। हम कभी जुदा नही हो सकते। अगर मैं कभी तुम से बिछड़ गया तो दुनिया कैसी होगी?"
आदि ने उत्तर दिया- "अरे, आज हमारे नित्य के मिलन में विरह के भाव क्यो आ गए?"
सांख्य ने प्रश्न किया- "ये विरह क्या है?"
आदि ने कहा- "विरह प्रेम का एक उच्च स्वरुप है। प्रेम का ही अंग है। कोई भी प्रेम विरह के बिना पूरा ही नही होता। विरह में दोनों प्रेमी एक दूसरे से दूर हो जाते हैं, और फ़िर एक दूसरे से फ़िर से मिलने के लिए बेचैन होते है।"
सांख्य- " यह विरह कैसा होता है?"
आदि- " जान के क्या करोगे?"
सांख्य- "तुम्ही ने तो कहा कि विरह प्रेम का उच्च स्वरुप है। हे सखे, क्यो न हम इस सुंदर प्रेम का rasaswadan करे?"
आदि परम ज्ञानी था। सांख्य भी ज्ञानी था। दोनों का ज्ञान सुस्थिर था। मगर वो दोनों मात्र ज्ञान से संतुष्ट नही होते थे। उन्हें तो विज्ञान में ही मजा आता था। किसी वस्तू को जानना ज्ञान है और वस्तू का pratyaksh अनुभव लेना विज्ञान है। इसी विज्ञान के लिए ही सांख्य ने आदि से ये prashn किया। निरंतर वर्धमान प्रेम को नए नए swaroopo को प्राप्त करना ही चाहिए। आदि सर्व समर्थ था। वो सब कुछ कर सकता था। इसलिए सांख्य कभी कभी उसे परम भी kahta था। आदि सांख्य के खेल के लिए नए नए drishy भी पैदा कर सकता था, मानो vahi sachchi दुनिया हो। और फ़िर उस नए drishy में दोनों मित्र खेला करते थे। अब सांख्य विरह के drishy कि मांग कर रहा था।
आदि- " विरह तो सचमुच सुंदर है, मगर vaha तुम तो hoge, मगर मैं तुम्हे न dikhunga। और jaha मैं hunga, vaha तुम मुझे न dikhoge।"
सांख्य- " यही तो विरह है न। मगर क्या पूरे खेल bhar तुम मुझे न dikhoge?"
आदि- " नही, नही। कभी कभी मिलेंगे ही। मैं विरह में आ jaya karunga। मगर..."
सांख्य- " मगर क्या? "
आदि- " मगर विरह में मेरी प्रबल bahiranga माया होगी। kahin उसके prabhav में तुम मुझे भूल jaao तो, pehchan न paao तो?"
सांख्य- "माया क्यो ?"
ये prashn तो सचमुच gambhir था। दो mitro के बीच bahiranga क्यो? vahi antaranga क्यो नही, जो hardam खेल में साथ देती है। या फ़िर vo tatastha क्यो नही, जिसमे दोनों का सहज अस्तित्व है?
आदि ने कहा- " माया तो होगी न। वरना विरह कैसे होगा?"
सांख्य को अचरज में देखकर आदि ने फ़िर कहा- " मित्र। हम दोनों तो सदा sangi है। हम दोनों जुदा तो हो ही नही सकते। फ़िर हमारा तुम्हारा विरह कैसे होगा। aahladini के लिए ये सम्भव नही कि vo hame जुदा करे। क्योंकि aahladini hame बहुत प्रेम करती है और hame कभी अलग नही देख सकती। मगर माया मेरी कठिन से कठिन agya मान सकती है। vo अपनी त्रिगुण शक्ति से ऐसे drishy पैदा karegi, jaha हम दोनों तो होंगे, मगर vaha तुम मुझे सीधे देख न paaoge। मुझे जुदा हो जाओगे। यानी सिर्फ़ dhokhe का विरह होगा। सहज विरह तो प्रेम में कभी होता ही नही। "
सांख्य- " ऐसी बात है, तो चलो, माया को बुलाओ। हम विरह विरह खेलते है। "
आदि- " जैसी तुम्हारी इच्छा।"
इतना कहते ही त्रिगुण माया prakat हुई और सांख्य पुरूष उसके पास आया। पुरूष को पास आया देख कर माया ने अपने तीन गुणों का खेल दिखाया और पुरूष को यह अंहकार प्राप्त हुआ कि उसका अस्तित्व आदि के बिना ही है। वो आदि से अलग हो गया। teeno गुणों कि एक बहुत बड़ी शक्ति prakat हुई। यह महत-तत्व था।
इसी के साथ आदि और सांख्य का 'विरह' नामक खेल शुरू हुआ। आगे क्या हुआ? ये जानने के लिए पढिये-
"सांख्य और आदि : पुरूष सूत्र।-२ "
गोविन्दम्-आदिपुरुषम-तं-अहम्-भजामि।
8 टिप्पणियां:
आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में हार्दिक स्वागत है. आपके नियमित लेखन के लिए अनेक शुभकामनाऐं.
एक निवेदन:
कृप्या वर्ड वेरीफीकेशन हटा लें ताकि टिप्पणी देने में सहूलियत हो. मात्र एक निवेदन है बाकि आपकी इच्छा.
वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?> इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये!!.
blog jagat men swagat.
swagat hai aapka
अच्छी पोस्ट लिखी है अगली पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी।
good.narayan narayan
good good
Aapka prayass sarahniya aur prenaspad hai...Gita ke sambandh mein aaj mein bhi apne blog par kuch likha hai...
Neelesh Jain
www.yoursaarathi.blogspot.com/
aap logon ke sundar protsahan ka dhanyavaad.
i will continue to write here. and now i am going to post the second part of this- samkhy-aadi story.
jai shri krishna. hari bol.
and dandwat pranaam to all of you.
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