गुरुवार, 25 मार्च 2010

Shri Vigrah

मूर्त, अमूर्त और श्री विग्रह- ३.
हरे कृष्ण.
दंडवत प्रणाम.
मित्रों, पिछले ब्लॉग पर प्रमाण की चर्चा में कुछ ज्यादा ही समय गवां दिया. आज सीधे मुख्य बात पर आते हैं-
[यद्यपि मैं अपनी चलती फिरती भाषा का ही प्रयोग करूँगा, क्योंकि अन्य कोई भाषा मुझे आती नहीं है. अगर कोई त्रुटी हो जाए तो भक्तजन क्षमा करेंगे.]
भगवान का स्वरुप:-
श्री ब्रह्मा जी ने ब्रह्म-संहिता में भगवान के स्वरुप की चर्चा करते हुए कहा है-
अंगानि यस्य सकलेंद्रिय-वृत्तिमंति 
पश्यन्ति पांति कलयन्ति चिरं जगन्ति.
आनंद-चिन्मय-सदुज्ज्वल-विग्रहस्य 
गोविन्दमादिपुरुषम तमहं भजामि..(३२)
उन आदि-पुरुष श्री गोविन्द का मैं भजन करता हूँ, जिनका श्री विग्रह - आनंदमय, चिन्मय और सत्-मय होने के कारण परम उज्जवल है; जिस श्रीविग्रह के सारे अंग (अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय) समस्त इन्द्रियों की सारी वृत्तियों से संपन्न हैं और जो चिद-अचिद अनंत जगत्समूह का नित्य दर्शन, पालन और नियमन करते हैं.
परम-अंगी
भगवान के सारे अंग समस्त इन्द्रियों की सभी वृत्तियों से संपन्न हैं. हमारी इन्द्रियों में ऐसी बात नहीं होती. हम आँखों से रूप-रंग आदि देख सकते हैं, जिह्वा से षड रसों का अस्वादन कर सकते हैं, नाक से सुगंध ले सकते हैं, त्वचा से छू सकते हैं, कानो से सुन सकते हैं. हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ अपनी अपनी विषय-वस्तुओं से बंधी हुई है. हम आँखों से स्वाद नहीं ले सकते. इसी तरह अन्य इन्द्रियों से किसी अन्य इन्द्रिय के विषय का भोग संभव नहीं है.
कोई कहे कि अगर हम अपनी पसंदीदा मिठाई देखें तो हम उसका स्वाद देखने मात्र से ही महसूस कर सकते हैं. अतः इन्द्रियों को तत-सम्बन्धी विषयों से बंधा मानना गलत है. मगर यहाँ हम एक छोटी सी भूल करेंगे. आँखे मिठाई को देख के मात्र उसके स्वाद का स्मरण ही दिलाती है. यहाँ हमारी बुद्धि प्रत्यक्ष से रूप का ज्ञान प्राप्त कर के अनुमान द्वारा स्वाद का ज्ञान प्राप्त करती है. फिर आखिर में उस स्वाद कि प्राप्ति जिह्वा को ही होती है. स्वादिष्ट मिठाई देख के आँखों में नहीं, मुंह में पानी आता है.
यहाँ हमें मन और बुद्धि के अनुदान पर अवश्य ध्यान देना चाहिए. असल में मन ही सभी प्रकार के इन्द्रियों और बुद्धि के बीच सेतु का काम करता है. बुद्धि में ही पहले से चखे गए मिठाई का प्रत्यय मौजूद रहता है. हमारा मन आँखों से प्राप्त मिठाई के रूप को बुद्धि के प्रत्यय से मेल करता है. यह विकल्प उत्पन करना ही मन का काम है. फिर जब बुद्धि उसे बताती है कि यह तो वही परिचित मिठाई है, तो फिर मन ही उसके स्वाद को पाने का संकल्प करता है और जिह्वा उस पुराने स्वाद का बुद्धि कि सहायता से रसास्वादन करती है. इसी लिए कहा गया है कि सभी विषय असल में मन से ही बंधे हैं. {अगर आपका मन सचिन तेंदुलकर के ९९ के स्कोर पर है, तो आपके सामने आपकी पसंदीदा मिठाई भी परोसी जाए, तो भी आप उसके स्वाद पर ध्यान नहीं देंगे. कहेंगे क्या?}
मगर श्री भगवान के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है. वे बाह्य रूप से कहीं भी लगे हों, वे आवश्यक विषयों का अस्वादन कर सकते हैं; बगैर तत-सम्बन्धी इन्द्रिय और मन को उस विषय से जोड़े.
एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ- भगवान शेष-सैया पर टाँगें पसरे सो रहे हैं, लक्ष्मी जी चरण दबा रही हैं, भक्त जन दर्शन पा रहे हैं, मुनि जन मंगल गा रहे हैं. इसी बीच किसी भक्त ने अपने घर में ही बैठे बैठे श्री भगवान को लड्डू का भोग लगाया. लक्ष्मी जी ने प्रभु से कहा- " स्वामिन! क्या भोग के लिए प्रसाद प्रस्तुत किया जाए?"
नारायण ने कहा- " देवी! अभी पेट भरा है. मैंने अभी अभी एक थाली भर कर लड्डू खाया है."
(साइकिल की घंटी बजाने वाले लोगों से मुझे कुछ नहीं कहना है. छंद-अलंकार के पुस्तक की कौन सी उपमा और कौन  सी अतिशयोक्ति मैंने लगाई है, यह भी विषयांतर की ही बात है. अतः अस्तु! )
देखिये, भगवान को उस भक्त के सामने प्रकट होने की कोई जरूरत नहीं. उसके लड्डुओं को हाथों से उठा के, मुंह में रख के, दांतों से चबा के, जिह्वा से स्वाद ले के, आहार नाल के द्वारा उदरस्थ करने की भी जरूरत नहीं है. फिर भी उन्होंने उन लड्डुओं को पूरा का पूरा भोग लगाया है. यद्यपि वे लड्डू अब भी जैसे के तैसे उस भक्त की थाली में पड़े मिलेंगे; फिर भी भगवान ने उनका स्वाद ले लिया.
इसी लिए गोस्वामी जी ने लिखा है-
"आनन रहित सकल रस भोगी! बिनु बानी बकता बड़ जोगी!!"
भगवान ऐसी युक्ति लगा लेने वाले योगी हैं जो बिना मुख के ही सकल रसों का अस्वादन कर लेते हैं, बिना कंठादी का प्रयोग किये ही अपने भक्तों तक अपनी बात पहुंचा देते हैं.
असल में भगवान आँखों से स्वाद ले सकते हैं, मन से गमन कर सकते हैं,  आकाश (जो कि उनके कान हैं) से बोल सकते हैं. वे किसी भी एक ही इन्द्रिय से बाकी सभी इन्द्रियों का भी काम कर सकते हैं.
वेदों ने भी कहा है- "सर्वतः पाणि पादम तत सर्वतो अक्षि-शिरो-मुखं - - " .
इसी कारण ब्रह्माजी ने भी श्रीनाथ जी के बारे में निर्णय दिया कि-
अंगानि यस्य सकल-इन्द्रिय-वृत्तिमंति..
जगादाधिपति
श्री भगवान समस्त जगती के अधिपति हैं. यद्यपि इस संसार को प्रत्यक्ष रीती से शासित करने की उनको कोई आवश्यकता नहीं है. उनके सम्पूर्ण अंग समस्त रूप से स्थिर रहते हुए भी उनके सभी कार्य सुचारू रूप से पूरा कर सकते हैं. वे सदा अपने चिंतामणि-धाम वैकुण्ठ में अपने भक्तो के साथ आनंद-विनोद करते रहते हैं, फिर भी सदा सर्वदा, एक भी क्षण भूले बगैर अनंत-कोटि ब्रह्माण्ड के लोकों, जीवों और भक्तजनों को देखते रहते हैं, उनका पालन करते रहते हैं और उनका सही रीती से नियमन करते रहते हैं. ऐसा वे चिर काल से करते आ रहे हैं. और आज तक थके नहीं हैं, नाही अपने कर्तव्य से कभी डिगे हैं. अगर वे एक पल को भी अपने कार्य से हट जाए, तो ये पूरा कारोबार - जो जगत-जंजाल के रूप में दृष्टिगोचर होता है;  नष्ट हो कर तिनके की तरह बिखर जाएगा. इसीलिए तो ब्रह्माजी ने कहा है:-
 पश्यन्ति पांति कलयन्ति, चिरं जगन्ति.

सच्चिदानंद 
भगवान सत्-चित-आनंदमय हैं. वे सुख-दुःख से परे हैं. वे तो नित्य-ज्ञान से किसी प्रकार जीवों में उत्पन्न हो सकने वाले द्रष्टा-भावी आनंद से संपन्न हैं. उन्हें किसी अनुकूल की प्राप्ति में सुख नहीं होता, किसी प्रतिकूल के होने से दुःख भी नहीं होता. असल में उनको न तो कोई आशा है, न ही कोई इच्छा. अतः उनके लिए कुछ भी अनुकूल या प्रतिकूल नहीं है. इसी कारण सुख-दुःख भी नहीं है. वे तो अपने भक्त जनों के मधुर लीलाओं को देख देख के आनंद की प्राप्ति करते रहते हैं. उनके भक्त भी इसी प्रकार उनके सुन्दर लीलाओं से आनंद को पाते हैं, और सुख-दुःख से ऊपर उठ जाते हैं.
भगवान त्रिगुणातीत हैं. प्रकृति के तीन गुण हैं- सत्य, रजः और तमः. सत्य से ज्ञान की, रजः से गति की, और तमः से जड़ता की प्राप्ति होती है. मगर भगवान को तो तीनो में से किसी की प्राप्ति नहीं करनी है. बहिरंगा प्रकृति इन्ही तीनों गुणों के द्वारा  इस असत संसार को हमारे सामने सत्य बतलाते हुए प्रकट करती है. (यहाँ मेरे द्वारा इस्तेमाल सत् शब्द प्रकृति के तीन गुणों में प्रथम सत्  से अलग है. यह शब्द सत्ता, या होने के बारे में है. सत्ता से मेरा मतलब है- To be, To exist.) मगर असलियत तो यह है कि सिर्फ भगवान की ही सत्ता है, वही एक मात्र सत् हैं. [अगर आप ज्ञान के मार्ग से जाना चाहें, तो ये मान सकते हैं कि भगवान सम्पूर्ण सतोमय हैं. वे गतिमय राजस और जड़तामय तामस प्रकृति से अलग हैं]
पुनः भगवान चूँकि जड़ता से भिन्न हैं, और इसके आगे हम अपनी भाषा में और कोई निर्णय नहीं दे सकते, अतः वे चित हैं.
यद्यपि हमारा पूर्व-स्थापित सिद्धांत उन्हें जड़ और चेतन दोनों से परे मानता है, तथापि हम मात्र चेतन के द्वारा ही उन्हें जान सकते हैं.
यहाँ पर सत् और चेतन से सम्बन्धी सिद्धांत में अन्यथा-दोष पाया जा सकता है. मगर ऐसा सोचना भूल होगी. भाषा के कमजोरी के कारण ही ऐसा प्रतीत होता है कि पहले त्रिगुनातित कह के फिर सत् कहना, और जड़-चेतन से परे कह के फिर चित मानना बेवकूफी है. असल में प्रकृति के तीन गुणों का नामकरण ही इस प्रकार हुआ है. तामस वह गुण है, जो हमें अन्धकार और अज्ञान (तम) कि स्थिति में ले जाता है. राजस वह है जो गतिमय, कर्ममय और बीजमय (रज) बनाता है. और सत्व वह है जो प्रकाशमय, ज्ञानमय और समझदार बनाता है ताकि हम जाने कि जो जगत है, उसकी सत्ता नहीं है. सत्ता तो एकमात्र ईश्वर की ही है. अर्थात प्रकृति का सत् हमें त्रिगुनातित सत् (असली सत्ता) की ओर प्रेरित करता है, इसी कारण (दिल्ली जाने वाला मार्ग "दिल्ली-रोड" ऐसा जाना जाता है) सत्व, ऐसा नाम उस गुण का दिया गया है. 
पुनः हमारा जगत और शरीर जड़-चेतन मय है. शरीर में जड़ता है, मगर मन-बुद्धि आदि में चेतनता मालूम देती है. इस चेतनता का मूल कारण तो वेद-प्रसिद्द आत्म-तत्व है. आत्मा असल में भगवान का ही अंश है- मामैवंशो जीव . असल में पूर्ण चैतन्य तत्व तो श्री भगवान ही हैं. इस जड़-चेतन मय संसार में जिसे चेतन कह के पुकारा गया है, वह घटाकाश, या दर्पण-प्रतिबिंबित-सूर्य की ही भांति उस चेतन की छाया मात्र है. इसी कारण संसार के जिस वस्तु की व्याख्या जड़ के द्वारा संभव नहीं है; उसे चेतन कह कर पुकारने की परिपाटी चल पड़ी है.
इसी कारण उन भगवान को आनंदमय, चिन्मय और सत्वमय कहा गया है. उन सच्चिदानंद प्रभु का यह दिव्य-वर्णनातीत स्वरुप परम-उज्जवल है. उज्जवल से यहाँ मतलब है प्रकाशमय. उज्जवल से इन्द्रिय-विषय-रूपी सफ़ेद रंग के भ्रम में परने की जरूरत नहीं है. प्रकाशमय भी कहना गलत ही होगा. चूँकि वे ऐसे ही सच्चिदानन्दमय श्री-विग्रह के रूप में भक्तों के सामने प्रकाशित होते हैं; इसी कारण प्रकाशित, प्रकाशमय या उज्जवल कहा है.
और इसी कारण ब्रह्माजी ने कहा है कि:-
आनंद-चिन्मय सत्-उज्जवल विग्रहस्य
गोविन्दमादिपुरुषम तं अहम् भजामि..

शेष फिर, तब तक के लिए
राम-नवमी की शुभकामनाओं सहित.
जय श्री राम.
गोविन्दम् आदिपुरुषम तं अहम् भजामि. 

शनिवार, 20 मार्च 2010

shree vigrah.

मूर्त, अमूर्त और विग्रह.- २.
हरे कृष्ण, मित्रों ! दंडवत प्रणाम.
पिछले ब्लॉग पर हमने देखा कि किस प्रकार हमारी बुद्धि बाह्य-जगत में उपस्थित मूर्त पदार्थों का अमुर्तिकरण कर के उनका चेतन जगत के प्रत्ययों से  सामंजस्य बिठाती है. ज्ञान प्राप्त करने का यही तरीका है.
ईश्वर के बारे में भी हम इसी प्रकार जान पाते हैं.
हम जो प्राकृतिक शक्तियों में ईश्वर को ढूंढते हैं, वह असल में इसी अमुर्तिकरण के स्वभाव के कारण होता है. हम अपने चारों तरफ जगत-विराट-पुरुष को रोज ही देखते हैं. [नास्तिकों को जाने दीजिये, वे बेचारे तो साक्षात् श्री भगवान को हमारी आपकी तरह सामने देखले, और खुद साइकिल पर हों, तो घंटी बजाते हुए बोले- "अबे! सामने से हट. मरना है क्या?"] इतना ही नहीं, उन्हें स्वयं अपने शरीर में, अपने आस पास के लोगों में, जीवों में, पेड़-पौधों में, नदी-पहाड़ों में; हर जगह महसूस करते हैं. फिर जब हम अपने विचारों का इस्तेमाल करते हैं, तब हमें एकदम से पता चलता है कि न तो हम शरीर हैं; न ही चारो तरफ ये सब जंजाल है. हम सब आत्माएं (सॉरी! वेदान्तिक रूप से एक अद्वैत आत्मा) हैं. फिर तो ईश्वर भी आत्म-स्वरुप हो जाता है. एक मात्र परमात्मा, जो संसार की सभी वस्तुओं का प्रत्ययात्मक मूल स्वरुप है.
मगर यह सब तो सामान्य समझ ही है. क्योंकि जिस चीज को असल आत्मा कहते हैं, वह सामान्य समझ से भी विलक्षण वस्तू है. कैसे मान ले की सत्य वस्तु जागतिक या वैचारिक सीमाओं में बंध सकती है? वह अवश्य ही परे है. तुरीय है.
अब चूँकि परे है, तुरीय है; तो फिर वह हमारी ऐन्द्रिक प्रत्यक्षों तथा मानसिक विचार-अनुमानों से अलग हो जाती है. हम न तो  उसे अपनी इन्द्रियों के प्रत्यक्ष कर के जड़ घोषित कर सकते हैं; न ही अपनी बुद्धि द्वारा अनुमानित कर के चेतन-मात्र साबित कर सकते हैं. [मुझे पता है कि बहुत से लोग होंगे जो मुझसे बहस करना चाहेंगे; सत्य को जड़ अथवा चेतन सिद्ध करने के लिए. मगर मैं बहस में थोडा कच्चा हूँ. इसलिए क्षमा. मैं अपनी बात कहूँगा और चलता बनूँगा.]
प्रमाण.
ऐसी ही अवस्था में प्रमाण-वाद का निर्णय करना पड़ता है. जब व्यक्ति यह तय नहीं कर पाता कि इन्द्रियों तथा बुद्धि में से कौन बेहतर ज्ञान दे सकता है.
मैं वैदिक परंपरा में स्थापित प्रमाण वाद का यहाँ जिक्र करना चाहूँगा.
वेदों में चार प्रकार के प्रमाण माने गए हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और उपमान(सत्-प्रत्यक्ष).
१. प्रत्यक्ष- हम अपनी इन्द्रियों का जड़ जगत से संपर्क कर के जो ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह प्रत्यक्ष कहलाता है. अगर प्रत्यक्ष द्वारा ही हमें सच्चे ज्ञान कि प्राप्ति हो जाये, तो फिर अन्य किसी भी प्रमाण कि जरूरत ही नहीं रह जाती है. इसी से कहा है- प्रत्यक्षे किम प्रमाणं.
२.. अनुमान- अगर प्रत्यक्ष से काम न बने, तो हमारी बुद्धि स्वयं स्मृत-कल्पना-संकल्प आदि अनुमानों द्वारा सत्य का निर्णय करने का प्रयास करती है. जैसे अगर सामने रस्सी रखी हो, और हमें सर्प नजर आए, तो बुद्धि यह निर्णय देती है कि अरे यह सर्प तो चल नहीं रहा, फन नहीं फैला रहा; देखो तो जीवित है कि नहीं. हम हिम्मत कर के आगे बढ़ते हैं. बुद्धि कहती है- अरेरे, ये तो रस्सी है. बेकार में डर गए.
          मगर हमने अभी देखा कि वास्तविक सत्य-ज्ञान में प्रत्यक्ष और अनुमान किसी काम के नहीं है. ऐसी ही स्थिति के लिए मनीषियों ने तीसरे प्रमाण कि  स्थापना की है.
३. शब्द - संसार में बहुत से लोग हो गए हैं, जिन्होंने भगवान कि कृपा से सत्य-चित-आनंद प्रभु का साक्षात्कार किया है. यद्यपि वह अवर्णनीय है, फिर भी उन्होंने हम जैसे मुर्ख लोगों के भले के लिए चलती-फिरती भाषा में ही सही, सत्य को वर्णनीय बनाने का प्रयास किया है. भारतीय परंपरा में ऐसे लोगों को आप्त-पुरुष कहते हैं. आज-कल कि भाषा में पारंपरिक-विद्वान; जिसे असली विद्या मिल गयी है. कुछ लोग ऐसे भी हो गए हैं, जिनको सामान्य भाषा में भगवान का वर्णन दोष-पूर्ण लगा; तो भगवान ने कृपा करके उनकी भाषा को इतना शक्तिशाली बना दिया कि वे सही-सही वर्णन कर सके. या यूँ कहिये कि उन पुरुषों के मुख से स्वयं भगवान ने ही सत्य का निर्णय किया. इन दुसरे प्रकार के लोगों को ऋषि कहते हैं.
ऋषियों ने जो उपदेश दिए, वही वेद के नाम से मशहूर हैं. वेद स्वयं भगवान की रचना है, इसलिए अपौरुषेय है, अकाट्य है, सत्य है और स्वतः प्रमाणित है. अन्य विद्वानों ने जो उपदेश दिए, वे शास्त्र के नाम से जाने जाते हैं. ये सारे उपदेश आज भी ग्रन्थ, पुस्तक आदि के रूप में हमारे बीच मौजूद हैं. इन्हें ही समग्र रूप से शब्द प्रमाण कहा जाता है. शब्द प्रमाण सर्व-श्रेष्ठ है, अन्यतम है, क्योंकि यह अनुभूत वाक्य है. मगर इसके साथ भी एक समस्या है. कौन से व्यक्ति के शब्द प्रमाण माने जाए, यह  एक बड़ी समस्या है. कैसे निर्णय हो कि वह सत्य ही कर रहा है? और कैसे निर्णय हो कि वह मेरे हित के लिए ऐसा कह रहा है. कहीं वह ठग तो नहीं, जो अपना उल्लू मेरे डंडे से सीधा करना चाहता है.
यही पर वेद हमारा सहायक होता है. चूँकि वेद स्वयं ईश्वर के उपदेश हैं, अतः उनके बारे में कोई शंका ही नहीं हो सकती. फिर हम उन लोगों के शब्दों पर भी ध्यान दे सकते हैं, जो वेदों के रीती के अनुसार अपना निर्णय देते हैं; न कि मनमाने ढंग से तथा वैदिक पद्धति से परे होकर. ऐसे लोग तो मुख्यतया नास्तिकवाद की ही स्थापना करते हैं. असल में सत्य वस्तु- ईश्वर से उन्हें कोई लेना देना नहीं होता है. वे बस इतना ही जानकर खुश हो जाते हैं कि जड़ क्या है, चेतन क्या है; और कौन सी बातें हैं, जिनका उपदेश करने से चेलों की संख्या बढती है?!!? :)
[इसीलिए प्रमाणिक गुरु की शरण लेना आवश्यक है. क्योंकि एकमात्र वही हैं, जो हमें वैदिक रीती से सच्ची शिक्षा देते हैं, और अन्य प्रमाणिक  आप्त-पुरुषों के शास्त्रों से परिचित करते हैं.]
४. उपमान - यह अंतिम प्रमाण है. कुछ विद्वानों ने इसे प्रत्यक्ष के ही अंतर्गत मन है, मगर मेरी समझ से (भूल-चुक-लेनी-देनी) उपमान ही श्रेष्ठतम प्रमाण है. या फिर यूँ कहें कि यह प्रमाण नहीं है; बल्कि सत्य का साक्षात्कार है. जी हाँ! असल में जब हम प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द आदि प्रमाणों द्वारा सत्य के बारे में जान लेते हैं {के बारे में, न कि स्वयं उसे ही-} तब हमारी ऐसी चेष्टा होती है, कि हम स्वयं उस सत्य को ही जाने. तब उस सत्य के प्रकट होने पर हम उसे पहचान लेते हैं (साइकिल कि घंटी नहीं बजाते); कि यही सत्य है. इसी को उपमान कहा जाता है.
इसे एक उदाहरण से समझते हैं- राम और स्याम दो मित्र थे, राम ने नीलगाय देखी थी; मगर स्याम को पता नहीं था कि नीलगाय क्या चीज है. अतः उसने राम से पूछा कि नीलगाय क्या है? राम ने कहा- नीलगाय एक जंगली पशु है, जो देखने में गाय की ही तरह लगती है. यह तो शब्द से प्राप्त ज्ञान हुआ. यानी स्याम ने नीलगाय के बारे में जान लिया. फिर एक दिन स्याम जंगल में गया. वहां उसे एक जानवर मिला जो गाय की तरह था. स्याम ने जाना कि यही नीलगाय है. इसतरह उपमान द्वारा स्याम ने नीलगाय का सत्य-ज्ञान प्राप्त किया. असल में पहले संता-बंता की जो कहानी कही थी, वह उपमान का ही उदाहरण है. यही थोथे फिलोसोफेर और सत्य-दार्शनिक के बीच का अंतर है. मगर यहाँ एक चीज महत्वपूर्ण है, की उपमान से पूर्व अन्य प्रमाणों द्वारा सत्य की व्यावहारिक जानकारी लेना आवश्यक है. अगर स्याम ने राम से नीलगाय के बारे में शब्द-ज्ञान नहीं लिया होता तो वह नीलगाय को भी गाय ही समझ लेता. यह तो साइकिल की घंटी बज जाती. :)
अतः पहले के तीनो प्रमाणों का भी महत्त्व है.
मगर चूँकि उपमान असल में साक्षात्कार का नाम है, तो चलिए; हम भी इसे प्रमाण की श्रेणी से हटा देते हैं और शब्द को ही महत्तम प्रमाण मन लेते हैं.
शब्द प्रमाण के आधार पर ईश्वर का स्वरुप:
                  मैं शब्द प्रमाण का ही प्रयोग करूँगा; क्योंकि स्वयं मुझे प्रत्यक्ष से सत्य नहीं मिल पाया और मेरी बुद्धि  ने तो कुछ दिनों पहले तक मेरे साथ खेल ही किया है. इसलिए मैं स्वयं तो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ. इसलिए मुझे क्षमा करे, और वैदिक शास्त्रों के शब्दों पर ध्यान दे.
जब ईश्वर ने ब्रह्माण्ड के पहले ऋषि- चतुर्मुख ब्रह्मा को वेद प्रदान किया, तब उन्होंने ईश्वर की स्तुति की. संस्कृत भाषा में वह स्तुति ब्रह्म-संहिता के नाम से प्राप्त होती है. उसी ब्रह्म-संहिता के पांचवे अध्याय में एक श्लोक में ब्रह्माजी ने भगवान का स्वरुप बतलाते हुए कहा है-
अंगानि यस्य सकलेंद्रिय-वृत्तिमंति ,
पश्यन्ति, पांति, कलयन्ति, चिरं जगन्ति,
आनंद-चिन्मय-सत्-उज्जवल विग्रहस्य;
गोविन्दम् आदि-पुरुषम, तम अहम् भजामि..
मैं वेदों का ज्ञानी तो नहीं हूँ. मगर गुरुदेव के उपदेशों से, वैष्णवों के सत्संग से और सज्जनों के चर्चा से कुछ कुछ मगजमारी कर बैठा हूँ. वैसे तो शास्त्रों में भगवान के स्वरुप का अनेक प्रकार से विस्तृत वर्णन है, मगर मैं यहाँ अपनी शक्ति के अनुसार मात्र इसी श्लोक पर चर्चा करूँगा. हो सकता है, मात्र इसी श्लोक को समझने में ही मेरी बुद्धि टें बोल जाए; मगर इतने प्रयास से भी मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा. सुधि जन और वैष्णव-ठाकुर-गण मेरी घृष्टता को क्षमा करें.
वैसे आज काफी कागज़ खर्च कर चुका (अबे! कागज नहीं, ये तो ब्लोग्पोस्ट है); अतः आज विदा. अगली बार यहीं से शुरू होंगे और इस श्लोक में भगवान के स्वरुप का जो दिग्दर्शन कराया गया है; उसपर क्षमतानुसार दिमाग की दही करेंगे. तब तक के लिए- जय श्री राम.
हरे कृष्ण.
गोविन्दम् आदि पुरुषम, तम अहम् भजामि.

गुरुवार, 18 मार्च 2010

Personized, Impersonized and the Form.-1.

मूर्त, अमूर्त और श्रीविग्रह. 

हरे कृष्ण.
मित्रों! पिछले दिनों जिस दुविधा में पड़ा था, वह असल में बुद्धि की बदमाशी ही थी. अन्यथा सत्य को क्या लेना देना साकार होने से, या निराकार होने से?!!
बुद्धि की एकमात्र शक्ति है विचार करने की, सो कर रही थी. और उसी विचार के प्रभाव से उसने मेरे साथ खिलवाड़ करने का प्रयास किया. मगर फिर बुद्धि पर श्रील गुरुदेव ने कृपा कर दी. वे स्वभावतः कृपामय हैं, सो जान गए की मेरे दोस्तों ने ही मेरे साथ खेल कर दिया है. उनकी कृपा का असर हुआ कि दोस्तों ने फिर से दोस्ती निभाई. जिस बुद्धि ने विभ्रम दिया था, उसी बुद्धि ने विवेक के साथ मिलकर रास्ता ढूंढ़ निकला.
मैं यहाँ अपने प्रश्न और उसके उत्तरों पर चर्चा करना उचित नहीं समझता. नीलेश भाई ने मदद करने की भरसक कोशिश की, मैं उनका शुक्र-गुज़ार हूँ. आपके विचार काफी मददगार साबित होते हैं. लगे रहो नीलेश भाई, संसार में समझदारों की बड़ी जरूरत है. खासकर आजकल, जब इंसान सिर्फ भौतिकता के पीछे लगा है, अपने अभौतिक अस्तित्व और उसकी आवश्यकताओं को भूल गया है.
खैर मूल मुद्दे पर आता हूँ.
दर्शन और फिलोसोफी में अंतर.
मैं जिस दर्शन और फिलोसोफी के चक्कर में पड़ा था, वो बड़ी बेकार चीज है. हा हा हा. (उतनी भी बेकार नहीं है, असल में मेरी ही औकात नहीं है. इसलिए- अंगूर खट्टे हैं.)
दर्शन भारतीय शब्द है, जिसका मतलब है- 'हाथ पर रखे हुए आंवले के सामान देखना'.
ठीक उलट फिलोसोफी लैटिन शब्द है, जिसका मतलब है- 'ज्ञान से प्रेम करना.'
शोर्ट-कट में बताऊँ तो भारतीय मनीषी चाहते हैं कि कर्म हो, उपासना हो, अथवा ज्ञान हो; सभी मात्र साधन ही हैं. हमें तो सत्य का साक्षात्कार ही करना हैं. नहीं तो पूजन, कर्म, जानकारियां; सब बेकार हैं. हमारा ज्ञान वह है, जिसे जानने के बाद हम उसे पा लेते हैं. मगर पश्चिम में विद्वान मात्र जानने के पीछे लगे रहते हैं. देखना और पाना शायद उनके बस की बात नहीं (तो ट्रक कि बात होगी.)
ये अंतर कुछ ऐसा है, कि सरदार संता सिंह को पता है कि एक पेड़ है. जिसका नाम आम का पेड़ है. उसमे बड़ी हरियाली होती है. उसका फल कच्चे में भी खट्टा-मीठा होता है. मगर पका हुआ आम बड़ा ही मीठा और स्वादिष्ट होता है.
सरदार बंता सिंह को भी ये सब पता है, मगर उसे एक ऐसी बात पता है जो संता सिंह को नहीं पता. कि ये पेड़ कहाँ है? बंता सिंह पेड़ तक पहुंचा, पेड़ पर चढ़ा और उसका मीठा स्वादिष्ट फल खाया. दूसरी ओर बंता सिंह आम के पेड़ की चर्चा करता रहा, सेमिनार में लेक्चर देता रहा. और फिर उसने आम पर एक ५०० पन्ने की पुस्तक भी लिख डाली, जिसके लिए उसे नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
कमोबेस ये पश्चिमी फिलोसोफर का हाल हम सब लोगों का हो गया है.
खैर, आगे जो लेक्चर मैं भांजने वाला हूँ, या जो चर्चा करने वाला हूँ (शायद जीवन भर में ५०० पन्ने तो लिख की डालूँगा. ही ही ही.); उसके लिए आप शंकराचार्य, मध्वाचार्य, बलदेव-विद्याभूषण, प्लेटो, अरस्तु, स्पिनोजा, जोन  लॉक , बर्कले इत्यादि को पढ़ सकते हैं- प्रेफेरेंस के लिए.
[अगर कोई बात भूल वश गलत लिख दूँ, तो कृपया मुझे क्षमा करेंगे. क्योंकि मैं उम्र, समझ और अनुभव में बहुत छोटा हूँ.]


मुर्तिमय संसार.
ये संसार दो प्रकार के पदार्थों से भरा पड़ा है- जड़ और चेतन. एक तीसरे प्रकार का पदार्थ भी है, जो दोनों से विलक्षण है- ईश्वर. फिर भी कुछ लोग अपनी समझ के अनुसार उसे भी चेतन ही मान के काम चलाते हैं. अभी चेतन पदार्थों पर चर्चा करना विषयांतर होगा- आगे देखेंगे. जड़ मय संसार मुर्तिमय पदार्थों से भरा पड़ा है. चाहे वे साकार हों, या निराकार. सब के सब मूर्त  हैं. मूर्त माने वस्तुगत सत्ता वाले. जैसे सपने में देखी गई हूर-परी, माने ड्रीम गर्ल का असल जीवन में कोई वस्तुगत अस्तित्व है या नहीं, ये बहस का विषय है. परन्तु आपकी धरमपत्नी की वस्तुगत सत्ता में आप कैसे यकीन नहीं करेंगे? [भागवान, जरा एक रोटी और लाना.]
नदी, पहाड़, हवा, पानी, दिल्ली, लन्दन, आप, मैं, धरती, आकाश; सभी मूर्त हैं. इसी कारण हम कभी कभी इन सब में इनका अपना-अपना व्यक्तित्व खोज लेते हैं. गंगा की अपनी कहानी है. हिमालय का अपना अतीत है. हवा की अपनी खुमारी है. पानी का अपना मिज़ाज है. दिल्ली की अपनी एक धड़कन है. लन्दन का अपना एक शबाब है. आपकी अलग, और मेरी अलग शख्सियत है. यह जो शख्सियत है, जो व्यक्तित्व है; वही मूर्त होने के लिए जिम्मेदार है.
मगर इन सब बातों में आपको ये नहीं लगता कि इन सब चीजों का व्यक्तित्व कही न कही हमारे अपने दिमाग का खेल है!?!
जी हाँ! बुद्धि के बल को कम मत मानिए. यहीं से तो चेतन पदार्थों कि दुनिया शुरू होती है.

मूर्ति मय संसार का अमुर्तिकरण.
असल में हम जो कुछ भी जान पाते हैं, सब अपनी बुद्धि की ही वजह से जान पाते हैं. हालाँकि चुनांचे इस काम में हमारी इन्द्रियां और आस पास की चीजें और लोग भी मदद करते हैं. मगर उनका महत्त्व सिर्फ प्रमाण की तरह ही है. उस प्रमाण का क्या और कैसा इस्तेमाल करना है, ये हमारी बुद्धि पर निर्भर करता है. प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और सत्-प्रत्यक्ष; ये चार तरह के प्रमाण लगभग सभी दार्शनिकों ने माने हैं. कुछ कम, कुछ ज्यादा. मगर इन प्रमाणों के द्वारा बुद्धि ही ज्ञान का निर्णय करती है. अतः हे बुद्धि, हे विमले, हे शारदे, हे विद्ये, हे अविद्ये; तुझे शत शत नमन.
बुद्धि इन्द्रिय आदि की मदद से जिन वस्तुओं का प्रत्यक्ष करती है; वे मूर्तिमान होते हैं. बुद्धि उन सब का अमुर्तिकरण कर डालती है. नतीजा! सभी चीजें, जड़-पदार्थ से बदल के विचार मात्र बन जाते हैं. हमने आँखों से सेब देखा. गोल गोल. लाल लाल. खाया. मीठा मीठा. पचाया. (पेट के लिए ठीक है). बुद्धि ने सेब का एक विचार (संस्कृत में इस विचार को प्रत्यय कहेंगे) बना लिया. हम इस विचार के रूप में ही सेब को जानते हैं. अन्यथा किसी मुर्तिमय रूप में हम सेब को नहीं जानते. 
यह विचार, या प्रत्यय दो तरह का होता है- विशेष और सामान्य. (महर्षि गौतम और कणाद की जय हो).
किसी एक या दो, या तीन, या फिर गिने जा सकने वाले संख्या में अगर हम चीजों का प्रत्यक्ष करेंगे तो हमें उनका विशेष ज्ञान ही प्राप्त हो पायेगा. सामान्य नहीं. सामान्य तो वह है जो किसी जाति विशेष के सभी वस्तुओं में विद्यमान हो. जैसे कोई मनुष्य काला है, कोई गोरा है, कोई नाटा है , कोई लम्बा है, कोई संत है, कोई पापी है. मगर काला, गोरा, नाटा, लम्बा, संत, पापी; ये सब तो विशेष बातें हो गयी. मनुष्यत्व एक ऐसी चीज है, जो सभी मनुष्यों में होती है. जिसके कारण कोई मनुष्य, मनुष्य होता है. सामान्य का विचार भी हमारे बुद्धि में है. सिर्फ विशेष ही हो, ऐसी बात नहीं है. हाँ! मगर सामान्य का ज्ञान प्रत्यक्ष द्वारा संभव नहीं है. क्योंकि मनुष्यत्व को जानने के लिए संसार के तीनो कालों के सभी मानुषों का प्रत्यक्ष करना ही संभव नहीं है. कुछ लोग तो मर चुके हैं, कुछ जन्मे ही नहीं है. और कुछ लोग अफ्रीका के घने जंगलों में रहते हैं; जहाँ जाते जाते कहीं हम ही न मर जाए. (भगवान बचाए! अभी तो आपने लम्बी उम्र जीना है. बहुत सालों तक हमारे दिमाग की दही करनी है.)
तो जी बात ये है कि मुर्तिमय पदार्थों का प्रत्यक्ष से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वह विशेष ही होता है; सामान्य नहीं. उसके लिए तो अनुमान और शब्द प्रमाण पर भरोसा करना पड़ता है. और सचमुच ये दोनों काफी कारगर भी होते हैं. शब्द प्रमाण तो वैसे भी काफी शक्तिशाली माना गया है.
अतः हमारी बुद्धि मुर्तिमय पदार्थों को अमुर्तिमय बनती है. यह अमुर्तिकरण कि शक्ति हमारी बुद्धि में ही है. और कही नहीं. क्या आप किसी साकार टेबल को निराकार बना सकते हैं, बगैर बुद्धि के; और तब भी उसका अस्तित्व बना रहे?
बुद्धि में विचार या प्रत्यय के रूप में वस्तु का अस्तित्व बना रहता है. मगर यह सत्ता वस्तुगत न हो कर आत्मगत/बुद्धिगत  होती है. और इस अमुर्तिकरण की प्रक्रिया में बुद्धि का वस्तु से जो समबन्ध बनता है, वही उस वस्तु के व्यक्तिकरण का जिम्मेदार है. क्योंकि मूर्त को अमूर्त करने के लिए पहले मूर्ति-तत्व को वस्तु के अस्तित्व से अलग जानना जरूरी है. 

मेरी समस्या से इन सब बातों का लेना-और देना.
असल में मुझे तो न उधो का लेना है, न माधो को देना है. मगर मेरी समस्या श्री भगवान के स्वरुप से सम्बंधित थी. यद्यपि यह कहा नहीं जा सकता की ईश्वर जड़ है या चेतन है! तथापि लोगों ने अपनी अपनी तरह से उसे किसी न किसी प्रकार के पदार्थ की श्रेणी में जरूर रखा है. यहाँ उन सब का विवेचन करना सर-दर्द से कम नहीं है. मगर मैं अपने विचार (हैं!) जरूर बताना चाहूँगा.
मेरे विचार से ईश्वर चेतन भी है, जड़ भी है और इन दोनों से अलग एक विलक्षण तीसरी वस्तु है. 
ईश्वर के पक्ष या विपक्ष में, आस्तिक या नास्तिक कोई न कोई विचार या संकल्प या निर्णय या बोध हमारी बुद्धि में अवश्य रहता है. पाश्चात्य दार्शनिक इसे ईश्वर का सहज प्रत्यय कहते हैं. यानी by-birth-idea. इसी कारण ईश्वर का आत्मगत / बुद्धिगत अस्तित्व तो मानना ही पड़ेगा. ईश्वर का यह अस्तित्व चेतन जगत में है. अतः ईश्वर एक चेतन पदार्थ है.
पुनः  जितने भी लोग ईश्वर को मानते हैं, उन्हें ईश्वर के वस्तुगत अस्तित्व में विश्वास है. जैसे आकाश प्रत्यक्षतः निराकार है, असीम है; फिर भी उसका वस्तुगत अस्तित्व तो है. परमाणु सूक्ष्म है, अज्ञेय है, अप्रत्यक्ष है; फिर भी उसकी वस्तुगत सत्ता है. अर्थे, वह मूर्तिमान जड़-द्रव्य है. इसी प्रकार ईश्वर की सत्ता जड़-जगत में भी सिद्ध होती है. {लगता है कुछ लोगों की त्योरियां चढ़ गयी है. "प्रिय रंजन, यहाँ मिल गए हो. कहीं और मत मिलना. वर्ना...."}
              ये दोनों बातें सत्य हैं. मगर फिर भी मेरे लिए ईश्वर न तो जड़ है, न चेतन. वह तो विलक्षण ही है. जड़ तत्व का सर्वश्रेष्ठ  उदाहरण है - संसार. और चेतन तत्व का उदाहरण है- आत्मा. सच में ईश्वर मूर्तिमान स्वरुप में विराट-जगद-पुरुष है. सच में ईश्वर अमूर्त स्वरुप में परम-जगद-आत्मा है. मगर यह भी सच है की ईश्वर मूर्त-अमूर्त, व्यक्त-अव्यक्त, दोनों से भी परे सच्चिदानंद है.
आज हमने मूर्त और अमूर्त, व्यक्त और अव्यक्त दो प्रकार के ज्ञान और तत्संबंधी पदार्थ के दो प्रकारों तथा ईश्वर के दो स्वरूपों की चर्चा की है. अभी वक़्त कम है, सो मित्रों नींद-मारने जाता हूँ. कल उठ कर ऑफिस भी जाना है. अभी तीसरे ज्ञान की चर्चा बाद में करेंगे; जो व्यक्त और अव्यक्त के बाद की बात है :- स्वरुप. 
तब तक के लिए-
हरे कृष्ण.
गोविन्दम्, आदि-पुरुषम, तम-अहम् भजामि.