गुरुवार, 25 मार्च 2010

Shri Vigrah

मूर्त, अमूर्त और श्री विग्रह- ३.
हरे कृष्ण.
दंडवत प्रणाम.
मित्रों, पिछले ब्लॉग पर प्रमाण की चर्चा में कुछ ज्यादा ही समय गवां दिया. आज सीधे मुख्य बात पर आते हैं-
[यद्यपि मैं अपनी चलती फिरती भाषा का ही प्रयोग करूँगा, क्योंकि अन्य कोई भाषा मुझे आती नहीं है. अगर कोई त्रुटी हो जाए तो भक्तजन क्षमा करेंगे.]
भगवान का स्वरुप:-
श्री ब्रह्मा जी ने ब्रह्म-संहिता में भगवान के स्वरुप की चर्चा करते हुए कहा है-
अंगानि यस्य सकलेंद्रिय-वृत्तिमंति 
पश्यन्ति पांति कलयन्ति चिरं जगन्ति.
आनंद-चिन्मय-सदुज्ज्वल-विग्रहस्य 
गोविन्दमादिपुरुषम तमहं भजामि..(३२)
उन आदि-पुरुष श्री गोविन्द का मैं भजन करता हूँ, जिनका श्री विग्रह - आनंदमय, चिन्मय और सत्-मय होने के कारण परम उज्जवल है; जिस श्रीविग्रह के सारे अंग (अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय) समस्त इन्द्रियों की सारी वृत्तियों से संपन्न हैं और जो चिद-अचिद अनंत जगत्समूह का नित्य दर्शन, पालन और नियमन करते हैं.
परम-अंगी
भगवान के सारे अंग समस्त इन्द्रियों की सभी वृत्तियों से संपन्न हैं. हमारी इन्द्रियों में ऐसी बात नहीं होती. हम आँखों से रूप-रंग आदि देख सकते हैं, जिह्वा से षड रसों का अस्वादन कर सकते हैं, नाक से सुगंध ले सकते हैं, त्वचा से छू सकते हैं, कानो से सुन सकते हैं. हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ अपनी अपनी विषय-वस्तुओं से बंधी हुई है. हम आँखों से स्वाद नहीं ले सकते. इसी तरह अन्य इन्द्रियों से किसी अन्य इन्द्रिय के विषय का भोग संभव नहीं है.
कोई कहे कि अगर हम अपनी पसंदीदा मिठाई देखें तो हम उसका स्वाद देखने मात्र से ही महसूस कर सकते हैं. अतः इन्द्रियों को तत-सम्बन्धी विषयों से बंधा मानना गलत है. मगर यहाँ हम एक छोटी सी भूल करेंगे. आँखे मिठाई को देख के मात्र उसके स्वाद का स्मरण ही दिलाती है. यहाँ हमारी बुद्धि प्रत्यक्ष से रूप का ज्ञान प्राप्त कर के अनुमान द्वारा स्वाद का ज्ञान प्राप्त करती है. फिर आखिर में उस स्वाद कि प्राप्ति जिह्वा को ही होती है. स्वादिष्ट मिठाई देख के आँखों में नहीं, मुंह में पानी आता है.
यहाँ हमें मन और बुद्धि के अनुदान पर अवश्य ध्यान देना चाहिए. असल में मन ही सभी प्रकार के इन्द्रियों और बुद्धि के बीच सेतु का काम करता है. बुद्धि में ही पहले से चखे गए मिठाई का प्रत्यय मौजूद रहता है. हमारा मन आँखों से प्राप्त मिठाई के रूप को बुद्धि के प्रत्यय से मेल करता है. यह विकल्प उत्पन करना ही मन का काम है. फिर जब बुद्धि उसे बताती है कि यह तो वही परिचित मिठाई है, तो फिर मन ही उसके स्वाद को पाने का संकल्प करता है और जिह्वा उस पुराने स्वाद का बुद्धि कि सहायता से रसास्वादन करती है. इसी लिए कहा गया है कि सभी विषय असल में मन से ही बंधे हैं. {अगर आपका मन सचिन तेंदुलकर के ९९ के स्कोर पर है, तो आपके सामने आपकी पसंदीदा मिठाई भी परोसी जाए, तो भी आप उसके स्वाद पर ध्यान नहीं देंगे. कहेंगे क्या?}
मगर श्री भगवान के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है. वे बाह्य रूप से कहीं भी लगे हों, वे आवश्यक विषयों का अस्वादन कर सकते हैं; बगैर तत-सम्बन्धी इन्द्रिय और मन को उस विषय से जोड़े.
एक छोटा सा उदाहरण देता हूँ- भगवान शेष-सैया पर टाँगें पसरे सो रहे हैं, लक्ष्मी जी चरण दबा रही हैं, भक्त जन दर्शन पा रहे हैं, मुनि जन मंगल गा रहे हैं. इसी बीच किसी भक्त ने अपने घर में ही बैठे बैठे श्री भगवान को लड्डू का भोग लगाया. लक्ष्मी जी ने प्रभु से कहा- " स्वामिन! क्या भोग के लिए प्रसाद प्रस्तुत किया जाए?"
नारायण ने कहा- " देवी! अभी पेट भरा है. मैंने अभी अभी एक थाली भर कर लड्डू खाया है."
(साइकिल की घंटी बजाने वाले लोगों से मुझे कुछ नहीं कहना है. छंद-अलंकार के पुस्तक की कौन सी उपमा और कौन  सी अतिशयोक्ति मैंने लगाई है, यह भी विषयांतर की ही बात है. अतः अस्तु! )
देखिये, भगवान को उस भक्त के सामने प्रकट होने की कोई जरूरत नहीं. उसके लड्डुओं को हाथों से उठा के, मुंह में रख के, दांतों से चबा के, जिह्वा से स्वाद ले के, आहार नाल के द्वारा उदरस्थ करने की भी जरूरत नहीं है. फिर भी उन्होंने उन लड्डुओं को पूरा का पूरा भोग लगाया है. यद्यपि वे लड्डू अब भी जैसे के तैसे उस भक्त की थाली में पड़े मिलेंगे; फिर भी भगवान ने उनका स्वाद ले लिया.
इसी लिए गोस्वामी जी ने लिखा है-
"आनन रहित सकल रस भोगी! बिनु बानी बकता बड़ जोगी!!"
भगवान ऐसी युक्ति लगा लेने वाले योगी हैं जो बिना मुख के ही सकल रसों का अस्वादन कर लेते हैं, बिना कंठादी का प्रयोग किये ही अपने भक्तों तक अपनी बात पहुंचा देते हैं.
असल में भगवान आँखों से स्वाद ले सकते हैं, मन से गमन कर सकते हैं,  आकाश (जो कि उनके कान हैं) से बोल सकते हैं. वे किसी भी एक ही इन्द्रिय से बाकी सभी इन्द्रियों का भी काम कर सकते हैं.
वेदों ने भी कहा है- "सर्वतः पाणि पादम तत सर्वतो अक्षि-शिरो-मुखं - - " .
इसी कारण ब्रह्माजी ने भी श्रीनाथ जी के बारे में निर्णय दिया कि-
अंगानि यस्य सकल-इन्द्रिय-वृत्तिमंति..
जगादाधिपति
श्री भगवान समस्त जगती के अधिपति हैं. यद्यपि इस संसार को प्रत्यक्ष रीती से शासित करने की उनको कोई आवश्यकता नहीं है. उनके सम्पूर्ण अंग समस्त रूप से स्थिर रहते हुए भी उनके सभी कार्य सुचारू रूप से पूरा कर सकते हैं. वे सदा अपने चिंतामणि-धाम वैकुण्ठ में अपने भक्तो के साथ आनंद-विनोद करते रहते हैं, फिर भी सदा सर्वदा, एक भी क्षण भूले बगैर अनंत-कोटि ब्रह्माण्ड के लोकों, जीवों और भक्तजनों को देखते रहते हैं, उनका पालन करते रहते हैं और उनका सही रीती से नियमन करते रहते हैं. ऐसा वे चिर काल से करते आ रहे हैं. और आज तक थके नहीं हैं, नाही अपने कर्तव्य से कभी डिगे हैं. अगर वे एक पल को भी अपने कार्य से हट जाए, तो ये पूरा कारोबार - जो जगत-जंजाल के रूप में दृष्टिगोचर होता है;  नष्ट हो कर तिनके की तरह बिखर जाएगा. इसीलिए तो ब्रह्माजी ने कहा है:-
 पश्यन्ति पांति कलयन्ति, चिरं जगन्ति.

सच्चिदानंद 
भगवान सत्-चित-आनंदमय हैं. वे सुख-दुःख से परे हैं. वे तो नित्य-ज्ञान से किसी प्रकार जीवों में उत्पन्न हो सकने वाले द्रष्टा-भावी आनंद से संपन्न हैं. उन्हें किसी अनुकूल की प्राप्ति में सुख नहीं होता, किसी प्रतिकूल के होने से दुःख भी नहीं होता. असल में उनको न तो कोई आशा है, न ही कोई इच्छा. अतः उनके लिए कुछ भी अनुकूल या प्रतिकूल नहीं है. इसी कारण सुख-दुःख भी नहीं है. वे तो अपने भक्त जनों के मधुर लीलाओं को देख देख के आनंद की प्राप्ति करते रहते हैं. उनके भक्त भी इसी प्रकार उनके सुन्दर लीलाओं से आनंद को पाते हैं, और सुख-दुःख से ऊपर उठ जाते हैं.
भगवान त्रिगुणातीत हैं. प्रकृति के तीन गुण हैं- सत्य, रजः और तमः. सत्य से ज्ञान की, रजः से गति की, और तमः से जड़ता की प्राप्ति होती है. मगर भगवान को तो तीनो में से किसी की प्राप्ति नहीं करनी है. बहिरंगा प्रकृति इन्ही तीनों गुणों के द्वारा  इस असत संसार को हमारे सामने सत्य बतलाते हुए प्रकट करती है. (यहाँ मेरे द्वारा इस्तेमाल सत् शब्द प्रकृति के तीन गुणों में प्रथम सत्  से अलग है. यह शब्द सत्ता, या होने के बारे में है. सत्ता से मेरा मतलब है- To be, To exist.) मगर असलियत तो यह है कि सिर्फ भगवान की ही सत्ता है, वही एक मात्र सत् हैं. [अगर आप ज्ञान के मार्ग से जाना चाहें, तो ये मान सकते हैं कि भगवान सम्पूर्ण सतोमय हैं. वे गतिमय राजस और जड़तामय तामस प्रकृति से अलग हैं]
पुनः भगवान चूँकि जड़ता से भिन्न हैं, और इसके आगे हम अपनी भाषा में और कोई निर्णय नहीं दे सकते, अतः वे चित हैं.
यद्यपि हमारा पूर्व-स्थापित सिद्धांत उन्हें जड़ और चेतन दोनों से परे मानता है, तथापि हम मात्र चेतन के द्वारा ही उन्हें जान सकते हैं.
यहाँ पर सत् और चेतन से सम्बन्धी सिद्धांत में अन्यथा-दोष पाया जा सकता है. मगर ऐसा सोचना भूल होगी. भाषा के कमजोरी के कारण ही ऐसा प्रतीत होता है कि पहले त्रिगुनातित कह के फिर सत् कहना, और जड़-चेतन से परे कह के फिर चित मानना बेवकूफी है. असल में प्रकृति के तीन गुणों का नामकरण ही इस प्रकार हुआ है. तामस वह गुण है, जो हमें अन्धकार और अज्ञान (तम) कि स्थिति में ले जाता है. राजस वह है जो गतिमय, कर्ममय और बीजमय (रज) बनाता है. और सत्व वह है जो प्रकाशमय, ज्ञानमय और समझदार बनाता है ताकि हम जाने कि जो जगत है, उसकी सत्ता नहीं है. सत्ता तो एकमात्र ईश्वर की ही है. अर्थात प्रकृति का सत् हमें त्रिगुनातित सत् (असली सत्ता) की ओर प्रेरित करता है, इसी कारण (दिल्ली जाने वाला मार्ग "दिल्ली-रोड" ऐसा जाना जाता है) सत्व, ऐसा नाम उस गुण का दिया गया है. 
पुनः हमारा जगत और शरीर जड़-चेतन मय है. शरीर में जड़ता है, मगर मन-बुद्धि आदि में चेतनता मालूम देती है. इस चेतनता का मूल कारण तो वेद-प्रसिद्द आत्म-तत्व है. आत्मा असल में भगवान का ही अंश है- मामैवंशो जीव . असल में पूर्ण चैतन्य तत्व तो श्री भगवान ही हैं. इस जड़-चेतन मय संसार में जिसे चेतन कह के पुकारा गया है, वह घटाकाश, या दर्पण-प्रतिबिंबित-सूर्य की ही भांति उस चेतन की छाया मात्र है. इसी कारण संसार के जिस वस्तु की व्याख्या जड़ के द्वारा संभव नहीं है; उसे चेतन कह कर पुकारने की परिपाटी चल पड़ी है.
इसी कारण उन भगवान को आनंदमय, चिन्मय और सत्वमय कहा गया है. उन सच्चिदानंद प्रभु का यह दिव्य-वर्णनातीत स्वरुप परम-उज्जवल है. उज्जवल से यहाँ मतलब है प्रकाशमय. उज्जवल से इन्द्रिय-विषय-रूपी सफ़ेद रंग के भ्रम में परने की जरूरत नहीं है. प्रकाशमय भी कहना गलत ही होगा. चूँकि वे ऐसे ही सच्चिदानन्दमय श्री-विग्रह के रूप में भक्तों के सामने प्रकाशित होते हैं; इसी कारण प्रकाशित, प्रकाशमय या उज्जवल कहा है.
और इसी कारण ब्रह्माजी ने कहा है कि:-
आनंद-चिन्मय सत्-उज्जवल विग्रहस्य
गोविन्दमादिपुरुषम तं अहम् भजामि..

शेष फिर, तब तक के लिए
राम-नवमी की शुभकामनाओं सहित.
जय श्री राम.
गोविन्दम् आदिपुरुषम तं अहम् भजामि. 

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