मूर्त, अमूर्त और विग्रह.- २.
हरे कृष्ण, मित्रों ! दंडवत प्रणाम.पिछले ब्लॉग पर हमने देखा कि किस प्रकार हमारी बुद्धि बाह्य-जगत में उपस्थित मूर्त पदार्थों का अमुर्तिकरण कर के उनका चेतन जगत के प्रत्ययों से सामंजस्य बिठाती है. ज्ञान प्राप्त करने का यही तरीका है.
ईश्वर के बारे में भी हम इसी प्रकार जान पाते हैं.
हम जो प्राकृतिक शक्तियों में ईश्वर को ढूंढते हैं, वह असल में इसी अमुर्तिकरण के स्वभाव के कारण होता है. हम अपने चारों तरफ जगत-विराट-पुरुष को रोज ही देखते हैं. [नास्तिकों को जाने दीजिये, वे बेचारे तो साक्षात् श्री भगवान को हमारी आपकी तरह सामने देखले, और खुद साइकिल पर हों, तो घंटी बजाते हुए बोले- "अबे! सामने से हट. मरना है क्या?"] इतना ही नहीं, उन्हें स्वयं अपने शरीर में, अपने आस पास के लोगों में, जीवों में, पेड़-पौधों में, नदी-पहाड़ों में; हर जगह महसूस करते हैं. फिर जब हम अपने विचारों का इस्तेमाल करते हैं, तब हमें एकदम से पता चलता है कि न तो हम शरीर हैं; न ही चारो तरफ ये सब जंजाल है. हम सब आत्माएं (सॉरी! वेदान्तिक रूप से एक अद्वैत आत्मा) हैं. फिर तो ईश्वर भी आत्म-स्वरुप हो जाता है. एक मात्र परमात्मा, जो संसार की सभी वस्तुओं का प्रत्ययात्मक मूल स्वरुप है.
मगर यह सब तो सामान्य समझ ही है. क्योंकि जिस चीज को असल आत्मा कहते हैं, वह सामान्य समझ से भी विलक्षण वस्तू है. कैसे मान ले की सत्य वस्तु जागतिक या वैचारिक सीमाओं में बंध सकती है? वह अवश्य ही परे है. तुरीय है.
अब चूँकि परे है, तुरीय है; तो फिर वह हमारी ऐन्द्रिक प्रत्यक्षों तथा मानसिक विचार-अनुमानों से अलग हो जाती है. हम न तो उसे अपनी इन्द्रियों के प्रत्यक्ष कर के जड़ घोषित कर सकते हैं; न ही अपनी बुद्धि द्वारा अनुमानित कर के चेतन-मात्र साबित कर सकते हैं. [मुझे पता है कि बहुत से लोग होंगे जो मुझसे बहस करना चाहेंगे; सत्य को जड़ अथवा चेतन सिद्ध करने के लिए. मगर मैं बहस में थोडा कच्चा हूँ. इसलिए क्षमा. मैं अपनी बात कहूँगा और चलता बनूँगा.]
प्रमाण.
ऐसी ही अवस्था में प्रमाण-वाद का निर्णय करना पड़ता है. जब व्यक्ति यह तय नहीं कर पाता कि इन्द्रियों तथा बुद्धि में से कौन बेहतर ज्ञान दे सकता है.मैं वैदिक परंपरा में स्थापित प्रमाण वाद का यहाँ जिक्र करना चाहूँगा.
वेदों में चार प्रकार के प्रमाण माने गए हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और उपमान(सत्-प्रत्यक्ष).
१. प्रत्यक्ष- हम अपनी इन्द्रियों का जड़ जगत से संपर्क कर के जो ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह प्रत्यक्ष कहलाता है. अगर प्रत्यक्ष द्वारा ही हमें सच्चे ज्ञान कि प्राप्ति हो जाये, तो फिर अन्य किसी भी प्रमाण कि जरूरत ही नहीं रह जाती है. इसी से कहा है- प्रत्यक्षे किम प्रमाणं.
२.. अनुमान- अगर प्रत्यक्ष से काम न बने, तो हमारी बुद्धि स्वयं स्मृत-कल्पना-संकल्प आदि अनुमानों द्वारा सत्य का निर्णय करने का प्रयास करती है. जैसे अगर सामने रस्सी रखी हो, और हमें सर्प नजर आए, तो बुद्धि यह निर्णय देती है कि अरे यह सर्प तो चल नहीं रहा, फन नहीं फैला रहा; देखो तो जीवित है कि नहीं. हम हिम्मत कर के आगे बढ़ते हैं. बुद्धि कहती है- अरेरे, ये तो रस्सी है. बेकार में डर गए.
मगर हमने अभी देखा कि वास्तविक सत्य-ज्ञान में प्रत्यक्ष और अनुमान किसी काम के नहीं है. ऐसी ही स्थिति के लिए मनीषियों ने तीसरे प्रमाण कि स्थापना की है.
३. शब्द - संसार में बहुत से लोग हो गए हैं, जिन्होंने भगवान कि कृपा से सत्य-चित-आनंद प्रभु का साक्षात्कार किया है. यद्यपि वह अवर्णनीय है, फिर भी उन्होंने हम जैसे मुर्ख लोगों के भले के लिए चलती-फिरती भाषा में ही सही, सत्य को वर्णनीय बनाने का प्रयास किया है. भारतीय परंपरा में ऐसे लोगों को आप्त-पुरुष कहते हैं. आज-कल कि भाषा में पारंपरिक-विद्वान; जिसे असली विद्या मिल गयी है. कुछ लोग ऐसे भी हो गए हैं, जिनको सामान्य भाषा में भगवान का वर्णन दोष-पूर्ण लगा; तो भगवान ने कृपा करके उनकी भाषा को इतना शक्तिशाली बना दिया कि वे सही-सही वर्णन कर सके. या यूँ कहिये कि उन पुरुषों के मुख से स्वयं भगवान ने ही सत्य का निर्णय किया. इन दुसरे प्रकार के लोगों को ऋषि कहते हैं.
ऋषियों ने जो उपदेश दिए, वही वेद के नाम से मशहूर हैं. वेद स्वयं भगवान की रचना है, इसलिए अपौरुषेय है, अकाट्य है, सत्य है और स्वतः प्रमाणित है. अन्य विद्वानों ने जो उपदेश दिए, वे शास्त्र के नाम से जाने जाते हैं. ये सारे उपदेश आज भी ग्रन्थ, पुस्तक आदि के रूप में हमारे बीच मौजूद हैं. इन्हें ही समग्र रूप से शब्द प्रमाण कहा जाता है. शब्द प्रमाण सर्व-श्रेष्ठ है, अन्यतम है, क्योंकि यह अनुभूत वाक्य है. मगर इसके साथ भी एक समस्या है. कौन से व्यक्ति के शब्द प्रमाण माने जाए, यह एक बड़ी समस्या है. कैसे निर्णय हो कि वह सत्य ही कर रहा है? और कैसे निर्णय हो कि वह मेरे हित के लिए ऐसा कह रहा है. कहीं वह ठग तो नहीं, जो अपना उल्लू मेरे डंडे से सीधा करना चाहता है.
यही पर वेद हमारा सहायक होता है. चूँकि वेद स्वयं ईश्वर के उपदेश हैं, अतः उनके बारे में कोई शंका ही नहीं हो सकती. फिर हम उन लोगों के शब्दों पर भी ध्यान दे सकते हैं, जो वेदों के रीती के अनुसार अपना निर्णय देते हैं; न कि मनमाने ढंग से तथा वैदिक पद्धति से परे होकर. ऐसे लोग तो मुख्यतया नास्तिकवाद की ही स्थापना करते हैं. असल में सत्य वस्तु- ईश्वर से उन्हें कोई लेना देना नहीं होता है. वे बस इतना ही जानकर खुश हो जाते हैं कि जड़ क्या है, चेतन क्या है; और कौन सी बातें हैं, जिनका उपदेश करने से चेलों की संख्या बढती है?!!? :)
[इसीलिए प्रमाणिक गुरु की शरण लेना आवश्यक है. क्योंकि एकमात्र वही हैं, जो हमें वैदिक रीती से सच्ची शिक्षा देते हैं, और अन्य प्रमाणिक आप्त-पुरुषों के शास्त्रों से परिचित करते हैं.]
४. उपमान - यह अंतिम प्रमाण है. कुछ विद्वानों ने इसे प्रत्यक्ष के ही अंतर्गत मन है, मगर मेरी समझ से (भूल-चुक-लेनी-देनी) उपमान ही श्रेष्ठतम प्रमाण है. या फिर यूँ कहें कि यह प्रमाण नहीं है; बल्कि सत्य का साक्षात्कार है. जी हाँ! असल में जब हम प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द आदि प्रमाणों द्वारा सत्य के बारे में जान लेते हैं {के बारे में, न कि स्वयं उसे ही-} तब हमारी ऐसी चेष्टा होती है, कि हम स्वयं उस सत्य को ही जाने. तब उस सत्य के प्रकट होने पर हम उसे पहचान लेते हैं (साइकिल कि घंटी नहीं बजाते); कि यही सत्य है. इसी को उपमान कहा जाता है.
इसे एक उदाहरण से समझते हैं- राम और स्याम दो मित्र थे, राम ने नीलगाय देखी थी; मगर स्याम को पता नहीं था कि नीलगाय क्या चीज है. अतः उसने राम से पूछा कि नीलगाय क्या है? राम ने कहा- नीलगाय एक जंगली पशु है, जो देखने में गाय की ही तरह लगती है. यह तो शब्द से प्राप्त ज्ञान हुआ. यानी स्याम ने नीलगाय के बारे में जान लिया. फिर एक दिन स्याम जंगल में गया. वहां उसे एक जानवर मिला जो गाय की तरह था. स्याम ने जाना कि यही नीलगाय है. इसतरह उपमान द्वारा स्याम ने नीलगाय का सत्य-ज्ञान प्राप्त किया. असल में पहले संता-बंता की जो कहानी कही थी, वह उपमान का ही उदाहरण है. यही थोथे फिलोसोफेर और सत्य-दार्शनिक के बीच का अंतर है. मगर यहाँ एक चीज महत्वपूर्ण है, की उपमान से पूर्व अन्य प्रमाणों द्वारा सत्य की व्यावहारिक जानकारी लेना आवश्यक है. अगर स्याम ने राम से नीलगाय के बारे में शब्द-ज्ञान नहीं लिया होता तो वह नीलगाय को भी गाय ही समझ लेता. यह तो साइकिल की घंटी बज जाती. :)
अतः पहले के तीनो प्रमाणों का भी महत्त्व है.
मगर चूँकि उपमान असल में साक्षात्कार का नाम है, तो चलिए; हम भी इसे प्रमाण की श्रेणी से हटा देते हैं और शब्द को ही महत्तम प्रमाण मन लेते हैं.
शब्द प्रमाण के आधार पर ईश्वर का स्वरुप:
मैं शब्द प्रमाण का ही प्रयोग करूँगा; क्योंकि स्वयं मुझे प्रत्यक्ष से सत्य नहीं मिल पाया और मेरी बुद्धि ने तो कुछ दिनों पहले तक मेरे साथ खेल ही किया है. इसलिए मैं स्वयं तो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ. इसलिए मुझे क्षमा करे, और वैदिक शास्त्रों के शब्दों पर ध्यान दे.जब ईश्वर ने ब्रह्माण्ड के पहले ऋषि- चतुर्मुख ब्रह्मा को वेद प्रदान किया, तब उन्होंने ईश्वर की स्तुति की. संस्कृत भाषा में वह स्तुति ब्रह्म-संहिता के नाम से प्राप्त होती है. उसी ब्रह्म-संहिता के पांचवे अध्याय में एक श्लोक में ब्रह्माजी ने भगवान का स्वरुप बतलाते हुए कहा है-
अंगानि यस्य सकलेंद्रिय-वृत्तिमंति ,
पश्यन्ति, पांति, कलयन्ति, चिरं जगन्ति,
आनंद-चिन्मय-सत्-उज्जवल विग्रहस्य;
गोविन्दम् आदि-पुरुषम, तम अहम् भजामि..
मैं वेदों का ज्ञानी तो नहीं हूँ. मगर गुरुदेव के उपदेशों से, वैष्णवों के सत्संग से और सज्जनों के चर्चा से कुछ कुछ मगजमारी कर बैठा हूँ. वैसे तो शास्त्रों में भगवान के स्वरुप का अनेक प्रकार से विस्तृत वर्णन है, मगर मैं यहाँ अपनी शक्ति के अनुसार मात्र इसी श्लोक पर चर्चा करूँगा. हो सकता है, मात्र इसी श्लोक को समझने में ही मेरी बुद्धि टें बोल जाए; मगर इतने प्रयास से भी मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा. सुधि जन और वैष्णव-ठाकुर-गण मेरी घृष्टता को क्षमा करें.
वैसे आज काफी कागज़ खर्च कर चुका (अबे! कागज नहीं, ये तो ब्लोग्पोस्ट है); अतः आज विदा. अगली बार यहीं से शुरू होंगे और इस श्लोक में भगवान के स्वरुप का जो दिग्दर्शन कराया गया है; उसपर क्षमतानुसार दिमाग की दही करेंगे. तब तक के लिए- जय श्री राम.
हरे कृष्ण.
गोविन्दम् आदि पुरुषम, तम अहम् भजामि.
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