गुरुवार, 18 मार्च 2010

Personized, Impersonized and the Form.-1.

मूर्त, अमूर्त और श्रीविग्रह. 

हरे कृष्ण.
मित्रों! पिछले दिनों जिस दुविधा में पड़ा था, वह असल में बुद्धि की बदमाशी ही थी. अन्यथा सत्य को क्या लेना देना साकार होने से, या निराकार होने से?!!
बुद्धि की एकमात्र शक्ति है विचार करने की, सो कर रही थी. और उसी विचार के प्रभाव से उसने मेरे साथ खिलवाड़ करने का प्रयास किया. मगर फिर बुद्धि पर श्रील गुरुदेव ने कृपा कर दी. वे स्वभावतः कृपामय हैं, सो जान गए की मेरे दोस्तों ने ही मेरे साथ खेल कर दिया है. उनकी कृपा का असर हुआ कि दोस्तों ने फिर से दोस्ती निभाई. जिस बुद्धि ने विभ्रम दिया था, उसी बुद्धि ने विवेक के साथ मिलकर रास्ता ढूंढ़ निकला.
मैं यहाँ अपने प्रश्न और उसके उत्तरों पर चर्चा करना उचित नहीं समझता. नीलेश भाई ने मदद करने की भरसक कोशिश की, मैं उनका शुक्र-गुज़ार हूँ. आपके विचार काफी मददगार साबित होते हैं. लगे रहो नीलेश भाई, संसार में समझदारों की बड़ी जरूरत है. खासकर आजकल, जब इंसान सिर्फ भौतिकता के पीछे लगा है, अपने अभौतिक अस्तित्व और उसकी आवश्यकताओं को भूल गया है.
खैर मूल मुद्दे पर आता हूँ.
दर्शन और फिलोसोफी में अंतर.
मैं जिस दर्शन और फिलोसोफी के चक्कर में पड़ा था, वो बड़ी बेकार चीज है. हा हा हा. (उतनी भी बेकार नहीं है, असल में मेरी ही औकात नहीं है. इसलिए- अंगूर खट्टे हैं.)
दर्शन भारतीय शब्द है, जिसका मतलब है- 'हाथ पर रखे हुए आंवले के सामान देखना'.
ठीक उलट फिलोसोफी लैटिन शब्द है, जिसका मतलब है- 'ज्ञान से प्रेम करना.'
शोर्ट-कट में बताऊँ तो भारतीय मनीषी चाहते हैं कि कर्म हो, उपासना हो, अथवा ज्ञान हो; सभी मात्र साधन ही हैं. हमें तो सत्य का साक्षात्कार ही करना हैं. नहीं तो पूजन, कर्म, जानकारियां; सब बेकार हैं. हमारा ज्ञान वह है, जिसे जानने के बाद हम उसे पा लेते हैं. मगर पश्चिम में विद्वान मात्र जानने के पीछे लगे रहते हैं. देखना और पाना शायद उनके बस की बात नहीं (तो ट्रक कि बात होगी.)
ये अंतर कुछ ऐसा है, कि सरदार संता सिंह को पता है कि एक पेड़ है. जिसका नाम आम का पेड़ है. उसमे बड़ी हरियाली होती है. उसका फल कच्चे में भी खट्टा-मीठा होता है. मगर पका हुआ आम बड़ा ही मीठा और स्वादिष्ट होता है.
सरदार बंता सिंह को भी ये सब पता है, मगर उसे एक ऐसी बात पता है जो संता सिंह को नहीं पता. कि ये पेड़ कहाँ है? बंता सिंह पेड़ तक पहुंचा, पेड़ पर चढ़ा और उसका मीठा स्वादिष्ट फल खाया. दूसरी ओर बंता सिंह आम के पेड़ की चर्चा करता रहा, सेमिनार में लेक्चर देता रहा. और फिर उसने आम पर एक ५०० पन्ने की पुस्तक भी लिख डाली, जिसके लिए उसे नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
कमोबेस ये पश्चिमी फिलोसोफर का हाल हम सब लोगों का हो गया है.
खैर, आगे जो लेक्चर मैं भांजने वाला हूँ, या जो चर्चा करने वाला हूँ (शायद जीवन भर में ५०० पन्ने तो लिख की डालूँगा. ही ही ही.); उसके लिए आप शंकराचार्य, मध्वाचार्य, बलदेव-विद्याभूषण, प्लेटो, अरस्तु, स्पिनोजा, जोन  लॉक , बर्कले इत्यादि को पढ़ सकते हैं- प्रेफेरेंस के लिए.
[अगर कोई बात भूल वश गलत लिख दूँ, तो कृपया मुझे क्षमा करेंगे. क्योंकि मैं उम्र, समझ और अनुभव में बहुत छोटा हूँ.]


मुर्तिमय संसार.
ये संसार दो प्रकार के पदार्थों से भरा पड़ा है- जड़ और चेतन. एक तीसरे प्रकार का पदार्थ भी है, जो दोनों से विलक्षण है- ईश्वर. फिर भी कुछ लोग अपनी समझ के अनुसार उसे भी चेतन ही मान के काम चलाते हैं. अभी चेतन पदार्थों पर चर्चा करना विषयांतर होगा- आगे देखेंगे. जड़ मय संसार मुर्तिमय पदार्थों से भरा पड़ा है. चाहे वे साकार हों, या निराकार. सब के सब मूर्त  हैं. मूर्त माने वस्तुगत सत्ता वाले. जैसे सपने में देखी गई हूर-परी, माने ड्रीम गर्ल का असल जीवन में कोई वस्तुगत अस्तित्व है या नहीं, ये बहस का विषय है. परन्तु आपकी धरमपत्नी की वस्तुगत सत्ता में आप कैसे यकीन नहीं करेंगे? [भागवान, जरा एक रोटी और लाना.]
नदी, पहाड़, हवा, पानी, दिल्ली, लन्दन, आप, मैं, धरती, आकाश; सभी मूर्त हैं. इसी कारण हम कभी कभी इन सब में इनका अपना-अपना व्यक्तित्व खोज लेते हैं. गंगा की अपनी कहानी है. हिमालय का अपना अतीत है. हवा की अपनी खुमारी है. पानी का अपना मिज़ाज है. दिल्ली की अपनी एक धड़कन है. लन्दन का अपना एक शबाब है. आपकी अलग, और मेरी अलग शख्सियत है. यह जो शख्सियत है, जो व्यक्तित्व है; वही मूर्त होने के लिए जिम्मेदार है.
मगर इन सब बातों में आपको ये नहीं लगता कि इन सब चीजों का व्यक्तित्व कही न कही हमारे अपने दिमाग का खेल है!?!
जी हाँ! बुद्धि के बल को कम मत मानिए. यहीं से तो चेतन पदार्थों कि दुनिया शुरू होती है.

मूर्ति मय संसार का अमुर्तिकरण.
असल में हम जो कुछ भी जान पाते हैं, सब अपनी बुद्धि की ही वजह से जान पाते हैं. हालाँकि चुनांचे इस काम में हमारी इन्द्रियां और आस पास की चीजें और लोग भी मदद करते हैं. मगर उनका महत्त्व सिर्फ प्रमाण की तरह ही है. उस प्रमाण का क्या और कैसा इस्तेमाल करना है, ये हमारी बुद्धि पर निर्भर करता है. प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और सत्-प्रत्यक्ष; ये चार तरह के प्रमाण लगभग सभी दार्शनिकों ने माने हैं. कुछ कम, कुछ ज्यादा. मगर इन प्रमाणों के द्वारा बुद्धि ही ज्ञान का निर्णय करती है. अतः हे बुद्धि, हे विमले, हे शारदे, हे विद्ये, हे अविद्ये; तुझे शत शत नमन.
बुद्धि इन्द्रिय आदि की मदद से जिन वस्तुओं का प्रत्यक्ष करती है; वे मूर्तिमान होते हैं. बुद्धि उन सब का अमुर्तिकरण कर डालती है. नतीजा! सभी चीजें, जड़-पदार्थ से बदल के विचार मात्र बन जाते हैं. हमने आँखों से सेब देखा. गोल गोल. लाल लाल. खाया. मीठा मीठा. पचाया. (पेट के लिए ठीक है). बुद्धि ने सेब का एक विचार (संस्कृत में इस विचार को प्रत्यय कहेंगे) बना लिया. हम इस विचार के रूप में ही सेब को जानते हैं. अन्यथा किसी मुर्तिमय रूप में हम सेब को नहीं जानते. 
यह विचार, या प्रत्यय दो तरह का होता है- विशेष और सामान्य. (महर्षि गौतम और कणाद की जय हो).
किसी एक या दो, या तीन, या फिर गिने जा सकने वाले संख्या में अगर हम चीजों का प्रत्यक्ष करेंगे तो हमें उनका विशेष ज्ञान ही प्राप्त हो पायेगा. सामान्य नहीं. सामान्य तो वह है जो किसी जाति विशेष के सभी वस्तुओं में विद्यमान हो. जैसे कोई मनुष्य काला है, कोई गोरा है, कोई नाटा है , कोई लम्बा है, कोई संत है, कोई पापी है. मगर काला, गोरा, नाटा, लम्बा, संत, पापी; ये सब तो विशेष बातें हो गयी. मनुष्यत्व एक ऐसी चीज है, जो सभी मनुष्यों में होती है. जिसके कारण कोई मनुष्य, मनुष्य होता है. सामान्य का विचार भी हमारे बुद्धि में है. सिर्फ विशेष ही हो, ऐसी बात नहीं है. हाँ! मगर सामान्य का ज्ञान प्रत्यक्ष द्वारा संभव नहीं है. क्योंकि मनुष्यत्व को जानने के लिए संसार के तीनो कालों के सभी मानुषों का प्रत्यक्ष करना ही संभव नहीं है. कुछ लोग तो मर चुके हैं, कुछ जन्मे ही नहीं है. और कुछ लोग अफ्रीका के घने जंगलों में रहते हैं; जहाँ जाते जाते कहीं हम ही न मर जाए. (भगवान बचाए! अभी तो आपने लम्बी उम्र जीना है. बहुत सालों तक हमारे दिमाग की दही करनी है.)
तो जी बात ये है कि मुर्तिमय पदार्थों का प्रत्यक्ष से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वह विशेष ही होता है; सामान्य नहीं. उसके लिए तो अनुमान और शब्द प्रमाण पर भरोसा करना पड़ता है. और सचमुच ये दोनों काफी कारगर भी होते हैं. शब्द प्रमाण तो वैसे भी काफी शक्तिशाली माना गया है.
अतः हमारी बुद्धि मुर्तिमय पदार्थों को अमुर्तिमय बनती है. यह अमुर्तिकरण कि शक्ति हमारी बुद्धि में ही है. और कही नहीं. क्या आप किसी साकार टेबल को निराकार बना सकते हैं, बगैर बुद्धि के; और तब भी उसका अस्तित्व बना रहे?
बुद्धि में विचार या प्रत्यय के रूप में वस्तु का अस्तित्व बना रहता है. मगर यह सत्ता वस्तुगत न हो कर आत्मगत/बुद्धिगत  होती है. और इस अमुर्तिकरण की प्रक्रिया में बुद्धि का वस्तु से जो समबन्ध बनता है, वही उस वस्तु के व्यक्तिकरण का जिम्मेदार है. क्योंकि मूर्त को अमूर्त करने के लिए पहले मूर्ति-तत्व को वस्तु के अस्तित्व से अलग जानना जरूरी है. 

मेरी समस्या से इन सब बातों का लेना-और देना.
असल में मुझे तो न उधो का लेना है, न माधो को देना है. मगर मेरी समस्या श्री भगवान के स्वरुप से सम्बंधित थी. यद्यपि यह कहा नहीं जा सकता की ईश्वर जड़ है या चेतन है! तथापि लोगों ने अपनी अपनी तरह से उसे किसी न किसी प्रकार के पदार्थ की श्रेणी में जरूर रखा है. यहाँ उन सब का विवेचन करना सर-दर्द से कम नहीं है. मगर मैं अपने विचार (हैं!) जरूर बताना चाहूँगा.
मेरे विचार से ईश्वर चेतन भी है, जड़ भी है और इन दोनों से अलग एक विलक्षण तीसरी वस्तु है. 
ईश्वर के पक्ष या विपक्ष में, आस्तिक या नास्तिक कोई न कोई विचार या संकल्प या निर्णय या बोध हमारी बुद्धि में अवश्य रहता है. पाश्चात्य दार्शनिक इसे ईश्वर का सहज प्रत्यय कहते हैं. यानी by-birth-idea. इसी कारण ईश्वर का आत्मगत / बुद्धिगत अस्तित्व तो मानना ही पड़ेगा. ईश्वर का यह अस्तित्व चेतन जगत में है. अतः ईश्वर एक चेतन पदार्थ है.
पुनः  जितने भी लोग ईश्वर को मानते हैं, उन्हें ईश्वर के वस्तुगत अस्तित्व में विश्वास है. जैसे आकाश प्रत्यक्षतः निराकार है, असीम है; फिर भी उसका वस्तुगत अस्तित्व तो है. परमाणु सूक्ष्म है, अज्ञेय है, अप्रत्यक्ष है; फिर भी उसकी वस्तुगत सत्ता है. अर्थे, वह मूर्तिमान जड़-द्रव्य है. इसी प्रकार ईश्वर की सत्ता जड़-जगत में भी सिद्ध होती है. {लगता है कुछ लोगों की त्योरियां चढ़ गयी है. "प्रिय रंजन, यहाँ मिल गए हो. कहीं और मत मिलना. वर्ना...."}
              ये दोनों बातें सत्य हैं. मगर फिर भी मेरे लिए ईश्वर न तो जड़ है, न चेतन. वह तो विलक्षण ही है. जड़ तत्व का सर्वश्रेष्ठ  उदाहरण है - संसार. और चेतन तत्व का उदाहरण है- आत्मा. सच में ईश्वर मूर्तिमान स्वरुप में विराट-जगद-पुरुष है. सच में ईश्वर अमूर्त स्वरुप में परम-जगद-आत्मा है. मगर यह भी सच है की ईश्वर मूर्त-अमूर्त, व्यक्त-अव्यक्त, दोनों से भी परे सच्चिदानंद है.
आज हमने मूर्त और अमूर्त, व्यक्त और अव्यक्त दो प्रकार के ज्ञान और तत्संबंधी पदार्थ के दो प्रकारों तथा ईश्वर के दो स्वरूपों की चर्चा की है. अभी वक़्त कम है, सो मित्रों नींद-मारने जाता हूँ. कल उठ कर ऑफिस भी जाना है. अभी तीसरे ज्ञान की चर्चा बाद में करेंगे; जो व्यक्त और अव्यक्त के बाद की बात है :- स्वरुप. 
तब तक के लिए-
हरे कृष्ण.
गोविन्दम्, आदि-पुरुषम, तम-अहम् भजामि.  
 

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