शनिवार, 20 मार्च 2010

shree vigrah.

मूर्त, अमूर्त और विग्रह.- २.
हरे कृष्ण, मित्रों ! दंडवत प्रणाम.
पिछले ब्लॉग पर हमने देखा कि किस प्रकार हमारी बुद्धि बाह्य-जगत में उपस्थित मूर्त पदार्थों का अमुर्तिकरण कर के उनका चेतन जगत के प्रत्ययों से  सामंजस्य बिठाती है. ज्ञान प्राप्त करने का यही तरीका है.
ईश्वर के बारे में भी हम इसी प्रकार जान पाते हैं.
हम जो प्राकृतिक शक्तियों में ईश्वर को ढूंढते हैं, वह असल में इसी अमुर्तिकरण के स्वभाव के कारण होता है. हम अपने चारों तरफ जगत-विराट-पुरुष को रोज ही देखते हैं. [नास्तिकों को जाने दीजिये, वे बेचारे तो साक्षात् श्री भगवान को हमारी आपकी तरह सामने देखले, और खुद साइकिल पर हों, तो घंटी बजाते हुए बोले- "अबे! सामने से हट. मरना है क्या?"] इतना ही नहीं, उन्हें स्वयं अपने शरीर में, अपने आस पास के लोगों में, जीवों में, पेड़-पौधों में, नदी-पहाड़ों में; हर जगह महसूस करते हैं. फिर जब हम अपने विचारों का इस्तेमाल करते हैं, तब हमें एकदम से पता चलता है कि न तो हम शरीर हैं; न ही चारो तरफ ये सब जंजाल है. हम सब आत्माएं (सॉरी! वेदान्तिक रूप से एक अद्वैत आत्मा) हैं. फिर तो ईश्वर भी आत्म-स्वरुप हो जाता है. एक मात्र परमात्मा, जो संसार की सभी वस्तुओं का प्रत्ययात्मक मूल स्वरुप है.
मगर यह सब तो सामान्य समझ ही है. क्योंकि जिस चीज को असल आत्मा कहते हैं, वह सामान्य समझ से भी विलक्षण वस्तू है. कैसे मान ले की सत्य वस्तु जागतिक या वैचारिक सीमाओं में बंध सकती है? वह अवश्य ही परे है. तुरीय है.
अब चूँकि परे है, तुरीय है; तो फिर वह हमारी ऐन्द्रिक प्रत्यक्षों तथा मानसिक विचार-अनुमानों से अलग हो जाती है. हम न तो  उसे अपनी इन्द्रियों के प्रत्यक्ष कर के जड़ घोषित कर सकते हैं; न ही अपनी बुद्धि द्वारा अनुमानित कर के चेतन-मात्र साबित कर सकते हैं. [मुझे पता है कि बहुत से लोग होंगे जो मुझसे बहस करना चाहेंगे; सत्य को जड़ अथवा चेतन सिद्ध करने के लिए. मगर मैं बहस में थोडा कच्चा हूँ. इसलिए क्षमा. मैं अपनी बात कहूँगा और चलता बनूँगा.]
प्रमाण.
ऐसी ही अवस्था में प्रमाण-वाद का निर्णय करना पड़ता है. जब व्यक्ति यह तय नहीं कर पाता कि इन्द्रियों तथा बुद्धि में से कौन बेहतर ज्ञान दे सकता है.
मैं वैदिक परंपरा में स्थापित प्रमाण वाद का यहाँ जिक्र करना चाहूँगा.
वेदों में चार प्रकार के प्रमाण माने गए हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और उपमान(सत्-प्रत्यक्ष).
१. प्रत्यक्ष- हम अपनी इन्द्रियों का जड़ जगत से संपर्क कर के जो ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह प्रत्यक्ष कहलाता है. अगर प्रत्यक्ष द्वारा ही हमें सच्चे ज्ञान कि प्राप्ति हो जाये, तो फिर अन्य किसी भी प्रमाण कि जरूरत ही नहीं रह जाती है. इसी से कहा है- प्रत्यक्षे किम प्रमाणं.
२.. अनुमान- अगर प्रत्यक्ष से काम न बने, तो हमारी बुद्धि स्वयं स्मृत-कल्पना-संकल्प आदि अनुमानों द्वारा सत्य का निर्णय करने का प्रयास करती है. जैसे अगर सामने रस्सी रखी हो, और हमें सर्प नजर आए, तो बुद्धि यह निर्णय देती है कि अरे यह सर्प तो चल नहीं रहा, फन नहीं फैला रहा; देखो तो जीवित है कि नहीं. हम हिम्मत कर के आगे बढ़ते हैं. बुद्धि कहती है- अरेरे, ये तो रस्सी है. बेकार में डर गए.
          मगर हमने अभी देखा कि वास्तविक सत्य-ज्ञान में प्रत्यक्ष और अनुमान किसी काम के नहीं है. ऐसी ही स्थिति के लिए मनीषियों ने तीसरे प्रमाण कि  स्थापना की है.
३. शब्द - संसार में बहुत से लोग हो गए हैं, जिन्होंने भगवान कि कृपा से सत्य-चित-आनंद प्रभु का साक्षात्कार किया है. यद्यपि वह अवर्णनीय है, फिर भी उन्होंने हम जैसे मुर्ख लोगों के भले के लिए चलती-फिरती भाषा में ही सही, सत्य को वर्णनीय बनाने का प्रयास किया है. भारतीय परंपरा में ऐसे लोगों को आप्त-पुरुष कहते हैं. आज-कल कि भाषा में पारंपरिक-विद्वान; जिसे असली विद्या मिल गयी है. कुछ लोग ऐसे भी हो गए हैं, जिनको सामान्य भाषा में भगवान का वर्णन दोष-पूर्ण लगा; तो भगवान ने कृपा करके उनकी भाषा को इतना शक्तिशाली बना दिया कि वे सही-सही वर्णन कर सके. या यूँ कहिये कि उन पुरुषों के मुख से स्वयं भगवान ने ही सत्य का निर्णय किया. इन दुसरे प्रकार के लोगों को ऋषि कहते हैं.
ऋषियों ने जो उपदेश दिए, वही वेद के नाम से मशहूर हैं. वेद स्वयं भगवान की रचना है, इसलिए अपौरुषेय है, अकाट्य है, सत्य है और स्वतः प्रमाणित है. अन्य विद्वानों ने जो उपदेश दिए, वे शास्त्र के नाम से जाने जाते हैं. ये सारे उपदेश आज भी ग्रन्थ, पुस्तक आदि के रूप में हमारे बीच मौजूद हैं. इन्हें ही समग्र रूप से शब्द प्रमाण कहा जाता है. शब्द प्रमाण सर्व-श्रेष्ठ है, अन्यतम है, क्योंकि यह अनुभूत वाक्य है. मगर इसके साथ भी एक समस्या है. कौन से व्यक्ति के शब्द प्रमाण माने जाए, यह  एक बड़ी समस्या है. कैसे निर्णय हो कि वह सत्य ही कर रहा है? और कैसे निर्णय हो कि वह मेरे हित के लिए ऐसा कह रहा है. कहीं वह ठग तो नहीं, जो अपना उल्लू मेरे डंडे से सीधा करना चाहता है.
यही पर वेद हमारा सहायक होता है. चूँकि वेद स्वयं ईश्वर के उपदेश हैं, अतः उनके बारे में कोई शंका ही नहीं हो सकती. फिर हम उन लोगों के शब्दों पर भी ध्यान दे सकते हैं, जो वेदों के रीती के अनुसार अपना निर्णय देते हैं; न कि मनमाने ढंग से तथा वैदिक पद्धति से परे होकर. ऐसे लोग तो मुख्यतया नास्तिकवाद की ही स्थापना करते हैं. असल में सत्य वस्तु- ईश्वर से उन्हें कोई लेना देना नहीं होता है. वे बस इतना ही जानकर खुश हो जाते हैं कि जड़ क्या है, चेतन क्या है; और कौन सी बातें हैं, जिनका उपदेश करने से चेलों की संख्या बढती है?!!? :)
[इसीलिए प्रमाणिक गुरु की शरण लेना आवश्यक है. क्योंकि एकमात्र वही हैं, जो हमें वैदिक रीती से सच्ची शिक्षा देते हैं, और अन्य प्रमाणिक  आप्त-पुरुषों के शास्त्रों से परिचित करते हैं.]
४. उपमान - यह अंतिम प्रमाण है. कुछ विद्वानों ने इसे प्रत्यक्ष के ही अंतर्गत मन है, मगर मेरी समझ से (भूल-चुक-लेनी-देनी) उपमान ही श्रेष्ठतम प्रमाण है. या फिर यूँ कहें कि यह प्रमाण नहीं है; बल्कि सत्य का साक्षात्कार है. जी हाँ! असल में जब हम प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द आदि प्रमाणों द्वारा सत्य के बारे में जान लेते हैं {के बारे में, न कि स्वयं उसे ही-} तब हमारी ऐसी चेष्टा होती है, कि हम स्वयं उस सत्य को ही जाने. तब उस सत्य के प्रकट होने पर हम उसे पहचान लेते हैं (साइकिल कि घंटी नहीं बजाते); कि यही सत्य है. इसी को उपमान कहा जाता है.
इसे एक उदाहरण से समझते हैं- राम और स्याम दो मित्र थे, राम ने नीलगाय देखी थी; मगर स्याम को पता नहीं था कि नीलगाय क्या चीज है. अतः उसने राम से पूछा कि नीलगाय क्या है? राम ने कहा- नीलगाय एक जंगली पशु है, जो देखने में गाय की ही तरह लगती है. यह तो शब्द से प्राप्त ज्ञान हुआ. यानी स्याम ने नीलगाय के बारे में जान लिया. फिर एक दिन स्याम जंगल में गया. वहां उसे एक जानवर मिला जो गाय की तरह था. स्याम ने जाना कि यही नीलगाय है. इसतरह उपमान द्वारा स्याम ने नीलगाय का सत्य-ज्ञान प्राप्त किया. असल में पहले संता-बंता की जो कहानी कही थी, वह उपमान का ही उदाहरण है. यही थोथे फिलोसोफेर और सत्य-दार्शनिक के बीच का अंतर है. मगर यहाँ एक चीज महत्वपूर्ण है, की उपमान से पूर्व अन्य प्रमाणों द्वारा सत्य की व्यावहारिक जानकारी लेना आवश्यक है. अगर स्याम ने राम से नीलगाय के बारे में शब्द-ज्ञान नहीं लिया होता तो वह नीलगाय को भी गाय ही समझ लेता. यह तो साइकिल की घंटी बज जाती. :)
अतः पहले के तीनो प्रमाणों का भी महत्त्व है.
मगर चूँकि उपमान असल में साक्षात्कार का नाम है, तो चलिए; हम भी इसे प्रमाण की श्रेणी से हटा देते हैं और शब्द को ही महत्तम प्रमाण मन लेते हैं.
शब्द प्रमाण के आधार पर ईश्वर का स्वरुप:
                  मैं शब्द प्रमाण का ही प्रयोग करूँगा; क्योंकि स्वयं मुझे प्रत्यक्ष से सत्य नहीं मिल पाया और मेरी बुद्धि  ने तो कुछ दिनों पहले तक मेरे साथ खेल ही किया है. इसलिए मैं स्वयं तो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ. इसलिए मुझे क्षमा करे, और वैदिक शास्त्रों के शब्दों पर ध्यान दे.
जब ईश्वर ने ब्रह्माण्ड के पहले ऋषि- चतुर्मुख ब्रह्मा को वेद प्रदान किया, तब उन्होंने ईश्वर की स्तुति की. संस्कृत भाषा में वह स्तुति ब्रह्म-संहिता के नाम से प्राप्त होती है. उसी ब्रह्म-संहिता के पांचवे अध्याय में एक श्लोक में ब्रह्माजी ने भगवान का स्वरुप बतलाते हुए कहा है-
अंगानि यस्य सकलेंद्रिय-वृत्तिमंति ,
पश्यन्ति, पांति, कलयन्ति, चिरं जगन्ति,
आनंद-चिन्मय-सत्-उज्जवल विग्रहस्य;
गोविन्दम् आदि-पुरुषम, तम अहम् भजामि..
मैं वेदों का ज्ञानी तो नहीं हूँ. मगर गुरुदेव के उपदेशों से, वैष्णवों के सत्संग से और सज्जनों के चर्चा से कुछ कुछ मगजमारी कर बैठा हूँ. वैसे तो शास्त्रों में भगवान के स्वरुप का अनेक प्रकार से विस्तृत वर्णन है, मगर मैं यहाँ अपनी शक्ति के अनुसार मात्र इसी श्लोक पर चर्चा करूँगा. हो सकता है, मात्र इसी श्लोक को समझने में ही मेरी बुद्धि टें बोल जाए; मगर इतने प्रयास से भी मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा. सुधि जन और वैष्णव-ठाकुर-गण मेरी घृष्टता को क्षमा करें.
वैसे आज काफी कागज़ खर्च कर चुका (अबे! कागज नहीं, ये तो ब्लोग्पोस्ट है); अतः आज विदा. अगली बार यहीं से शुरू होंगे और इस श्लोक में भगवान के स्वरुप का जो दिग्दर्शन कराया गया है; उसपर क्षमतानुसार दिमाग की दही करेंगे. तब तक के लिए- जय श्री राम.
हरे कृष्ण.
गोविन्दम् आदि पुरुषम, तम अहम् भजामि.

गुरुवार, 18 मार्च 2010

Personized, Impersonized and the Form.-1.

मूर्त, अमूर्त और श्रीविग्रह. 

हरे कृष्ण.
मित्रों! पिछले दिनों जिस दुविधा में पड़ा था, वह असल में बुद्धि की बदमाशी ही थी. अन्यथा सत्य को क्या लेना देना साकार होने से, या निराकार होने से?!!
बुद्धि की एकमात्र शक्ति है विचार करने की, सो कर रही थी. और उसी विचार के प्रभाव से उसने मेरे साथ खिलवाड़ करने का प्रयास किया. मगर फिर बुद्धि पर श्रील गुरुदेव ने कृपा कर दी. वे स्वभावतः कृपामय हैं, सो जान गए की मेरे दोस्तों ने ही मेरे साथ खेल कर दिया है. उनकी कृपा का असर हुआ कि दोस्तों ने फिर से दोस्ती निभाई. जिस बुद्धि ने विभ्रम दिया था, उसी बुद्धि ने विवेक के साथ मिलकर रास्ता ढूंढ़ निकला.
मैं यहाँ अपने प्रश्न और उसके उत्तरों पर चर्चा करना उचित नहीं समझता. नीलेश भाई ने मदद करने की भरसक कोशिश की, मैं उनका शुक्र-गुज़ार हूँ. आपके विचार काफी मददगार साबित होते हैं. लगे रहो नीलेश भाई, संसार में समझदारों की बड़ी जरूरत है. खासकर आजकल, जब इंसान सिर्फ भौतिकता के पीछे लगा है, अपने अभौतिक अस्तित्व और उसकी आवश्यकताओं को भूल गया है.
खैर मूल मुद्दे पर आता हूँ.
दर्शन और फिलोसोफी में अंतर.
मैं जिस दर्शन और फिलोसोफी के चक्कर में पड़ा था, वो बड़ी बेकार चीज है. हा हा हा. (उतनी भी बेकार नहीं है, असल में मेरी ही औकात नहीं है. इसलिए- अंगूर खट्टे हैं.)
दर्शन भारतीय शब्द है, जिसका मतलब है- 'हाथ पर रखे हुए आंवले के सामान देखना'.
ठीक उलट फिलोसोफी लैटिन शब्द है, जिसका मतलब है- 'ज्ञान से प्रेम करना.'
शोर्ट-कट में बताऊँ तो भारतीय मनीषी चाहते हैं कि कर्म हो, उपासना हो, अथवा ज्ञान हो; सभी मात्र साधन ही हैं. हमें तो सत्य का साक्षात्कार ही करना हैं. नहीं तो पूजन, कर्म, जानकारियां; सब बेकार हैं. हमारा ज्ञान वह है, जिसे जानने के बाद हम उसे पा लेते हैं. मगर पश्चिम में विद्वान मात्र जानने के पीछे लगे रहते हैं. देखना और पाना शायद उनके बस की बात नहीं (तो ट्रक कि बात होगी.)
ये अंतर कुछ ऐसा है, कि सरदार संता सिंह को पता है कि एक पेड़ है. जिसका नाम आम का पेड़ है. उसमे बड़ी हरियाली होती है. उसका फल कच्चे में भी खट्टा-मीठा होता है. मगर पका हुआ आम बड़ा ही मीठा और स्वादिष्ट होता है.
सरदार बंता सिंह को भी ये सब पता है, मगर उसे एक ऐसी बात पता है जो संता सिंह को नहीं पता. कि ये पेड़ कहाँ है? बंता सिंह पेड़ तक पहुंचा, पेड़ पर चढ़ा और उसका मीठा स्वादिष्ट फल खाया. दूसरी ओर बंता सिंह आम के पेड़ की चर्चा करता रहा, सेमिनार में लेक्चर देता रहा. और फिर उसने आम पर एक ५०० पन्ने की पुस्तक भी लिख डाली, जिसके लिए उसे नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
कमोबेस ये पश्चिमी फिलोसोफर का हाल हम सब लोगों का हो गया है.
खैर, आगे जो लेक्चर मैं भांजने वाला हूँ, या जो चर्चा करने वाला हूँ (शायद जीवन भर में ५०० पन्ने तो लिख की डालूँगा. ही ही ही.); उसके लिए आप शंकराचार्य, मध्वाचार्य, बलदेव-विद्याभूषण, प्लेटो, अरस्तु, स्पिनोजा, जोन  लॉक , बर्कले इत्यादि को पढ़ सकते हैं- प्रेफेरेंस के लिए.
[अगर कोई बात भूल वश गलत लिख दूँ, तो कृपया मुझे क्षमा करेंगे. क्योंकि मैं उम्र, समझ और अनुभव में बहुत छोटा हूँ.]


मुर्तिमय संसार.
ये संसार दो प्रकार के पदार्थों से भरा पड़ा है- जड़ और चेतन. एक तीसरे प्रकार का पदार्थ भी है, जो दोनों से विलक्षण है- ईश्वर. फिर भी कुछ लोग अपनी समझ के अनुसार उसे भी चेतन ही मान के काम चलाते हैं. अभी चेतन पदार्थों पर चर्चा करना विषयांतर होगा- आगे देखेंगे. जड़ मय संसार मुर्तिमय पदार्थों से भरा पड़ा है. चाहे वे साकार हों, या निराकार. सब के सब मूर्त  हैं. मूर्त माने वस्तुगत सत्ता वाले. जैसे सपने में देखी गई हूर-परी, माने ड्रीम गर्ल का असल जीवन में कोई वस्तुगत अस्तित्व है या नहीं, ये बहस का विषय है. परन्तु आपकी धरमपत्नी की वस्तुगत सत्ता में आप कैसे यकीन नहीं करेंगे? [भागवान, जरा एक रोटी और लाना.]
नदी, पहाड़, हवा, पानी, दिल्ली, लन्दन, आप, मैं, धरती, आकाश; सभी मूर्त हैं. इसी कारण हम कभी कभी इन सब में इनका अपना-अपना व्यक्तित्व खोज लेते हैं. गंगा की अपनी कहानी है. हिमालय का अपना अतीत है. हवा की अपनी खुमारी है. पानी का अपना मिज़ाज है. दिल्ली की अपनी एक धड़कन है. लन्दन का अपना एक शबाब है. आपकी अलग, और मेरी अलग शख्सियत है. यह जो शख्सियत है, जो व्यक्तित्व है; वही मूर्त होने के लिए जिम्मेदार है.
मगर इन सब बातों में आपको ये नहीं लगता कि इन सब चीजों का व्यक्तित्व कही न कही हमारे अपने दिमाग का खेल है!?!
जी हाँ! बुद्धि के बल को कम मत मानिए. यहीं से तो चेतन पदार्थों कि दुनिया शुरू होती है.

मूर्ति मय संसार का अमुर्तिकरण.
असल में हम जो कुछ भी जान पाते हैं, सब अपनी बुद्धि की ही वजह से जान पाते हैं. हालाँकि चुनांचे इस काम में हमारी इन्द्रियां और आस पास की चीजें और लोग भी मदद करते हैं. मगर उनका महत्त्व सिर्फ प्रमाण की तरह ही है. उस प्रमाण का क्या और कैसा इस्तेमाल करना है, ये हमारी बुद्धि पर निर्भर करता है. प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और सत्-प्रत्यक्ष; ये चार तरह के प्रमाण लगभग सभी दार्शनिकों ने माने हैं. कुछ कम, कुछ ज्यादा. मगर इन प्रमाणों के द्वारा बुद्धि ही ज्ञान का निर्णय करती है. अतः हे बुद्धि, हे विमले, हे शारदे, हे विद्ये, हे अविद्ये; तुझे शत शत नमन.
बुद्धि इन्द्रिय आदि की मदद से जिन वस्तुओं का प्रत्यक्ष करती है; वे मूर्तिमान होते हैं. बुद्धि उन सब का अमुर्तिकरण कर डालती है. नतीजा! सभी चीजें, जड़-पदार्थ से बदल के विचार मात्र बन जाते हैं. हमने आँखों से सेब देखा. गोल गोल. लाल लाल. खाया. मीठा मीठा. पचाया. (पेट के लिए ठीक है). बुद्धि ने सेब का एक विचार (संस्कृत में इस विचार को प्रत्यय कहेंगे) बना लिया. हम इस विचार के रूप में ही सेब को जानते हैं. अन्यथा किसी मुर्तिमय रूप में हम सेब को नहीं जानते. 
यह विचार, या प्रत्यय दो तरह का होता है- विशेष और सामान्य. (महर्षि गौतम और कणाद की जय हो).
किसी एक या दो, या तीन, या फिर गिने जा सकने वाले संख्या में अगर हम चीजों का प्रत्यक्ष करेंगे तो हमें उनका विशेष ज्ञान ही प्राप्त हो पायेगा. सामान्य नहीं. सामान्य तो वह है जो किसी जाति विशेष के सभी वस्तुओं में विद्यमान हो. जैसे कोई मनुष्य काला है, कोई गोरा है, कोई नाटा है , कोई लम्बा है, कोई संत है, कोई पापी है. मगर काला, गोरा, नाटा, लम्बा, संत, पापी; ये सब तो विशेष बातें हो गयी. मनुष्यत्व एक ऐसी चीज है, जो सभी मनुष्यों में होती है. जिसके कारण कोई मनुष्य, मनुष्य होता है. सामान्य का विचार भी हमारे बुद्धि में है. सिर्फ विशेष ही हो, ऐसी बात नहीं है. हाँ! मगर सामान्य का ज्ञान प्रत्यक्ष द्वारा संभव नहीं है. क्योंकि मनुष्यत्व को जानने के लिए संसार के तीनो कालों के सभी मानुषों का प्रत्यक्ष करना ही संभव नहीं है. कुछ लोग तो मर चुके हैं, कुछ जन्मे ही नहीं है. और कुछ लोग अफ्रीका के घने जंगलों में रहते हैं; जहाँ जाते जाते कहीं हम ही न मर जाए. (भगवान बचाए! अभी तो आपने लम्बी उम्र जीना है. बहुत सालों तक हमारे दिमाग की दही करनी है.)
तो जी बात ये है कि मुर्तिमय पदार्थों का प्रत्यक्ष से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वह विशेष ही होता है; सामान्य नहीं. उसके लिए तो अनुमान और शब्द प्रमाण पर भरोसा करना पड़ता है. और सचमुच ये दोनों काफी कारगर भी होते हैं. शब्द प्रमाण तो वैसे भी काफी शक्तिशाली माना गया है.
अतः हमारी बुद्धि मुर्तिमय पदार्थों को अमुर्तिमय बनती है. यह अमुर्तिकरण कि शक्ति हमारी बुद्धि में ही है. और कही नहीं. क्या आप किसी साकार टेबल को निराकार बना सकते हैं, बगैर बुद्धि के; और तब भी उसका अस्तित्व बना रहे?
बुद्धि में विचार या प्रत्यय के रूप में वस्तु का अस्तित्व बना रहता है. मगर यह सत्ता वस्तुगत न हो कर आत्मगत/बुद्धिगत  होती है. और इस अमुर्तिकरण की प्रक्रिया में बुद्धि का वस्तु से जो समबन्ध बनता है, वही उस वस्तु के व्यक्तिकरण का जिम्मेदार है. क्योंकि मूर्त को अमूर्त करने के लिए पहले मूर्ति-तत्व को वस्तु के अस्तित्व से अलग जानना जरूरी है. 

मेरी समस्या से इन सब बातों का लेना-और देना.
असल में मुझे तो न उधो का लेना है, न माधो को देना है. मगर मेरी समस्या श्री भगवान के स्वरुप से सम्बंधित थी. यद्यपि यह कहा नहीं जा सकता की ईश्वर जड़ है या चेतन है! तथापि लोगों ने अपनी अपनी तरह से उसे किसी न किसी प्रकार के पदार्थ की श्रेणी में जरूर रखा है. यहाँ उन सब का विवेचन करना सर-दर्द से कम नहीं है. मगर मैं अपने विचार (हैं!) जरूर बताना चाहूँगा.
मेरे विचार से ईश्वर चेतन भी है, जड़ भी है और इन दोनों से अलग एक विलक्षण तीसरी वस्तु है. 
ईश्वर के पक्ष या विपक्ष में, आस्तिक या नास्तिक कोई न कोई विचार या संकल्प या निर्णय या बोध हमारी बुद्धि में अवश्य रहता है. पाश्चात्य दार्शनिक इसे ईश्वर का सहज प्रत्यय कहते हैं. यानी by-birth-idea. इसी कारण ईश्वर का आत्मगत / बुद्धिगत अस्तित्व तो मानना ही पड़ेगा. ईश्वर का यह अस्तित्व चेतन जगत में है. अतः ईश्वर एक चेतन पदार्थ है.
पुनः  जितने भी लोग ईश्वर को मानते हैं, उन्हें ईश्वर के वस्तुगत अस्तित्व में विश्वास है. जैसे आकाश प्रत्यक्षतः निराकार है, असीम है; फिर भी उसका वस्तुगत अस्तित्व तो है. परमाणु सूक्ष्म है, अज्ञेय है, अप्रत्यक्ष है; फिर भी उसकी वस्तुगत सत्ता है. अर्थे, वह मूर्तिमान जड़-द्रव्य है. इसी प्रकार ईश्वर की सत्ता जड़-जगत में भी सिद्ध होती है. {लगता है कुछ लोगों की त्योरियां चढ़ गयी है. "प्रिय रंजन, यहाँ मिल गए हो. कहीं और मत मिलना. वर्ना...."}
              ये दोनों बातें सत्य हैं. मगर फिर भी मेरे लिए ईश्वर न तो जड़ है, न चेतन. वह तो विलक्षण ही है. जड़ तत्व का सर्वश्रेष्ठ  उदाहरण है - संसार. और चेतन तत्व का उदाहरण है- आत्मा. सच में ईश्वर मूर्तिमान स्वरुप में विराट-जगद-पुरुष है. सच में ईश्वर अमूर्त स्वरुप में परम-जगद-आत्मा है. मगर यह भी सच है की ईश्वर मूर्त-अमूर्त, व्यक्त-अव्यक्त, दोनों से भी परे सच्चिदानंद है.
आज हमने मूर्त और अमूर्त, व्यक्त और अव्यक्त दो प्रकार के ज्ञान और तत्संबंधी पदार्थ के दो प्रकारों तथा ईश्वर के दो स्वरूपों की चर्चा की है. अभी वक़्त कम है, सो मित्रों नींद-मारने जाता हूँ. कल उठ कर ऑफिस भी जाना है. अभी तीसरे ज्ञान की चर्चा बाद में करेंगे; जो व्यक्त और अव्यक्त के बाद की बात है :- स्वरुप. 
तब तक के लिए-
हरे कृष्ण.
गोविन्दम्, आदि-पुरुषम, तम-अहम् भजामि.  
 

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

Ek Prashna aap sab se - - - - ?

हरे कृष्ण.
ब्लॉग के सभी पाठको और मित्रो को मेरा प्रणाम.
पिछले कई दिनों से ब्लॉग पर कुछ लिखने या पढने का समय नहीं मिला. मैं तो समय से ऑन लाइन भी नहीं हो पा रहा था. इसके लिए आप सब से क्षमा मांगता हूँ. कुछ कार्य स्थल कि व्यस्तता थी और कुछ निजी परेशानियाँ. मगर इसी बीच एक दार्शनिक कठिनाई ने आ घेरा. मैं हर जगर उसका हल धुन्धता फिर , मगर जब कहीं चैन न आया तब आप मित्रों कि याद आई.
कल नीलेश जैन का ब्लॉग पढ़ा, काफी दिनों बाद. नीलेश भाई आप काफी भावुक हो और अपने मुझे भी भावुक कर दिया. खैर इसकी चर्चा फिर कभी करेंगे. अभी तो मैं अपनी परेशानी आप सब से बांटना चाहता हूँ.
संस्कृत भाषा संसार की प्राचीनतम और श्रेष्ठतम भाषा है. इसमें तो कोई दो मत नहीं है. संस्कृत भाषा की सबसे बड़ी खूबी है उसके शब्द. संस्कृत शब्दावली अत्यंत वृहद् और सटीक है. संसार के लगभग प्रत्येक वस्तु, भाव और विचार के लिए संस्कृत में शब्द मिलते हैं. संस्कृत में समानार्थी शब्द भी हैं, मगर वे पुर्णतः समानार्थी नहीं कहे जा सकते. एक ही वस्तु या भाव के लिए दो शब्द मिलते हैं, मगर उनका अर्थ बिलकुल भिन्न होता है. दोनों शब्द, उस वस्तु या भाव के बिलकुल दो अलग अलग गुणों, विशेषताओ तथा पक्षों को सामने रखते हैं. उदाहरण के लिए- पावक और अग्नि दो समानार्थी शब्द हैं. मगर पावक वह है जो गर्मी देता है, गर्म होता है और जिसके प्रयोग से लोग अपना भोजन पका सकते हैं. दूसरी तरफ अग्नि वह है जो हर चीज को जला देती है. अर्थात दोनों शब्द इंगित तो एक ही वस्तु को करते हैं, मगर दो भिन्न दृष्टिकोणों से. ऐसा लगभग हर भाषा के साथ होता है. संस्कृत में तो यह गुण विशेषतः पाया जाता है. अब वीर-अर्जुन के दोनों नामो को देखिये;- पार्थ और सव्यसाची. पार्थ वह है जो पृथा (कुंती माता) का पुत्र है. और सव्यसाची वह है जो एक ही बार में दोनों हांथो का प्रयोग कर के दो अलग अलग कमानों से बाण चला सकता है. यहाँ भी दीखता है, की दो समानार्थी शब्द असल में भावार्थ में सामान भले ही हो; मगर शब्दार्थ में भिन्न भिन्न होते हैं. 
अब मैं अपने समस्या पर आता हूँ.
ईश्वर के तीन स्वरुप माने गए हैं - ब्रह्म, परमात्मा और भगवान. कुछ लोगो ने दो ही स्वरुप माने हैं - सगुण तथा निर्गुण. असल में ब्रह्म, परमात्मा और भगवान एक ही  भगवान् के तीन नाम हैं, मगर तीनो के शब्दार्थ बिलकुल अलग अलग है. ब्रह्म वह है जो इस संसार का मूल है और जिससे ये जगत उत्पन्न हुआ है. अर्थात दृश्य जगत का कारण.
परमात्मा वह है जो इस विराट पुरुष (जगत-पुरुष) के आत्मा के रूप में जगत- आत्मा बनकर सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है. 
भगवान वह है जो भक्तो का प्रिय है, भजन के योग्य है, और प्रेम तथा सत्कार का लक्ष्य है.    
विशेष संस्कृत में नहीं जाऊँगा. मन हो तो संस्कृत व्याकरण या शब्दकोष में आप लोग मेरी बात की जांच कर सकते हैं.
ऐसे ही भगवान के अनके नाम संस्कृत में तथा अन्य भाषाओँ में भी मिलते हैं. उन सभी नामो में मेरी श्रद्धा है, तथा  सभी  स्वरूपों पर विश्वास करता हूँ. 
परन्तु मुझे भगवान के निराकार स्वरुप पर विश्वास नहीं है.


बात जरा अटपटी लग सकती है. मगर यही मेरी समस्या है.


पिछले दिनों मैं प्लेटो तथा अरस्तु के दर्शन का अध्ययन कर रहा था. उन दोनों ने लगभग एक ही प्रकार से इस संसार को दो वस्तुओं से निर्मित माना है- जड़ पदार्थ और आकृति. प्लेटो ने जिसे प्रत्यय ( आइडिया ) कहा है, उसे ही अरस्तु आकृति कहते हैं. और दोनों के लिए आकृत या प्रत्यय ही ईश्वर है. जड़ पदार्थ आकृति हीन है, यानी निराकार है, मगर वह ईश्वर नहीं है. बल्कि ईश्वर वह है जो असल में सभी आकृतियों का मूल तथा आदर्श है. विशेष अन्दर जाना उचित नहीं है, मगर उदहारण के लिए- एक लकड़ी का टेबल है. उसमे जड़ पदार्थ तो है लकड़ी मगर उसका चौकोर होना तथा चौपाया/तिपाया होना ही उसका आकार है.  यद्यपि पदार्थ और आकार कभी अलग अलग नहीं दीख पड़ते , परन्तु अगर चौकोर होनो और चौपाया/तिपाया होना हटा लिया जाये तो जड़ पदार्थ (लकड़ी) निराकार  ही बचेगी. अर्थात इन पश्चिमी दार्शनिको के मत से ईश्वर निराकार नहीं है. बल्कि यह जड़ जगत ही असल में निराकार है. ईश्वर ने ही इसे आकार दिया है. बैबल में भी- उसने हमें अपनी ही छवि दे के रचा, अतः हमारा भी आकार उसके ही जैसा हो गया.
अब संस्कृत और भारतीय दर्शन की बात करते हैं.  जहाँ तक मेरी समझ है, ( अगर भूल रहा हूँ, तो याद जरूर दिलाईयेगा.) की मध्वाचार्य के समय तक संस्कृत के किसी भी कवि ने किसी भी पुस्तक में ईश्वर को निराकार   कह के संबोधित नहीं किया है. अवश्य ही संस्कृत में ऐसे कुछ शब्द हैं, जिनका अनुवाद भूले और भोले हिंदी या अन्य भाषाओ के लेखक और कवि निराकार में कर देते हैं, मगर ऊपर चर्चा किये गए व्याकरण के गुण के अनुसार असल में कहीं भी उन संस्कृत शब्दों के अर्थ निराकार से नहीं है. यहाँ पर मैं कुछ प्रसिद्द संस्कृत शब्दों का उल्लेख करना चाहूँगा  ; -
अव्यक्त - अव्यक्त के दो मतलब होते हैं. पहला वह जो व्यक्त न हो. यानी जिसे प्रत्यक्ष द्वारा प्रमाणित नहीं किया जा सके (न्याय दर्शन का अर्थ). जैसे - भावना, मन, आत्मा, इत्यादि. इसके ठीक विपरीत का शब्द होगा- व्यक्त, जो प्रत्यक्ष है.
दूसरा मतलब है वह जो व्यक्तीकृत न हो. अंग्रेजी में इसके लिए एक शब्द है- Impersonified. उदाहरण के लिए सभी जीव जंतु तो व्यक्तीकृत होते हैं परन्तु निर्जीव पदार्थ, जैसे पहाड़, नदी, ग्रह इत्यादि का व्यक्तिकरण नहीं हो सकता. इसका ठीक उल्टा होगा व्यक्तित्व अर्थात personality/personaified.
इन दोनों ही अर्थों का वस्तु के आकार से कुछ भी लेना देना नहीं है. परमाणु हमारे लिए व्यक्त नहीं है, मगर इसका यह मतलब नहीं की उसका कोई आकार नहीं है. भारत देश का हम व्यक्तिकरण नहीं कर सकते, मगर इस से भारत निराकार साबित नहीं हो जाता.
निर्गुण - इस सब्द के भी दो अर्थ हैं. सांख्य दर्शन के अनुसार जो सत्व, राजस और तामस; इन तीन गुणों(वस्तु की परिस्थिति) से परे है, वही निर्गुण है. जैसे- निर्वाण. इसके उलटे शब्द होता है त्रिगुणात्मक,  जो तीनो गुणों से घिरा हुआ है.
दूसरा मतलब  है वैशेषिक वालों का, की निर्गुण वह है, जिसमे कोई भी गुण(विशेषता) न हो.[यद्यपि मैंने यहाँ सबसे सटीक भाषा का प्रयोग नहीं किया है, मगर हिंदी आखिर तो संस्कृत की बेटी है, सो जरा छोटी है.] उदाहरण के लिए - आत्मा. इसके विपरीत शब्द होगा- गुणवान.
इन दोनों अर्थो का भी निराकार से कुछ लेना नहीं है. क्योंकि गुण का अर्थ कहीं भी आकार नहीं है. हाँ, बड़े या छोटे आकार का होना जरूर एक गुण है. और किसी आकार का न होना भी एक गुण ही है. यह तो आकाश का गुण है. अतः निराकार आकाश कहीं से भी निर्गुण नहीं नजर आता है.
निर्विशेष - यह शब्द शंकराचार्य का प्रिये है, और उन्होंने हर बार ईश्वर के निर्विशेष स्वरुप की महत्ता स्थापित की है. उस चर्चा में जाना यहाँ विषयांतर होगा. 
निर्विशेष का सीधा सा वही अर्थ है जो वैशेषिक दर्शन वालों ने बताया था- वह जो विशेष तथा सामान्य से हीन है. यहाँ विशेष और सामान्य का अर्थ जान लेना जरूरी है. सामने वह है जो एक जाति की सभी वस्तुओं में पाई जाती है. जैसे सभी गायें चौपाई होती हैं, अतः चौपाया होना गायों का सामान्य गुण है. परन्तु किसी के गाय को दुसरे गाय से भिन्न किया जा सकता है, जैसे काली गाय और सफ़ेद गाय. अतः काला और सफ़ेद होना दो अलग अलग गायों का विशेष गुण है. इस से तो  निर्विशेष का सीधा सीधा अर्थ है सभी सामान्यताओ  और विशेषताओ से परे. इसका एकमात्र उदाहरण संसार में ईश्वर ही है. इसी कारण यह शब्द शंकराचार्य को प्रिये है. बाकी सभी शब्दों के अन्य उदाहरण भी मिल जाते हैं. मगर निर्विशेष सिर्फ ईश्वर ही है.
मगर  इस शब्द से भी यह साबित नहीं होता की ईश्वर निराकार  है. 


अब मेरी यही समस्या है. 
आप सब लोग मेरी समस्या को हल करने में मेरी मदद करें.
क्या ईश्वर का कोई निराकार स्वरुप है?
अगर है तो किसी भी प्राचीन या मध्य- युगीन दार्शनिक ने निराकार शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया?
अगर किया है, तो किस संस्कृत पुस्तक में इस शब्द का उल्लेख है?


[तुलसीदास के रामचरितमानस में उत्तरकाण्ड में भगवान शिव के लिए एक शब्द आता है- निराकर्मोंकार्मूलम तुरीयं. मगर यह पद तुलसीदास का नहीं है, बल्कि पूर्व कल्प में किसी घोर कलयुग के समय उज्जैनी के एक ब्रह्मन ने अपने शिष्य को शिव के शाप से बचाने के लिए यह पद रचा था. अतः इसका प्राचीन या मध्य युगीन भारतीय दर्शन और संस्कृत भाषा से कोई लेना देना नहीं है, ऐसा मेरा मानना है.]


अगर किसी के पास मेरे प्रश्न का कोई उत्तर हो, तो कृपया कमेन्ट करे. मेरा यह नया पोस्ट आपका इन्तेजार कर रहा है. और मैं तो कब से सत्य के प्रतीक्षा में हूँ.
जय श्री राम.
हरे कृष्ण. 

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

सांख्य : योग - १


हरे कृष्ण, दंडवत प्रणाम.
पिछली बार भगवान् कपिल के सांख्य दर्शन कि कृपा से श्री गीता जी को समझने की कोशिश की थी.
आज चलिए भगवन कपिल के सिद्धांतो को व्यवहारिक स्वरुप प्रदान कर के सजाने और सवारने वाले भगवन पतंजलि के योग दर्शन की शरण में चलते हैं.
श्री गीता जी में प्रथम और द्वितीय अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण ने सांख्य और योग दर्शन का प्रयोग किया है. यद्यपि द्वितीय अध्याय में वे अन्य सिद्धांतो कि भी झांकी देते हैं.
आत्म तत्व-
जब आदि पुरुष ने सांख्य को दुखी देखा तो उसे जोश दिलाते हुए कहा कि मित्र दुखी मत हो. जीवन-मरण से क्यों घबराते हो? यह तो इस मायिक संसार में सदा लगा ही हुआ है. जो पैदा होता है, वो तो मरता ही है. फिर शोक क्यों करना?
तुम अपने भाई बंधुओं के हिंसक स्वाभाव से डरते हो. सोचते हो कि इनसे लड़ने में मृत्यु ही मृत्यु है, नाश ही नाश है. ठीक सोचते हो, मगर यह तो होगा ही न. युद्ध न भी हो, तब भी मृत्यु तो होनी है-
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः .
अनाशिनो-अप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत .. (गीता- २/१८)
अविनाशी, अपरिमित और नित्य जीव के भौतिक शरीर का अंत होना ही है. अतः शोक त्यागो, युद्ध करो.
संसार रण क्षेत्र है. कौन बच के जाएगा? वही जो सत्य को जानेगा और असत्य को त्याग देगा. कि आत्मा ही सत्य है, और ये शरीर और इसके भोग आदि असत्य हैं. आत्मा का कभी नाश नहीं होता, और शरीर कभी अविनाशी नहीं हो सकता. सत्य और असत्य में जो भेद है, वही ज्ञानी पुरुष कि मुक्ति का कारण है. सत्य कभी ख़त्म नहीं हो सकता है और असत्य कभी सत्य नहीं हो सकता है-
नासतो विद्यते भावो न-अभावो विद्यते सतह.
उभयोरपि दृष्टो-अन्तस्त्वनयोस-तत्त्वदर्शिभिः.. ( गीता- २/१६ )
हे मेरे प्यारे सांख्य पुरुष, ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं कि मैं न रहा होऊं, तुम न रहे हो, या फिर ये सब लोग न रहे हों. और न ही आगे कभी ऐसा होगा. क्योंकि आत्मा तो अमर है. मृत्यु कोई दुखद प्रसंग नहीं है. बल्कि जैसे फटे पुराने कपडे बदल के लोग नया वस्त्र धारण करते हैं, उसी तरह ये नित्य आत्मा शरीर बदल लेती है. इस आत्मा को नष्ट करना तो दूर, कोई शक्ति इसे छु भी नहीं सकती.
सामान्यतः ही जन्म लेता है, उसकी मृत्यु भी होती है. इसी कारण शरीर का मारा जाना जाना जाता है. मगर आत्मा तो न ही कभी जनमती है, न ही उसकी मृत्यु होती है.
तुम्हारा और इन सभी लोगों का सच्चा स्वरुप तो आत्मा है, फिर जनमते-मरते शरीरों के लिए शोक क्यों? इस शोक को त्यागो और पहले सामने आये इस कर्तव्य का पालन करो- युद्ध करो.
देखो त्रिगुण मयी माया के विरूप परिवर्तन से जब तीनो गुण आपस में परिवर्तन करते हैं, तब सम्पूर्ण संसार और इसके जीव अव्यक्त स्वरुप से प्रकट होते हैं और जब प्रकृति का प्रलय हो जाता है तब सभी जीव-तत्व पुनः अव्यक्त हो जाते हैं. परन्तु तुम्हारा सत्-स्वरुप आत्मा तो विलक्षण है, तीनो गुणों से परे है.
इस भौतिक संसार में जब आत्मा स्वयं को शरीर से बंधा मान लेती है, तब वह इस शरीर के धर्मों से जुड़ जाता है. अतः उसका कर्तव्य है कि शरीर के धर्मो का निर्वहन करे और संसार में अच्छे अवस्था को प्राप्त करे.  तुम अभी क्षत्रिय बने हो, अतः तुमरे लिए उचित है कि युद्ध करो और स्वर्ग को प्राप्त करो. अगर अपने धर्म का पालन करोगे तो पुन्यवान होगे, अन्यथा पापी बनोगे और अपना यश को दोगे. यश का खोना तो धर्मी के लिए मृत्यु से भी बुरा है. 
अगर  पाप और अपयश से बचना है तो सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय का विचार त्याग कर अपने धर्म का पालन करो.

इस प्रकार आदि पुरुष गोविन्द ने सांख्य पुरुष अर्जुन के सामने आत्मा के स्वरुप, धर्म तथा कर्तव्य का वर्णन किया.
शेष फिर-
गोविन्दम् आदि पुरुषं तं-अहम् नमामि.

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

sankhy aur aadi : purush sukt -3

हरे कृष्ण. 
नमस्कार मित्रों. इतने दिनों तक ब्लॉग से दूर रहने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ.
हाँ तो अब तक जो दो भाग लिखे, उनसे इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि हम सभी जीव उसी आदि-पुरुष गोविन्द के नित्य प्रेमी सखा हैं. जैसा कि भगवान् कपिल ने हमें नाम दिया था- सांख्य पुरुष. पर हम इस भौतिक प्रकृति में आ कर अपनी सच्ची अवस्था को भूल गए और गोविन्द से दूर हो गए. मगर गोविन्द ने अपने पुराने वादे को याद रखा और हमें फिर से चेत करा के अपने पुराने स्वरुप को याद दिलाने के लिए ही उसने भगवद्गीता को हमारे सामने प्रकाशित किया.
ये कथा मैंने प्रथम अध्याय के लिए लिखी है.
गीता के प्रथम अध्याय को जब भी मैं पढता हूँ, मेरे सामने सांख्य पुरुष का वो दुखी चेहरा सामने आता है, जब वो प्रकृति के गुणों में फंसा हुआ, दुखी, शोकाकुल और अपने-पराये के भेद- अभेद में भ्रमित बैठा है. और अचानक सांख्य को अपने नित्य सखा आदि कि याद आती है.
अचानक ही सांख्य को पता चलता है कि गोविन्द से दूर रहने के कारण वह कितने भयानक और विकत परिस्थितियों में फंस गया है-
"न च शक्नोम्यवस्थातुम भ्रमतीव च में मनः.
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव." (गीता- १-३० )
हे केशी रूपी सरपट दौड़ने वाले इन्द्रियों का दमन करने वाले दामोदर- कृष्ण, यहाँ तो सब कुछ अमंगल ही दीख रहा है. ओह. मैं तो स्वयं को ही भूल बैठा हूँ और मेरा सर चक्र रहा है. मैं अब यहाँ और अधिक खडा नहीं रह सकता.
इस जगत में जब श्री गोविन्द ने हमें अपने सत्-स्वरुप का ज्ञान प्रकट कर के बताया, तब उन्होंने अपने परम भक्त अर्जुन को निमित्त बनाया. असल में हम सभी अलग अलग पुरुष-तत्व हैं. सांख्य दर्शन जिस तत्व को सांख्य पुरुष और आदि पुरुष कहता है, उसे ही न्याय दर्शन आत्मा और परमात्मा तथा वेदांत ब्रह्म और परब्रह्म क्रमशः पुकारते है.
तो, हम सभी आत्माएं उस परमात्मा के प्रेमी जन है. अर्जुन उनका अत्यंत शुद्ध भक्त तथा प्रेमी है. अतः श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता के ज्ञान का निमित्त बनाया है. 
भगवद्गीता का पहला अध्याय एक प्रकार से इस ज्ञान के लिए पृष्ठभूमि तथा भूमिका के सामान है- जहाँ अर्जुन को अचानक याद आता है कि वो इस दुनिया के झमेलों में फंस गया है. हलाँकि उसे इन झमेलों से निकलने का मार्ग सुझाई नहीं देता; फिर भी वो अपनी ये दुर्दशा अपने परम प्रेमी कृष्ण को बताता है- इस आशा में कि आदि पुरुष अपने मित्र सांख्य पुरुष को इस दुःख से छूटने का उपाय जरूर बताएगा.
अर्जुन देखता है कि इस त्रिगुण मयी माया के वश में लोग किस प्रकार भगवान् के प्रेम को भूल के आपस में ही लड़ने मरने के लिए तैयार हो जाते है. भाई भाई को, पिता पुत्र को, और पुत्र पिता को मार डालने के लिए प्रेरित हो जाता है, और ये भी नहीं सोच पाता कि क्या कर रहा है? क्यों कर रहा है?
यह सब देख के अर्जुन तो अत्यंत व्याकुल तथा दुखी हो गया ; यहाँ तक कि-
"वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते.
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते.." (गीता- १-२९ )
मेरा शरीर कांप रहा है, रोंगटे खड़े हो रहे है, गांडीव हाथ से सरका जा रहा है और मेरी त्वचा जल रही है.
अब अचानक उसे समझ में आता है कि ये सभी भौतिक सुख उसके किसी काम के नहीं हैं. इन सुखो को पा के क्या फायदा? जब कि ये सभी सुख किसी न किसी अन्य जीव के दुःख पर आधारित होते है.
"न च श्रेयो-अनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे.
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च.."
हे मेरे मन को आकर्षक लगने वाले प्यारे मित्र! इस झगडे में अपने ही प्यारे मित्रों को मार के मुझे कोई भलाई नजर नहीं आती. मैं तो अब किसी भी विजय, सुख, राज्य आदि कि इच्छा भी नहीं रखता.
इस प्रकार, भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का सार यही है कि हम सभी इस संसार में अपनी विकट परिस्थिति को समझे और अपने उस प्यारे मित्र आदि गोविन्द को याद करे कि वो इस परिस्थिति को समझने तथा इस से पार पाने में हमारी मदद करे.
अब इस कथा- "सांख्य और आदि : पुरुष सूक्त " को 'इति' के साथ विराम देते हैं.
गोविन्दम् आदि पुरुषं, तं अहम् नमामि. 
शेष फिर. 

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

सांख्य और आदि : पुरूष सूक्त 2

जो त्रिगुण माया थी, वो बड़ी जादूगरनी थी। वो कभी सांख्य को हसाती, कभी रुलाती, कभी वैसे ही निट्ठल्ला कर देती। माया के खेल में सांख्य कभी सुखी, कभी दुखी और कभी उदास हो जाता। चूँकि सांख्य अपने प्यारे मित्र आदि से दूर हो गया था; इसलिए वो उसे भूल बैठा। उसे लगा की ये जो दिख रहा है, वही सच है। प्रकृति के खेल में अचानक सांख्य ने देखा कि वो एक चार पैर वाला जानवर है, और भूख के कारण एक और जानवर के पीछे दौड़ रहा है। भूख से उसका हाल बेहाल हो रहा था। इसलिए जैसे ही उसने एक जानवर को देखा, और ये जाना कि उसे मार के खाने पर उसकी भूख मिट जायेगी, वह उस जानवर के पीछे दौड़ पड़ा। काफ़ी दौड़ने के बाद उसने उस जानवर को पकड़ लिया, और मार के खा गया। भूख मिटने से उसे बड़ा सुख मिला। फ़िर अचानक उसने देखा कि वो एक गाय है, और उसे फ़िर से भूख लग गयी। अब वो हरे हरे घास कि खोज में निकला। पहाड़, नदी, रेगिस्तान पार करने के बाद उसे एक घास का बड़ा सा मैदान मिला। वो घास चरने लगा। भूख मिटने से उसे फ़िर से बड़ा मजा आया। फ़िर अचानक उसने अपने को एक पेड़ के रूप में देखा, वो निश्चल खड़ा था। उस पर फल लगे थे, और दूसरे लोग उन फलों को खा रहे थे। फ़िर अचानक कुछ लोग एक आरा ले के आए, और उन्होंने सांख्य को काट दिया। उस समय उसे बड़ा कष्ट हुआ, मगर वो कुछ कर नही पाया। फ़िर अचानक सांख्य ने ये देखा कि वो एक कीडा है। नाले में बह रहा है, और लोगों के गंदे पर पल रहा है। वो मल खाता और मूत्र पीता। इस बात से उसे घिन्न नही आती, बल्कि भूख मिटने पर वो सुखी होता। फ़िर अचानक उसने अपने को एक देवता के रूप में देखा। वो स्वर्ग में बैठा, इन्द्र के सभा में उर्वशी के नृत्य का मजा लेता। भूख लगने पर नंदन वन के स्वादिष्ट फल खाता।

हर बार अलग अलग रूपों में सांख्य को दुःख होता, और फ़िर उस दुःख का अंत भी जरूर होता। दुःख का अंत होने पर उसे सुख मिलता था। इस तरह सांख्य माया के खेल में खो के आदि को भूल गया। फ़िर एक दिन अचानक सांख्य ने अपने को मनुष्य के रूप में देखा। एक सर, दो आँखे, दो कान, एक नाक, एक जिह्वा, दो हाथ, दो पैर, एक पेट, एक लिंग, और कुल मिला के एक सुंदर शरीर। सांख्य को वही सारे दुःख फ़िर से सताने लगे। भूख लगने पर वह अन्न उपजा के खाता, प्यास लगने पर पानी पीता, काम के भरकने पर किसी स्त्री के पास जाता।

आदि, जो वैसे तो सांख्य से जुदा हो गया था, मगर फ़िर भी अदृश्य रूप में हमेश उसके साथ था, उसकी ये दुर्दशा देखकर दुखी हो गया। वैसे तो आदि सुख दुःख से परे था, मगर फ़िर भी दुखी हुआ। (ये बात कुछ समझ नही आई, कि सुख दुःख से परे हो कर भी दुखी हुआ।) आदि ने देखा कि सचमुच सांख्य मुझे भूल गया है, विरह के हमारे कर्तव्य से हट गया है। वह तो सुख दुःख के चक्कर में पर गया है। ये मेरा प्रिये मित्र है, मुझे ही इसे बचाना होगा। इसने भी मुझसे वादा लिया था, कि अगर ये माया के प्रभाव में पड़ा, तो मैं इसकी मदद जरूर करूँगा। ऐसा विचार करके, और पूर्व में किए वादे के कारण आदि ने सांख्य के सामने जाने का निश्चय किया। आदि ने प्रकृति से कहा- "हे माया, मुझे अपने दृश्य में आने दे। मगर याद रख, मुझ पर तेरा असर नही हो सकता; अतः सिर्फ़ आने दे, मुझे अपना खेल दिखा के अपना और मेरा समय बरबाद मत करना।"

प्रकृति ने उसकी बात मान ली, और आदि सांख्य के सामने प्रकट हुआ। उस समय सांख्य एक बड़े ही विषम परिस्थिति में था। उसने अपने जीवन में सुख पाने के लिए, भरसक प्रयत्न किए, मगर कुछ लोग थे, जो उसी कि तरह माया में फंसे थे, उसको सुखी नही होने देना चाहते थे। ये लोग उसके शत्रु प्रतीत होते थे, हालांकि उनमे से अधिकतर सांख्य के परिवार जन ही थे, भाई, चाचा, मामा, मौसा, भतीजा, नाना, दादा, इत्यादि। सब के सब सांख्य से लड़ने, और उसे मार डालने के लिए तैयार थे। सांख्य बड़े पेशोपेश में था, इनसे लड़े या न लड़े। तभी उसने देखा कि उसका एक जाना पहचाना मित्र उसके सामने खड़ा था। उसका वही पुराना प्यारा साथी, वही सुंदर- वही नित्य, वही खिलाड़ी। सांख्य उसे देखते ही पहचान गया- 'अरे ये तो आदि है।'

फ़िर क्या हुआ? जानने के लिए पढिये-
सांख्य और आदि : पुरूष सूक्त ३

शनिवार, 22 अगस्त 2009

सांख्य और आदि : पुरूष सूत्र. १

सांख्य और आदि दो मित्र थे। दोना में बहुत प्रेम था। वे दोनों एक दुसरे के बिना रह नही सकते थे। सांख्य के लिए दुनिया में सिर्फ़ आदि था, और आदि के लिए सिर्फ़ सांख्य। दोनों में प्रेम निरंतर वर्धमान ही था। यानी उनका प्रेम दिन प्रति दिन बढ़ता ही जाता था। पहले पहल दोनों ने एक दूसरे के बारे में जाना। सांख्य ने देखा कि ये लड़का आदि है, और आदिं ने देखा कि सांख्य मेरा मित्र है। फ़िर दोनों में मित्रता हो गयी। दोनों रोज एक दूसरे को खुश करने के लिए नए नए खेल रचाते थे। दोनों एक दूसरे कि इच्छा पूरी करने के लिए ही कोई भी क्रिया करते थे। नही तो उनको स्वयं कोई कार्य करने योग्य नही था। क्योंकि एक दूसरे के प्रेम से ही उनके सारे कार्य पूरे हो जाते थे।
एक दिन सांख्य ने आदि से कहा- "आदि पुरूष। मैं तुम्हारा नित्य का सखा हूँ। हम दोनों कभी अलग नही है। तुम आदि पुरुषों हो और मैं सांख्य पुरूष। मेरा तुम्हारा सर्वदा का प्रेम है। हम कभी जुदा नही हो सकते। अगर मैं कभी तुम से बिछड़ गया तो दुनिया कैसी होगी?"
आदि ने उत्तर दिया- "अरे, आज हमारे नित्य के मिलन में विरह के भाव क्यो आ गए?"
सांख्य ने प्रश्न किया- "ये विरह क्या है?"
आदि ने कहा- "विरह प्रेम का एक उच्च स्वरुप है। प्रेम का ही अंग है। कोई भी प्रेम विरह के बिना पूरा ही नही होता। विरह में दोनों प्रेमी एक दूसरे से दूर हो जाते हैं, और फ़िर एक दूसरे से फ़िर से मिलने के लिए बेचैन होते है।"
सांख्य- " यह विरह कैसा होता है?"
आदि- " जान के क्या करोगे?"
सांख्य- "तुम्ही ने तो कहा कि विरह प्रेम का उच्च स्वरुप है। हे सखे, क्यो न हम इस सुंदर प्रेम का rasaswadan करे?"
आदि परम ज्ञानी था। सांख्य भी ज्ञानी था। दोनों का ज्ञान सुस्थिर था। मगर वो दोनों मात्र ज्ञान से संतुष्ट नही होते थे। उन्हें तो विज्ञान में ही मजा आता था। किसी वस्तू को जानना ज्ञान है और वस्तू का pratyaksh अनुभव लेना विज्ञान है। इसी विज्ञान के लिए ही सांख्य ने आदि से ये prashn किया। निरंतर वर्धमान प्रेम को नए नए swaroopo को प्राप्त करना ही चाहिए। आदि सर्व समर्थ था। वो सब कुछ कर सकता था। इसलिए सांख्य कभी कभी उसे परम भी kahta था। आदि सांख्य के खेल के लिए नए नए drishy भी पैदा कर सकता था, मानो vahi sachchi दुनिया हो। और फ़िर उस नए drishy में दोनों मित्र खेला करते थे। अब सांख्य विरह के drishy कि मांग कर रहा था।
आदि- " विरह तो सचमुच सुंदर है, मगर vaha तुम तो hoge, मगर मैं तुम्हे न dikhunga। और jaha मैं hunga, vaha तुम मुझे न dikhoge।"
सांख्य- " यही तो विरह है न। मगर क्या पूरे खेल bhar तुम मुझे न dikhoge?"
आदि- " नही, नही। कभी कभी मिलेंगे ही। मैं विरह में आ jaya karunga। मगर..."
सांख्य- " मगर क्या? "
आदि- " मगर विरह में मेरी प्रबल bahiranga माया होगी। kahin उसके prabhav में तुम मुझे भूल jaao तो, pehchan न paao तो?"
सांख्य- "माया क्यो ?"
ये prashn तो सचमुच gambhir था। दो mitro के बीच bahiranga क्यो? vahi antaranga क्यो नही, जो hardam खेल में साथ देती है। या फ़िर vo tatastha क्यो नही, जिसमे दोनों का सहज अस्तित्व है?
आदि ने कहा- " माया तो होगी न। वरना विरह कैसे होगा?"
सांख्य को अचरज में देखकर आदि ने फ़िर कहा- " मित्र। हम दोनों तो सदा sangi है। हम दोनों जुदा तो हो ही नही सकते। फ़िर हमारा तुम्हारा विरह कैसे होगा। aahladini के लिए ये सम्भव नही कि vo hame जुदा करे। क्योंकि aahladini hame बहुत प्रेम करती है और hame कभी अलग नही देख सकती। मगर माया मेरी कठिन से कठिन agya मान सकती है। vo अपनी त्रिगुण शक्ति से ऐसे drishy पैदा karegi, jaha हम दोनों तो होंगे, मगर vaha तुम मुझे सीधे देख न paaoge। मुझे जुदा हो जाओगे। यानी सिर्फ़ dhokhe का विरह होगा। सहज विरह तो प्रेम में कभी होता ही नही। "
सांख्य- " ऐसी बात है, तो चलो, माया को बुलाओ। हम विरह विरह खेलते है। "
आदि- " जैसी तुम्हारी इच्छा।"
इतना कहते ही त्रिगुण माया prakat हुई और सांख्य पुरूष उसके पास आया। पुरूष को पास आया देख कर माया ने अपने तीन गुणों का खेल दिखाया और पुरूष को यह अंहकार प्राप्त हुआ कि उसका अस्तित्व आदि के बिना ही है। वो आदि से अलग हो गया। teeno गुणों कि एक बहुत बड़ी शक्ति prakat हुई। यह महत-तत्व था।

इसी के साथ आदि और सांख्य का 'विरह' नामक खेल शुरू हुआ। आगे क्या हुआ? ये जानने के लिए पढिये-

"सांख्य और आदि : पुरूष सूत्र।-२ "

गोविन्दम्-आदिपुरुषम-तं-अहम्-भजामि।